सदा शुभ करें, सदा शिव करें!
‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’। हमारा संकल्प शिव हो। मंगलकारी, सुखकारी व विधेयात्मक संकल्प हो।
किसी व्यक्ति की सफलता उसके कर्म और भाग्य पर तो निर्भर हैं ही, लेकिन इससे भी पहले संकल्प पर निर्भर है। हम जिस भाव से कर्मपथ पर आगे की ओर बढ़ते हैं, उसी भाव के अनुरूप सफलता या असफलता हाथ आती है। जब हम अर्थात् मेरा मन सदैव शुभ विचार ही किया करें, के भाव से भरे होते हैं, तो शुभ ही होता है। यदि दुर्भाव से भरें हों तो शुभ की सम्भावना संदिग्ध हो जाती है।
वेद कहता है जब भी आप संकल्प करो तो शिव- संकल्प करों अर्थात् सुखद संकल्प करो, कल्याणकारी संकल्प करो। शिव का अर्थ ही है कल्याण! शिव संकल्प में प्राणिमात्र के लिए कल्याण का चिंतन है। स्वभावतः जब हम सबके कल्याण की कामना करते हैं, स्वयं का कल्याण तो हो ही जाता है। यही सकारात्मक और नकारात्मक भाव है, जो शिव भाव है। वही विधेय हैं, जो अशुभ भाव है, वही निषेध। व्यक्ति के शिव भाव व्यक्तियों को और व्यक्तियों के शुभ भाव संगठनों को सफलता की ओर अग्रसर करते हैं।
कई ऐसे लोग हैं जिनके पास ज्यादा साधन नहीं हैं, अपना पक्का मकान नहीं है, अपनी पक्की नौकरी नहीं है, फिर भी मस्ती से जीते हैं, गाते हैं और सोचते हैं, ‘आज तक तो भगवान ने दिया है, तो कल भूखे रहेंगे क्या? रहेंगे तो रहेंगे, देखा जायेगा।’ और ऐसे लोग भी हैं, जिनके पास-लाखों रुपये हैं, फिर भी चिंता में हैं कि ‘क्या होगा? यह हो गया, वह हो गया…।’
तो आदमी के चिंतन की धारा अशिव नहीं हो। ‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’। हमारा संकल्प शिव हो। मंगलकारी, सुखकारी व विधेयात्मक संकल्प हो। ‘
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