प्रदीप राठी

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कहतें हैं की जो लोग सोने के चम्मच से खाना खाते हैं, वे हाथ से निवाले खाने वालों की परेशानी नहीं समझते। यह अर्धसत्य है। यह तब तक सत्य है, जब तक संपन्न व्यक्ति अपनी सम्पन्नता में ही कैद है। यदि वह आम व्यक्ति की तकलीफ देखने निकल पड़े तो सबकुछ बदलकर रह जाता है। आइये देखे किस तरह? इसके लिए जाने लातूर निवासी प्रदीप राठी की सच्ची कहानी।

लातुर महाराष्ट्र निवासी प्रदीप राठी की पहचान एक सफल उद्यमी व राजनेता के साथ-साथ एक बड़े कृषक के रूप में भी है। कुल मिलाकर देखा जाए तो उनकी एक पहचान शहर के अत्यंत धनाढ्य व्यक्ति के रूप में है। इसके बावजूद उनकी दूसरी छवि एक अत्यंत सेवाभावी समाजसेवी के रूप में है। एक ऐसा समाजसेवी जो उन्नति को सिर्फ सम्पन्न वर्ग की बपौती नहीं समझता बल्कि समाज के अत्यंत गरीब वर्ग के विकास के लिये भी सपने देखता है, हर संभव प्रयास करता है।

यही कारण है कि श्री प्रदीप राठी झुग्गी झोपड़ी में निवास करने वाले गरीब वर्ग के भी चहेते हैं। श्री राठी राजनीतिक रूप से महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के जनरल सेक्रेटरी के रूप में समर्पित भाव से सेवा दे रहे हैं। परिवार भी उनके नक्शे कदम पर समाज सेवा में साथ-साथ है। पत्नी कमलादेवी राठी हाउसवाइफ हैं। बेटे राहुल बिजनेस देखते है। बहू अनू अष्टविनायक ट्रस्ट द्वारा पुणे में ब्राइडल कॉन्टेस्ट आयोजित करती हैं। परिवार में पोती पूजा, श्रद्धा व पौत्र आकाश हैं।


अत्यंत सम्पन्न परिवार में जन्म

श्री प्रदीप राठी का जन्म 1 नवंबर 1949 को ख्यात समाजसेवी स्व. श्री रामगोपाल राठी व गीतादेवी राठी के यहाँ लातूर (महाराष्ट्र) में हुआ था। भाई स्व. श्री महेन्द्र, स्व. श्री राजकुमार, रमेश राठी का भाई के रूप में साथ मिला। पूर्वज राजस्थान के नागौर जिले के भकरी गांव के रहने वाले थे। माता-पिता लगभग 100 साल पहले वहां से कासरखेड़ा गांव आए थे।

उनका फाइनेंस का काम था और 7 हजार एकड़ जमीन थी। बाद में पिता ने लातूर में कॉटन बिजनेस शुरू किया। लातूर में जन्मे और वहीं स्कूलिंग होने के बाद बीएससी करने मुंबई गये। तभी परिवार में प्रॉपर्टी को लेकर अंकल के बीच डिस्पुट शुरू हो गए। लिहाजा बीच में ही पढ़ाई छोड़कर वापस आना पड़ा।

बाद में लातूर से ही बी.कॉम किया। श्री प्रदीप राठी स्वयं बताते हैं कि मुंबई में पढ़ाई छोड़कर जब 1970 में वापस लातूर आया तभी बिजनेस ज्वाइन कर लिया। इस तरह जब मैं 21 साल का था, तब से अपना करियर मैने फैमिली बिजनेस से शुरू किया। मैंने इरिगेशन में काफी काम किया। हमारे पास काफी मात्रा में जमीन थी, लेकिन उसमे से बड़ा हिस्सा असिंचित था। मैंने उसे सींचा और वहाँ फॉर्मिंग शुरू कराई।

हमारे पास इतने खेत थे कि मैं सुबह घोड़े पर खेत देखने निकलता तो शाम तक 50-60 किमी यात्रा करने के बाद भी पूरे खेत नहीं देख पाता था। हमारा एग्रीकल्चर का भी बड़ा काम था और बाम्बे डांइग का परचेज का बड़ा काम भी हमारे पास था। इस तरह इंडस्ट्री और एग्रीकल्चर दोनों से हम बड़े स्तर पर जुड़े थे। इसी दौरान मैंने आईस फैक्ट्री भी शुरू की। उस समय लातूर में एक भी आइस फैक्ट्री नहीं थी।


