डॉ. आर. डी. मोहता

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वर्तमान में भी प्रचलित शिक्षा अंग्रेजी गुलामीकाल की शिक्षा है। यह नई पीढ़ी को प्रगतिशील बनाने की पूरी क्षमता नहीं रखती। इस शिक्षा प्रणाली को पूरी वैज्ञानिकता के साथ नया स्वरूप देकर २१वीं सदी की शिक्षा प्रणाली प्रस्तुत की है, नागपुर के शिक्षाविद् डॉ. आर. डी. मोहता ने। श्री माहेश्वरी टाईम्स प्रबुद्धजनों के परामर्शानुसार शिक्षा में योगदान के लिये डॉ. मोहता को माहेश्वरी ऑफ द ईयर-2014 के सम्मान से नवाज रही है।

मनुष्य को जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए किसी भी विषय की जानकारी मात्र प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। सफलता के लिए जानकारी के साथ-साथ प्राप्त की गई जानकारी का ‘‘उपयोग’’ कैसे किया जाए यह उससे भी अधिक जरूरी है। जानकारी का ठीक उपयोग करने के लिए जानकारी का विश्लेषण, स्मरणशक्ति, एकाग्रता, परिसंवाद, तर्क, लगन, उत्साह, सृजनशीलता, ग्रहणात्मक शक्ति, सकारात्मक सोच तथा इस तरह के कई गुणों की आवश्यकता होती है।

परंन्तु इन गुणों की शिक्षा वर्तमान प्रणाली में निहित नहीं है। यही कारण है कि सर्वाेच्च शिक्षा प्राप्त अनेक व्यक्ति भी जीवन में सफल नहीं हो पाते हैं। जहाँ तक जानकारी का सवाल है, वह भी अधिकांश शिक्षण संस्थाओं में संतोषप्रद रूप से प्रदान नहीं की जाती है। मिसाल के तौर पर एक खबर के अनुसार बिहार राज्य के 10,000 शिक्षक 5वीं कक्षा की परीक्षा भी पास नहीं कर सके। इस एक उदाहरण से ही भारत मे शिक्षा की व्यवस्था का अंदाज लगाया जा सकता है।

सेवा निवृत्त पर शिक्षा जगत को समर्पित:

एम.कॉम., एल.एल.बी. व डी लिट् तक उच्च शिक्षा प्राप्त नागपुर के डॉ. आर.डी. मोहता शिक्षा जगत से 62 वर्षो से भी अधिक समय से जुड़े रहे। इस दौरान कई शिक्षाविदों से विचार विमर्श हुआ और साथ ही पर गहन शोध भी चला कि आखिर देश की शिक्षा व्यवस्था में कमी क्या है और इसकी कमियों को दूर कैसे किया जाए? डॉ. आर. डी. मोहता विभिन्ना कंपनियों व उनके सीईओ को प्रशिक्षण प्रदान करने वाली ख्यात संस्था ‘‘इंडियन सोसायटी फॉर ट्रेनिंग एण्ड डिवलपमेंट’’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।

वैसे वे अपनी उम्र के प्रभाव के कारण कुछ जिम्मेदारियों से दूर हो गये थे, लेकिन फिर जब संस्था ने उनके शोध को आधार बनाकर स्कूल से लेकर सम्पूर्ण कॉलेज शिक्षा तक के कायाकल्प का बीड़ा उठाया तो 78 वर्ष की अवस्था के बावजूद डॉ. मोहता अपने आपको रोक नहीं पाए। आप इस संस्था की ‘‘क्रियेटिव एजूकेटर विंग’’ के नागपुर चेप्टर के फाउण्डर चेयरमेन पद की जिम्मेदारियों का सक्रियता पूर्वक इस अवस्था में भी निर्वहन कर रहे हैं।

सर्वांगीण विकास ही प्रमुख लक्ष्य:

