– डॉ रामगोपाल तापड़िया, अमरावती
मन बीमारियों की जड़ – लगभग अधिकांश बीमारियों का कारण पेट की खराबी ही होती है। इसे ठीक करने के लिये हम कई बार डॉक्टरों के चक्कर लगा-लगाकर परेशान हो जाते हैं, लेकिन दवा बंद की नहीं कि समस्या फिर खड़ी हो जाती है। यदि ऐसा अक्सर होता है, तो सचेत हो जाएं। क्योंकि आपकी इन समस्याओं का कारण आपका ‘मन’ भी हो सकता है, जिसका इलाज स्वयं आप कर सकते हैं, कोई डॉक्टर नहीं।
मानव शरीर में मन का सर्वप्रमुख स्थान है। मन में आने वाले अनेक विकार जैसे गुस्सा, लोभ, प्रीति, डर, हठ, जिद्द आदि ने अपने सीमा का उल्लंघन किया नहीं कि उसका सीधा परिणाम हमारे अपने शरीर पर होता है। उसी तरह मन की इन भावनाओं का परिणाम शारीरिक क्रियाओं पर भी होता है। फिर पाचन प्रक्रिया इस परिणाम से कैसे अपवाद रह सकती है?
ऐसे माना जाता है कि किसी के दिल तक जाने का रास्ता उसके पेट से ही गुजर कर जाता है। इसका यह अर्थ हुआ कि किसी का पेट अगर तृप्त हो तो उसके दिल के करीब पहुंचा जा सकता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मन और पेट (पाचन प्रक्रिया) का करीबी संबंध है। उसे हम अनुभव ही नहीं करते बल्कि उसे अनुभव करने पर हम उसे नजरअंदाज भी कर देते हैं।
मन का पेट से सीधा संबंध:
इस पर गंभीरता से विचार किया जाए तो एक बात यह ध्यान में आएगी कि घर के चार सदस्यों ने एक जैसा ही खाना खाया, फिर दो ही सदस्यों को एसिटीटी की तकलीफ बार-बार क्यों होती है? कुछ अन्य कष्टों की भी यही बात है। जैसे कि बार-बार शौच जाना, मल (संडास) साफ न होना या न होने की भावना बनी रहना, अचानक पहले दस्त होना, भूख न लगना आदि।
यह सभी विकार निश्चित ही मन में आने वाले विचार, चिंता, फिक्र, अपेक्षा, नैराश्य आदि परिणाम होते हैं। डर (भय) लगने पर छाती में धक-धक होना, श्वास भरना इस प्रकार के लक्षण हम हमेशा सुनते रहते हैं किन्तु मन में बैठे हुए डर से या फिक्र से पतली शौच होना या बार-बार शौच लगना, इस तरह के कुछ लक्षण होते हैं, जो स्पष्ट रूप से बताए नहीं जा सकते हैं।
सोच बनती परेशानियों का सबब:
ऐसा ही कुछ संध्या दीदी को होता था। बार-बार एसिडीटी, शौच साफ न होना, कोई भी स्पष्ट कारण न होते हुए भी अचानक पहले दस्त होना, इन सभी तकलीफ से वह अत्यधिक त्रस्त थी। किसी भी स्त्री (नारी) को अपेक्षित हो ऐसा सारा सुख उसे प्राप्त था। स्वयं की तथा पति की अच्छी नौकरी, दोनों बुद्धिमान बच्चे, मधुर व्यवहार, अच्छे विद्यालय में अध्ययनरत किन्तु…।
फिर भी संध्या दीदी सतत चिंता में रहने वाली। इसका मतलब तनाव पर और अत्यधिक तनाव। शांत एवं मधुर स्वभाव वाली संध्या दीदी चुनौती तो स्वीकार कर लेती किन्तु यदि किसी तरह की कुछ जिम्मेदारी आ जाए तो दस्त से त्रस्त जब तक हाथ का कार्य व्यवस्थित रूप से पूर्ण न हो जाए तब तक परेशान व अशांत, बच्चों का परीक्षा का तनाव बच्चों से ज्यादा।
समय-बे-समय पर फोन आया तो बात मालूम होने से पहले ही बाथरूम की तरफ जाने के लिए तैयार, इतनी डरी हुई। मैं यह काम करूंगी सब व्यवस्थित होगा या नहीं, जो सामान्य जीवनचर्या है वह बिगड़ेगी तो नहीं ना और इसी तरह के अनेक विचार उनके मन में कौंध जाते तथा उसका परिणाम उनके शरीर (पाचन प्रक्रिया) पर स्पष्टतः होता था।
-मन बीमारियों की जड़










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