पैतृक माहौल ने दिखाई राजनीति की राह

श्री प्रदीप राठी राजनीतिक रूप से कांग्रेस पार्टी से सम्बद्ध है इसमें वे महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सर चिटणीस पद पर सेवा दे रहे हैं। इसके साथ संगठन के मुखपत्र शिदोरी के कार्यकारी संपादक का दायित्व भी सम्भाल रहे हैं। श्री प्रदीप राठी राजनीति से जुड़ाव की भी अनोखी कहानी सुनाते हैं। वे बताते हैं हम फॉर्मिंग से जुड़े थे और इसमें कुछ पॉलीटिकल प्राब्लम हो गई। हमारी जमीनें दूर-दूर तक थीं और कुछ लोगों को यह बात पसंद नहीं थी।

फिर इन मामलों को निपटाने के लिए मैं पॉलीटिक्स में आया। दरअसल मुझे सोशल वर्क में शुरू से ही रुचि थी। मैंने पिता को हमेशा लोगों की मदद करते देखा था। मैं भी हमेशा ऐसा ही करना चाहता था। लिहाजा इस मकसद से भी पॉलीटिक्स से जुड़ा। मैंने और पूर्व सीएम विलासराव देशमुख ने एक साथ पॉलीटिकल सफर शुरू किया था। हमारे मार्गदर्शक शिवराज पाटिल रहे।


इस तरह बढ़े पीड़ित मानवता की सेवा में कदम

श्री प्रदीप राठी बताते हैं, मैं संजय निराधार योजना का अपने शहर का चेयरमैन था, उस योजना के जरिए हमने विधवाओं, अपंगोें, अनाथों और बुजुर्गों के लिए काफी काम किया। इसने मुझे समाज के इस कमजोर वर्ग की समस्याओं को ज्यादा करीब से देखने का मौका दिया, यह मेरे लिए बहुत ही अच्छा अनुभव रहा। इस वर्ग के लिए सभी को काम करना चाहिए।

ये समाज के लिए इंश्योरेंस की तरह है। यदि इन्हें इग्नोर किया तो समाज को बहुत नुकसान उठाना पड़ेगा।समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग और महिलाओं व बच्चों के लिए काम करना उनकी प्राथमिकता होती है। अतः महिलाओं को रोजगार देने के लिए अष्टविनायक पापड़ उद्योग शुरू किया।

इसमें 600 से ज्यादा महिलाएं पापड बनाने के काम से जुड़ी हैं। बच्चों के लिए कई स्कूल और कॉलेज चलाते हैं। लड़कियों के लिए स्टडी सेंटर बनाया है, जिसमें पूरे जिले से लड़कियां आकर शांत माहौल में बैठकर पढ़ाई करती हैं। इसकी सीटिंग कैपेसिटी 250 गल्र्स की हैं। लातूर के 10 स्लम एरिया में स्कूल बनाएं हैं,

ताकि झोपड़पट्टी में रहने वाले परिवारों के बच्चों को नई शिक्षा मिल सके। हर साल बड़े-बड़े आई कैंप लगाते हैं, जिनमें हजार से ज्यादा लोगों का आई चैकअप होता है। उन्हें फ्री में चश्में देते हैं, केटरेक्ट सर्जरी करते हैं। अब तक ऐसे 40 से ज्यादा आइकैंप आयोजित कर चुके हैं। हम लातूर में कैलाशरथ चलाते हैं।

डेडबॉडीज के लिए चलने वाली यह एम्बूलेंस की सुविधा फ्री में देते हैं। साथ ही कमजोर आर्थिक स्थिति वाले परिवारों को उनके परिजनों के अंतिम संस्कार के लिए फ्री में सभी सामान भी उपलब्ध कराते हैं। इसके अलावा हम समाज को हमारी परंपरा और संस्कृति से जोड़े रखना चाहते हैं। लिहाजा मंदिर बनाने और कल्चरल एक्टिविटीज पर हमारा फोकस रहता है। हमने जो मंदिर बनाए हैं, वे मॉर्डन मंदिर की तरह हैं।


