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पेट को स्वस्थ करती- अपान मुद्रा

आज हम बात करेंगे पेट की। जैसा कि हमें पता कि अपच का मुख्य कारण है ठूंस-ठूंस कर खाना जिससे आकाश तत्त्व की कमी हो जाती है और शक्तिहीनता हो जाती है। अपान मुद्रा इन दोनों कमियों को दूर करती है।

अपान वायु नाभि से नीचे पैरों तक विचरण करती है- पेट, नाभि, गूदा, लिंग, घुटना, पिंडली, जंघाएं, पैर सभी प्रभावित होते हैं। अतः अपान मुद्रा द्वारा नाभि से पैरों तक के सभी रोग ठीक होते हैं। अपान वायु की गति नीचे की ओर होती है। अपान मुद्रा अपान वायु को सक्रिय कर देती है। इस मुद्रा से आकाश और पृथ्वी तत्त्व बढ़ते हैं। अंगूठा, मध्यमा और अनामिका के शीर्ष भाग को आपस में मिलाने से अपान मुद्रा बनती है।


क्या होते हैं इसके लाभ

नस-नाड़ियों का शोधन होता है। इस मुद्रा से शरीर से विजातीय तत्व बाहर निकलते हैं। शरीर शुद्ध और निर्मल बनता है। पेट के सभी अंग सक्रिय होते हैं। पेट के सभी विकारों उल्टी, हिचकी, जी मिचलाना, डायरिया में लाभ होता है। पसीना आने की क्रिया को यह मुद्रा उत्तेजित करती है और शरीर की अवांछित गर्मी को बाहर निकालती है।

पैरों की जलन दूर होती है। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, गुर्दे के रोग, श्वास रोग, दांत दर्द, मसूड़ों के रोग, पेशाब का रुक जाना, पेशाब की जलन, यकृत के रोग, पेट दर्द, कब्ज, पाचन रोग, बवासीर, कोलाईटस तक ठीक होते हैं।


ये भी होते हैं इससे लाभ

महिलाओं की मासिक धर्म की तकलीफें दूर होती हैं और हार्मोन समस्याएं ठीक होती हैं। पेट के सभी अंग स्वस्थ रहते हैं। प्रसिद्ध कहावत है कि पेट ही सभी रोगों की जड़ है। जब पेट ठीक तो सभी रोग ठीक। इसीलिए अपान मुद्रा एक अत्यन्त लाभदायक मुद्रा है।

अपान मुद्रा से अनिद्रा, पीलिया, अस्थमा एवं हार्मोन प्रणाली भी ठीक होती है। इस मुद्रा के नित्य अभ्यास से मुख, नाक, कान, आंख आदि के विकार भी स्वाभाविक रूप से दूर होते हैं। मधुमेह में 15 मिनट अपान मुद्रा और 15 मिनट प्राण मुद्रा करने से अधिक लाभ होता है।

बस में यात्रा करते समय अपान मुद्रा करने से उल्टी नही आती है। अपान मुद्रा के करने से संपूर्ण शरीर मल रहित हो जाता है। प्राण मुद्रा और अपान मुद्रा के नित्य अभ्यास से आध्यात्मिक साधना का मार्ग प्रशस्त होता है। महिलाएं प्रसव के पहले सात महीनों में इस मुद्रा का प्रयोग न करें। इस बात की सावधानी रखें।


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