क्यों तारणहार है तुलसी

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तुलसी को हमारी संस्कृति में अत्यंत पवित्र व महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। कहा जाता है कि तुलसी जीवित को भी तारती है और मरने के बाद भी। इसमें साक्षात् भगवान नारायण का वास माना जाता है। इसकी पवित्रता का अनुमान इसी से लगा सकते हैं कि दीपावली पर्व के अंतिम दिवस एकादशी पर तुलसी विवाह का आयोजन किया जाता है। आइये जानें आखिर क्यों इतनी पवित्र मानी जाती है तुलसी?

तुलसी का अत्यधिक औषधीय महत्व है। इसकी तीव्र सुगंध तथा तीक्ष्ण स्वाद इसे जीवनदायी संजीवनी बना देते हैं। इस पौधे का सत कई प्रकार की व्याधियों जैसे खाँसी, सर्दी, पेट की बीमारियाँ, हृदय रोग, ज्वर, मलेरिया आदि के निवारण के काम आता है। कपूर, तुलसी का सत अधिकतर औषधीय प्रयोग में आता है जबकि आज इससे प्रसाधन सामग्री बनाई जा रही है।

तुलसी का पौधा पर्यावरण को प्रदुषण से बचाता है तथा मच्छरों व अन्य हानिकारक कीटों से बचाव भी करता है। मलेरिया के ज्वर में तुलसी एक प्राण रक्षक औषधि का कार्य करती है। हिंदुओं में क्रियाकर्म से पूर्व शरीर को तुलसीजल में स्नान कराया जाता है व मरने वाले की जिह्वा व छाती पर तुलसी पत्र रखा जाता है।


भोजन का भी अभिन्न अंग

टमाटर के साथ तुलसी का स्वाद अद्वितीय है। यह प्याज, लहसुन के साथ भी भरपूर स्वाद देती है। यह भूख को बढ़ाती है। तुलसी की चाय अत्यंत स्वादिष्ट व कई व्याधियों का निदान होती है। पौधे का प्रमुख भाग उसकी पत्तियाँ हैं। छोटे तने तो ठीक है पर मोटे और पुराने तने कड़वे होने के कारण खाए नहीं जा सकते।

इसके पीले-सफेद रंग के पुष्प खाने के योग्य होते हैं। खाना पकाने के अंत में तुलसी पत्र मिलाने से खाने का स्वाद दोगुना हो जाता है जबकि इसे पकाने से इसके तेल नष्ट हो जाते हैं। लहसुन व जैतून के तेल के साथ पीसने पर तुलसी पिस्तों बनाने की एक महत्वपूर्ण सामग्री बन जाती है। पेस्तों और पिस्तों नामक इटली के पकवान तुलसी के बिना अधूरे हैं।

  • औपचारिक गुण- तुलसी के कई औषधीय उपयोग हैं। इसकी पत्तियाँ याददाश्त को तीव्र बनाती हैं।
  • ज्वर एवं सर्दी- कई प्रकार के ज्वरों के लिए तुलसी की पत्तियाँ रामबाण औषधि का काम करती हैं। वर्षा ऋतु में जब मलेरिया और डेंगू ज्वर का खतरा बढ़ जाता है, तुलसी की दो पत्तियों को पिसी इलायची तथा शक्कर एवं दूध के साथ आधा लीटर पानी उबालकर बना हुआ काढ़ा एक त्वरित उपचार है। तुलसी का सत् ज्वर का निदान करता है। ज्वर उतारने के लिए तुलसी पत्र का ताजे पानी में बना सत हर 2-3 घंटे में देना चाहिए तथा बीच-बीच में ठंडा पानी देते रहना चाहिए।
  • खाँसी- कई प्रमुख खाँसी की दवाओं की मुख्य उत्पाद तुलसी होती है। ब्रॉन्काइटिस और अस्थमा में ये कफ को ढीला करती है। तुलसी पत्र चबाने से खाँसी-सर्दी में आराम मिलता है।
  • गले में खराश- गले में खराश से आराम पाने के लिए तुलसी पत्र को पानी में उबालकर पीना चाहिए तथा इससे गरारे करना चाहिए।
  • श्वास संबंधी बीमारियाँ- शहद और अदरक के साथ तुलसी का काढ़ा ब्रॉन्काइटिस, अस्थमा, फ्लू, सर्दी व खाँसी के लिए एक रामबाण औषधि है। इन्फलुएन्जा से बचाव के लिए तुलसी, लौंग और नमक का काढ़ा पीना चाहिए। काढ़ा बनाने के लिए पानी को उबालकर आधा करना चाहिए।
  • किडनी की पथरी- छह महीने तक लगातार शहद के साथ तुलसी पत्र लेने पर पथरी की शिकायत जड़ से निकल जाती है।
  • हृदय रोग रक्त में कोलेस्ट्रॉल का दबाव कम कर तुलसी हृदय रोग तथा कमजोरी से राहत देती है।
  • बच्चों की व्याधियों- तुलसी सत से बच्चों की सामान्य बीमारियाँ जैसे-खाँसी, सर्दी, दस्त-उल्टी, ज्वर से राहत मिलती है। यह छोटी माता, बड़ी माता में भी राहत देती है।
  • तनाव- तनाव से बचाव के लिए एक स्वस्थ आदमी को भी 10-12 तुलसी पत्र दिन में दो बार खाने चाहिए।
  • मुँह की बीमारियाँ- तुलसी पत्र को चबाने से मुँह की बीमारियाँ भी दूर होती हैं और अल्सर भी।
  • कीड़ों का दंश- कीट दंश के लिए भी तुलसी लाभकारी है। जोंक व अन्य कीटों के दंश से बचाव के लिए तुलसी पत्र के ताजे रस को शरीर के प्रभावित अंग पर मलना चाहिए और इसका सेवन भी करना चाहिए।
  • त्वचा रोग- त्वचा रोग जैसे दाद, खाज, खुजली आदि के उपचार के लिए भी तुलसी उपयोगी है।
  • दाँत की बीमारी- इसकी सूखी पत्तियों से दाँत माँजना चाहिए। दाँतों की सुरक्षा के लिए तुलसी व हल्दी का मलहम उपयोगी है।
  • सिरदर्द- तुलसी तीव्र सिरदर्द में भी दवा का काम करती है। यह सिर व शरीर को ठंडक प्रदान करती है।
  • नेत्र रोग- रतौंधी व आँखों में जलन का उपचार तुलसी के सतकारा से हो सकता है। रात में सोने के पहले श्याम तुलसी के रस की दो बूँद आँखों में डालनी चाहिए।

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