छोटे व्यापारियों के लिए शुरू की बैंक

श्री राठी उद्योग-व्यवसाय से सक्रिय रूप से सम्बद्ध हैं। अतः जब उन्होंने छोटे व्यापारियों की पूंजी की समस्याओं को निकट से देखा तो उनके लिए कुछ करने का संकल्प ले लिया। इसके लिए उन्होंने सन् 1995 में अपने कुछ साथियों के साथ लातूर को-ऑपरेटिव बैंक की स्थापना की, लातूर के छोटे-छोटे व्यापारियों को मदद देने के लिए। इस बैंक से गांव के लोगों को भी काफी मदद मिलती थी। बैंक शुरु करने के लिए 5 लाख रुपये 4 दिन में इकटठा किए और बैंक शुरु कर दिया।

इस बैंक का उदघाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने किया था। लातूर में बैंक का भव्य मुख्यालय है। यह राजस्थानी आर्किटेक्ट स्टाइल में बनायी सुंदर बिल्डिंग है और देखने लायक है। आज बैंक का टर्नओवर 500 करोड़ रुपए है और इसके 15,000 से ज्यादा स्टेक होल्डर्स हैं। मराठवाड़ा की यह पहली को-ऑपरेटिव बैंक है जिसकी ब्रांच पुणे में भी है। यह बैंक हाईटेक टेक्नोलॉजी से लैस है।

यहां एटीएम, ऑटोमेटिक डोर, बायोमैट्रिक सिस्टम आदि सभी सुविधाएं हैं। टेक्नोलॉजी के मामले में बैंक नेशनलाइज्ड बैंकों का स्टैंडर्ड फॉलो करता हैं। वर्ष 1995 से लेकर अब तक बैंक में कभी इलेक्शन नहीं हुए और सर्वसम्मति से श्री राठी ही चेयरमैन रहे हैं। इसी तरह की स्थिति लातूर को-ऑपरेटिव इंडस्ट्रीज हाउस में भी है। शुरु से लेकर आज तक वे ही चैयरमैन हैं।


सेवा के लिए वृहद क्षेत्र

लातुर में गणपति का मंदिर नहीं था। सन् 1990 में अष्टविनायक ट्रस्ट बनाया और इसके जरिए कई मंदिर बनाए और कई सोशल एक्टीविटीज भी की। लातूर में अष्टविनायक मंदिर बनाया। इसमें अष्टविनायक की सभी आठों मूर्तियों की प्रतिमूर्ति स्थापित की। हर साल विनायक जयंती पर इसका वर्धापन दिवस आयोजित होता है, जिसे बड़े पैमाने पर मनाते हैं। इसके लिए गीत-नृत्य स्पर्धा आयोजित करते हैं।

यह स्टेट लेवल की होती है और पूरे महाराष्ट्र के बच्चे इसमें भाग लेते हैं। इसमें भक्तिगीत और क्लासिकल डांस कॉम्पीटिशन भी होते हैं। इसमें कई केटेगरी हैं। जिसमें हर साल 3000 तक एंट्री आती है। 3 साल से यह कॉम्पीटिशन पुणे में भी आयोजित हो रहा है। कॉलेज गोइंग गल्र्स के लिए हॉस्टल शुरू किया गया है। यह सुविधा फ्री में भी देते हैं।

लातूर में बुद्धा गार्डन बनाया है। बोधगया से बोधिवृक्ष की जड़े लाकर यहां लगाई गईं हैं। यह बहुत सुंदर और शांत जगह है, लोग यहां आकर समय बिताते हैं, रिलेक्स होकर जाते हैं। महिलाएं सोशल गेदरिंग करती हैं।