शिक्षाविदों के द्वारा पूर्णरूप से परखाकर महाराष्ट्र सरकार ने इस प्रणाली को शिक्षकों की प्रशिक्षण पुस्तिका में सम्मिलित कर लिया है। इस एक तथ्य से ही प्रणाली की विश्वसनीयता प्रमाणित होती है। इस नयी प्रणाली का आधारभूत उदे्दश्य बहुत उच्च कोटी का है। इसमें शिक्षण का लक्ष्य मात्र जानकारी प्रदान करने का न होकर ‘‘संपूर्ण मानव’’ का उत्थान करना है। किसी भी व्यक्ति की सफलता मुख्यतः दो शक्तियों पर निर्भर करती है- एक शारीरिक तथा दूसरी मानसिक।

व्यक्ति की शारीरिक शक्ति का जन्म और विकास तो उसके माता-पिता करते हैं; परंतु उसकी मानसिक शक्ति का जन्म और विकास करने की जवाबदारी मुख्यतः शिक्षण संस्थाओं की होती है। इस मुद्दे पर तो आज की शिक्षण प्रणाली तथा संस्थों सर्वथा असफल रही हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए इस 21वीं सदी की शिक्षण प्रणाली में इस कमजोरी को दूर करने का यथा संभव प्रयास किया गया है। यह प्रयास आज की शिक्षण व्यवस्था की सीमाओं में ही कार्यान्वित किया जा सके, इस बात का भी संपूर्ण रूप से ध्यान रखा गया है।

क्या है यह शिक्षा प्रणाली:

विश्वभर की शिक्षण प्रणालियाँ कम ज्यादा रूप से ‘‘पढ़ाने’’ – के पहलू को ही सामने रखती हैं। स्वाभाविकतः पढ़ाने वाले की याने शिक्षक की भूमिका ही मुख्य रूप से परिलक्षित होती है। विद्यार्थी की – याने सीखने वाले की भूमिका काफी नगण्य रहती है। फलस्वरूप पढ़ाने की लगभग संपूर्ण जवाबदारी शिक्षक की समझी जाती है।

इसके विपरीत 21वीं सदी की शिक्षण प्रणाली में प्राधान्यता विद्यार्थियों को सौपी जाती है। यद्यपि अन्तिम जवाबदारी तो शिक्षक की ही रहती है परन्तु विद्यार्थी को भी सीखने की प्रक्रिया में पूर्णतः शामिल किया जाता है। इस प्रकार सूक्ष्म से बदलाव से भी अत्यधिक लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।

शिक्षण संस्थानों ने सराहा:

संस्था शासकीय विद्यालयों के शिक्षकों के उन्नयन में भी सीधे अपना निःशुल्क योगदान दे रही है। इसके अन्तर्गत संस्था विभिन्न जिलों के जिला शिक्षा अधिकारियों से संपर्क करती है। ये अधिकारी संबंधित जिले के प्राचार्यो को एकत्र का प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित करवाते है। इनमें संस्था से प्रशिक्षण प्राप्त ये प्राचार्य अपने-अपने कार्यक्षेत्र के स्कूलों के में शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

महाराष्ट्र शासन ने तो इस प्रणाली को शिक्षकों की प्रशिक्षण पुस्तिका (मेन्युअल) में ही शामिल कर लिया है। इस तरह यह अब महाराष्ट्र में तो शिक्षा जगत का अभिन्न अंग ही बन चुका है। स्कूल शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा संस्थान भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहे। नागपुर विश्वविद्यालय, इन्दिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विद्यापीठ (इग्नू) व भारतीय विद्या भवन ने भी इसे उच्च शिक्षा के नवीनीकरण के रूप में अपना लिया है।

प्रशिक्षण बिल्कुल निःस्वार्थ:

संस्था क्रिएटिव एजुकेटर्स शिक्षा प्रणाली में क्रांतिकारी परिवर्तन कर रही है और वह भी निःस्वार्थ भाव से। संस्था द्वारा प्रशिक्षित प्रशिक्षक व विशेषज्ञ प्राचार्य तथा शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। इनसे प्रशिक्षण का प्राप्त ये प्राचार्य व शिक्षक अन्य शिक्षकों को प्रशिक्षण प्रदान करते हैं।

इस तरह पूरा क्षेत्र ही एक अभियान की तरह शिक्षा का कायाकल्प कर लेता है। प्रशिक्षित शिक्षक इसका अपनी संस्था में प्रयोग करते हुए इसे विभिन्न कक्षाओं में क्रमबद्ध रूप से लागू करते हैं।


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