जवाबों को तरसते कुछ प्रश्न – महासभा

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महासभा समाज का एक ऐसा गरिमामयी संगठन है, जिसने समाज ही नहीं बल्कि देश की कुरुतियों को दूर करने में भी समाजजनों की राह दिखाई है। यही कारण है कि यह देश का सबसे पुराना व प्रतिष्ठित सामाजिक संगठन है। बदलती परिस्थितियों में बदलती महासभा की स्थितियों पर आईये जानें ख्यात समाज चिंतक कमल गांधी से उनके अपने विचार।

माहेश्वरी महासभा की स्थापना जिस मूल अवधारणा तथा सिद्धांतों के आधार पर, आदर्श मापदंडों पर समाज को संगठित कर प्रगति के रास्ते पर आगे बढ़ाने के लिए की गई थी, उस समय कुरुतियों को समाज को हटाना, यह एक आंदोलन का स्वरूप था। महासभा समाज की अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य जनगण का प्रतिनिधित्व करने वाली एवं समाज को विभिन्न माध्यमों से सेवा कार्य करने हेतु संगठित करने की प्रेरणादायक संस्था के रूप में स्थापित है।

आज अगर उस दृष्टिकोण से हम महासभा को देखें तो हमें विवश होकर यह स्वीकारना पड़ेगा कि कुछ महानुभावों ने अपने मान-सम्मान और प्रतिष्ठा को ऊंचाई पर ले जाने का महासभा को साधना बना लिया है और तमाम नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर इस पर आधिपत्य और सेवा की जगह सत्ता को मूल आधार बनाकर संपूर्ण सामाजिक ढांचे को क्षत-विक्षत कर दिया है। अपनी संस्कृति, सभ्यता और संवेदना का प्रतीक माना जाने वाला माहेश्वरी समाज आज प्रायः जगह-जगह गुटों में विभाजित हो चुका है।

इसका श्रेय, इसको प्रारंभ करने वाले कौन हैं, यह पूरा समाज जानता है। अपना एकाधिकार और अधिपत्य स्थापित करने के लिए साजिशों का सहारा लिया जाए, नियम और कानून की आड़ में मनमानी की जाए, तब धीरे-धीरे संगठन पर से समाज के सामान्य सदस्यों की आस्था टूटने लगती है। जिनके चेहरे पर धूल लगी हो और वह जब आईने में देखते हों और अपने चेहरे को धुमिल पाते हों, तब वे अपने चेहरे की धूल पोंछने की बजाए आईने को पोंछने की कोशिश करते हैं।

क्या है ‘कथित सद्भावना’:

अभी महासभा के चुनाव होने जा रहे हैं और उस संदर्भ में मैं कुछ विषयों पर समाज को वास्तविकता जिसे पर्दे की आड़ में रखकर ‘सद्भावना’ का स्वरूप दिया जाता है, उससे अवगत कराना चाहता हूं। चयन प्रक्रिया का घोषणा पत्र हकीकत में किसी के निहित स्वार्थों की पूर्ति करने जैसा ही प्रतीत होता है। जो चयन प्रक्रिया का बिगुल बजा रहे हैं। उन्होंने महासभा के 25वें सत्र में जब नागपुर में सर्वानुमति से चयन करने की बैठक हुई थी, तब उसमें सहमति देकर और चयन में अपना नाम ना होने पर उस चयन प्रक्रिया के खिलाफ जाकर चुनाव लड़ा था और आज वे ही इस चयन प्रक्रिया का झंडा लेकर घूम रहे हैं।

चयन समाज के हित में हो सकता है लेकिन उसमें संपूर्ण रूप से पारदर्शिता होनी चाहिए। मुंह में राम और बगल में छुरी रखकर ऐसी कोई भी स्वीकृति पा लेना यह अपने स्वार्थ को साधने का अप्रत्यक्ष रूप से एक माध्यम है और समाज को जोड़ने वाले, दलदल में बांटने वाले जब उसे सामाजिक सद्भाव का जामा पहनाने की कोशिश करते हैं, तो वह पाखंड़ी स्वरूप दर्शाता है कि वे अपना आधिपत्य बनाए रखने के लिए कितने लालायित हैं? यह समझ के बाहर है कि महासभा को अपने चंगुल में फंसाकर रखने से कौन से शहद की प्राप्ति होती है?

कार्यकारी मंडल सदस्यों का औचित्य क्या?