कई संस्थाओं को समर्पित सेवा

अध्यक्ष- लातूर अर्बन-कॉआपरेटिव बैंक
लातूर इण्डस्ट्रीयल इस्टेट कोआपरेटिव
अष्टविनायक प्रतिष्ठानम
औंकारप्रतिष्ठान
नेशनल ट्रेनिंग व रिसर्च सेंटर लातूर
राष्ट्रीय विचारक मंच
राजस्थानी फाउण्डेशन
पूर्व अध्यक्ष- लातूर नगर निकाय (वर्ष 1985)
संजय गांधी निराधार व स्वावलंबन योजना (वर्ष 1982)
लातूर व्यापारी व इण्डस्ट्रीयल को-आपरेटिव क्रेडिट सोसायटी
लातूर एग्रीकल्चर मल्टीपर्पज सोसायटी
परिवार कोआपरेटिव हाउसिंग सोसायटी
हजरत सूरत सवाली दरगाह कमेटी
सिद्धेश्वर रत्नेश्वर देवस्थान
महाराष्ट्र स्पोर्ट्स क्लब
चेम्बर ऑफ कामर्स एण्ड इण्डस्ट्रीज
सदस्य- जिला प्लानिंग व डिवलपमेंट कमेटी (वर्ष 1984)
डिस्ट्रिक्ट इंडस्ट्रीज सेन्टर
उपाध्यक्ष- दयानंद एज्युकेशन सोसायटी
डायरेक्टर- नेशनल ट्रेनिंग व डिवलपमेंट कार्पोरेशन
फेडरेशन ऑफ एसोसिएशन ऑफ स्माल स्केल इण्डस्ट्रीज ऑफ इंडिया
टूरिज्म कमेटी ऑफ फिक्की नई दिल्ली
फेडरेशन ऑफ महाराष्ट्र कोआपरेटिव इण्डस्ट्रीयल इस्टेट
प्रज्ञा टूल्स लिमिटेड (रक्षा मंत्रालय के प्रतिष्ठान)


अमीर-गरीब का अंतर सबसे बड़ी समस्या

श्री राठी चाहे स्वयं सम्पन्न वर्ग से हैं, लेकिन वे अमीर-गरीब के अंतर के खिलाफ हैं। वे इसे सबसे गंभीर समस्या मानते हैं। उनका मानना है, अमीर और गरीब की बढ़ती खाई देश की सबसे बड़ी समस्या है। एक बात पूरे देश को समझनी होगी कि जो भी इस देश में पैदा हुआ है, उसकी जिम्मेदारी पूरे देश की है। अब बच्चा टाटा-बिरला के यहां पैदा हुआ या झुग्गी में, इसमें बच्चे की तो कोई गलती नही है। उसे अच्छे माहौल में पढ़ने-रहने, खाने व पहनने की बुनियादी सुविधाएँ देना समाज की जिम्मेदारी है। वरना आगे चलकर ऐसे बच्चे ही नक्सलवाद जैसी विचारधारा से जुड़ते हैं।

अभी जिसके हाथ में जो आ रहा है, वो उसका संग्रह करने की कोशिश कर रहा है, चाहे वे धर्मगुरु हों, बिजनेसमैन हों या राजनेता हों। इस पैसे का, संसाधनों का समाज में बंटवारा ही नहीं हो रहा है, इसलिए इतनी समस्या हो रही है। आज पैसे कमाने का शास्त्र सभी के पास है, लेकिन उसे सही जगह खर्च करने का तरीका बहुत कम लोग जानते हैं, देखिए जहां संग्रह होगा, वहां संघर्ष होगा। लिहाजा सभी को हमेशा अपने से नीचे के वर्ग के लोगों को, जरूरतमंदों को बांटते रहना चाहिए।

यदि बड़े बिजनसमैन छोटे बिजनसमैनों की मदद करें, समृद्ध लोग गरीबों को मदद करें तो देश की तस्वीर बदल जाएगी। इसके अलावा एजुकेशन और एम्प्लाइमेंट को लेकर भी प्रॉब्लम है। हमारे यहां आज भी ब्रिटिशकाल की एजुकेशन चल रही है। जबकि एजुकेशन व ट्रेनिंग बेस्ट होनी चाहिए, तभी युवाओं को काम के अच्छे मौके मिलेंगे। तब गाँवों में भी अच्छी संभावनाएं तैयार होंगी और लोग भागकर शहर नहीं आएंगे।

इसी तरह लोग भाषण में बोलते हैं कि लड़का-लड़की बराबर हैं, लेकिन फिर भी लड़कियों को समाज में सेकंड पोजीशिन ही मिल रही है। वूमन एम्पावरमेंट पर काम करने की जरूरत है।


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