महाभारत का शांतिपर्व शांति के अनमोल सूत्रों का खज़ाना है। अशांति मनुष्य का स्वभाव है और शांति उसके जीवन का लक्ष्य है। मनुष्य के लिए शान्ति प्रारम्भ से ही दुर्लभ रही है और आज की जीवन शैली में यह दुर्लभतम होती जा रही है। ऐसे में शांतिपर्व के सूत्र शांति की खोज में भटकते कलयुगी मानव के लिए सच्चे ‘यातायात संकेतक’ सिद्ध हो सकते हैं।
जीवन में शांति के लिए आवश्यक नहीं कि तप, त्याग, ध्यान, धर्म ही किया जाए। गृहस्थ और संसारी रहकर केवल सदाचार से भी शांति प्राप्त की जा सकती है। शांतिपर्व का 193वां अध्याय इसी की ओर इशारा करता है। जिसमे सदाचार की महिमा के बहाने भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को व्यवहार, संस्कार और ब्रम्हचार से सदाचार साधने की सीख दी है।
जब मोक्षधर्म के प्रवचन सुनते हुए युधिष्ठिर ने पुछा कि श्रेष्ठ मनुष्य की क्या पहचान है, तब भीष्म ने कहा “राजन! जो दुराचारी, बुरी चेष्टा वाले, दुर्बुद्धि और दुस्साहस को प्रिय मानने वाले हैं, वे दुष्टात्मा नाम से विख्यात होते हैं। श्रेष्ठ पुरुष तो वही है, जिसमे सदाचार देखा जाए। इसलिए कि सदाचारी होना ही श्रेष्ठता कि पहचान या उसका लक्षण है।”
मात्र 33 श्लोकों में इस अध्याय में भीष्म ने रोज़मर्रा के जीवन से जुड़े अनुशासन में बड़ों को सम्मान देना, पवित्रता से रहना, भोजन की कभी निंदा न करना, अतिथियों का सत्कार करना, मांसाहार न करना आदि को सदाचार कहा है।
आशय यह कि जो इन सामान्य से आचरण को भी साध लेता है, वह श्रेष्ठता की ओर स्वतः उन्मुख हो जाता है। और सबसे बड़ा मन, जो सारी अशांति की जड़ है। उसके शमन के लिए भीष्म अद्भुत सूत्र देते हैं जो इस अध्याय का सबसे ‘मीठा फल’ है। मनीषी पुरुषों का कथन है कि समस्त प्राणियों के लिए मन द्वारा किया हुआ धर्म ही श्रेष्ठ है। अतः मन से सम्पूर्ण जीवों का कल्याण सोचते रहे।
साधो! शास्त्रों के सूत्र केवल संकेत करते हैं। इसलिए वे ‘सूत्र’ कहे गए हैं। उनकी विस्तृत व्याख्या में उलझने के बजाए उनके मर्म को समझना चाहिए। धर्म वही है जो मन से हो और मन वही जो सबका हित चाहे। ऐसा ही प्रयास करने वाला सदाचारी है और वही श्रेष्ठ भी। प्रयास करें, नववर्ष में यह सूत्र आपके ह्रदय में बस जाए और आचरण में उतर जाए।










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