वास्तव में व्यक्ति वृद्ध अपने मन से होता है, मात्र उम्र से नहीं। यही कारण है कि उज्जैन निवासी वरिष्ठ समाजसेवी अशोक सोमानी 75 वर्ष की अवस्था होने के बावजूद भी ऊर्जा से आज भी युवा ही है। इस उम्र के इस पड़ाव पर भी उनकी समाजसेवा भाावना में कोई फर्क नहीं पड़ा।
उज्जैन के समाजजनों, जैसीज सदस्यों व व्यावसायिक क्षेत्र में अशोक कुमार सोमानी की पहचान 75 वर्ष के युवा की तरह सक्रिय एक ऊर्जावान समाजसेवी के रूप में है। अपनी युवावस्था में श्री सोमानी एक उत्कृष्ट खिलाड़ी रहे। उनकी यह खिलाड़ी वाली भावना व ऊर्जा आज भी वैसी की वैसी ही है। बस इस ऊर्जा की दिशा बदल गई। उम्र के इस पड़ाव पर भी श्री सोमानी समाजसेवा के क्षेत्र में उसी ऊर्जा के साथ अपना योगदान देते आये हैं, जैसे वे खेल के क्षेत्र में देते थे।
उच्च शिक्षा के साथ खेल यात्रा
श्री सोमानी का जन्म 9 जुलाई 1947 को सुलताना (राज.) में स्व.श्री सागरमल सोमानी के यहाँ हुआ था। कक्षा 7वीं तक स्थानीय स्तर पर शिक्षा ग्रहण के पश्चात् आपका कर्मक्षेत्र बदल गया और उज्जैन आ गये। यहीं रहते हुए आपने माधव कॉलेज उज्जैन से समाजशास्त्र में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की।
अपनी इस शिक्षा के दौरान श्री सोमानी ने वर्ष 1968 से 1972 तक सतत रूप से इंटर कॉलेजिएट बैडमिंटन टूर्नामेंट में कॉलेज की टीम के कैप्टेन की भूमिका निभाई। वर्ष 1969 से 1972 तक सतत् रूप से इन्टर युनिवर्सिटी बैडमिंटन टीम में विक्रम विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व किया तथा वर्ष 1972 में विक्रम वि.वि. बैडमिंटन टीम के कैप्टेन भी रहे। इसी प्रकार वर्ष 1968 से 1971 तक माधव कॉलेज टेनिस टीम के कैप्टेन रहे और अन्तर महाविद्यालयीन स्पर्धा में कॉलेज टीम का प्रतिनिधित्व किया।
सुमनजी ने बनाया माधव क्लब सदस्य
जब श्री सोमानी माधव कॉलेज में अध्ययनरत थे, उस समय विद्यार्थियों को माधव क्लब की सदस्यता प्रदान नहीं की जाती थी। इसके बावजूद पूर्व कुलपति व ख्यात राष्ट्र कवि डॉ. शिवमंगलसिंह सुमन की अनुशंसा पर उन्हें श्रेष्ठ खिलाड़ी होने से माधव क्लब में खेलने की अनुमति मिली और फिर विशेष प्रावधान के अंतर्गत माधव क्लब की सदस्यता भी प्रदान की गई।
छात्र संगठन आर्ट्स एसोसिएशन माधव कॉलेज के वर्ष 1967 में श्री सोमानी सचिव भी रहे। इस दौरान विद्यार्थियों व महाविद्यालय के हित में कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ।
समाजसेवा में भी रहे सतत सक्रिय
उच्च शिक्षा प्राप्ति के बावजूद श्री सोमानी ने व्यवसाय की राह ही चुनते हुए चाय व कोल व्यवसाय तथा इंडस्ट्रीयल सप्लायर के रूप में अपने स्व-व्यवसाय की शुरुआत की। एलआईसी एजेंट भी रहे। समाजसेवा अंतर्गत विशाला जैसीज उज्जैन के वर्ष 1980 में अध्यक्ष व मप्र स्टेट जैसीज के वर्ष 1981 में कोषाध्यक्ष रहे।
वर्ष 1980 के सिंहस्थ के दौरान मारवाड़ी रीलिफ सोसायटी कलकत्ता के बैनर तले चिकित्सा शिविर लगाकर लगभग 15 हजार रोगियों तक नि:शुल्क चिकित्सा पहुँचाई। वर्ष 1992 के सिंहस्थ में भारत रीलिफ सोसायटी कलकत्ता के बैनर तले 25 हजार से अधिक रोगियों को नि:शुल्क चिकित्सा उपलब्ध करवाई।
वर्ष 2004 में सिंहस्थ के दौरान भी मारवाड़ी रीलिफ सोसायटी कलकत्ता के बैनर तले शिविर लगाकर श्रद्धालुओं को भोजन व शर्बत वितरित किया।










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