मनमाने ढंग से अपने आप को भीष्म पितामह स्थापित कर देना, अपनी इच्छा से चयन समिति बना लेना और उसमें विफल होने पर जिनको गद्दी पर बैठाना चाहते हैं, उन्हें मैदान में उतार देना। आप जरा मुड़कर देखिए कि पिछले सत्र में जिन चार मुख्य पदों पर जो व्यक्ति थे आज भी वे ही चार व्यक्ति चुनाव मैदान में हैं। अप्रत्यक्ष रूप से इसके पीछे किसकी भूमिका है, यह सजग समाज जानता है।

इस समाज को तब यह मान लेना होगा कि इनके सिवाय इतने बड़े समाज में इन पदों पर आने के लिए केवल और केवल वे ही व्यक्ति काबिल हैं और उन्हीं का चयन चाहते थे। इसी के साथ क्या हम नौ सौ से अधिक कार्यकारी मंडल के सदस्यों के अधिकार की अवहेलना उन्हें उनका दायित्व निर्वाह न करने देना और उनके विवेक पर विश्वास न रखना इस मानसिकता को आप क्या कहेंगे, वास्तव में यह चयन नहीं छलन है।

महिला संगठन एवं महिलाओं की अवमानना:

मैं तो उदयपुर में आयोजित महिला अधिवेशन निरस्त करने के लिए अपनाए गए तमाम हथकंडों का साक्षी हूं और कैसे किसी राजनीतिज्ञ का सहारा लेकर इन्हीं महानुभावों ने राष्ट्रपति को अनेकों फैक्स भिजवाए। बिड़ला दंपति जो दिल्ली तक आ गए थे, उनको यह कहकर नहीं आने दिया कि यहां समाज इसके खिलाफ है और ऐसे असंतोष के वातावरण में उनका आना ठीक नहीं। उस समय भी उनके खिलाफ जोरों से आवाज उठाई गई थी और आज भी महिला संगठन की अध्यक्षा कल्पना गगरानी ने महासभा की महिला संगठन के प्रति दुर्भावनापूर्ण अनेकों प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण दिया है, जिसका महासभा के वर्तमान पदाधिकारियों के पास कोई जवाब नहीं।

इसका एक और उदाहरण महिला संगठन की अध्यक्षा का नाम मतदाता की सूची में बहुत ही नगण्य कारण दर्शाकर काट देना और आदरणीय श्रीमती रत्नीबाई काबरा, जिन्हें महिला संगठन माँ के रूप में सम्मानित रखता है, उनका नाम भी सूची से काट देना, यह इस मानसिकता को दर्शाता है कि इन्हें समाज में नैतिकता का कोई भी आधार स्वीकार नहीं है। यहां यह उल्लेखित करते हुए अत्यंत वेदना होती है कि 80 वर्ष की आयु में श्रद्धेय मां से यह अपेक्षा करना कि वे अपनी उपस्थिति दर्ज कराएं और जब अनुदान देने की बारी आती है तो उनसे जोधपुर अधिवेशन में 71 लाख रुपये अनुदान लेने पर इन्हें कोई परहेज नहीं होता है।

उन्हीं के नाम पर 11 करोड़ का ट्रस्ट जोधपुर अधिवेशन में घोषित किए जाने पर वे इसे अपनी उपलब्धि बताने पर नहीं हिचकिचाते। इसी के साथ ही महिला संगठन की अनेकों उत्कृष्ट महिलाओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए।

और भी कई प्रश्न अनुत्तरित:

इससे हटकर ऐसे अनेकों-अनेकों अनुत्तरित प्रश्न हैं जो महासभा की छवि को धुमिल करते हैं और लगता है कि किसी गुट के कुछ गिने-चुने लोगों ने इस पर अपना कब्जा कर लिया है और इसे अपने चंगुल में रखने की कवायद करने में ये किसी भी स्तर तक जा सकते हैं। समाज को सोचना होगा कि समाज की सबसे पुरानी एवं अखिल भारतीय स्तर की यह संस्था समाज के हाथों में रहे एवं समाज का दर्पण बने तथा युवा पीढ़ी को समाज से जुड़े रहने के लिए भी प्रेरित करे। यह तभी संभव है, जब सत्तालोलुप अहंकारी लोग गलती से ही सही और किसी की ना सही, अपनी आत्मा की आवाज सुनें एवं स्वयं के प्रति तो कम से कम ईमानदार रहें।

कमल गांधी, कोलकाता


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