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ये आरज़ू नहीं

मैं इत्र से महकूँ ये आरज़ू नहीं…

मैं इत्र से महकूँ ये आरज़ू नहीं…
कोशिश है मेरे किरदार से खुशबू आये !!

दर्द दुल्हन का किसी ने समझा ही नही साहब…
हिचकियाँ खो गयी शहनाइयों की आवाज़ में..

नफ़रत करना तो कभी सीखा ही नहीं जनाब,
हमने दर्द को भी चाहा है अपना समझ कर।

लोग इन्तज़ार करते रहे,
कब टूट कर बिखरेंगे हम पर हम पानी है,
पत्थर पड़ते गये हम ऊपर उठते गये।

कलम थी जब तलक मेरे पास हर शब्द बेचैन था –
किताब बनी तो खामोश हर किरदार था !!

दस्तक और आवाज तो कानों के लिए है,
जो रुह को सुनाई दे उसे खामोशी कहते हैं,

मत रखा करो कभी बहीखाता जज्बात का…
ये छलकते हुए बेहिसाब ही अच्छे है…
ज़माना कुछ भी कहे उसका एहतेराम ना कर…

ज्योत्सना कोठारी, मेरठ


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