अखंड सौभाग्य का कामना पर्व- गणगौर

Date:

गणगौर राजस्थानी संस्कृति का एक ऐसा विशेष पर्व है, जिसके द्वारा महिलाऐं अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। वैसे तो यह पर्व किसी न किसी रूप में कई अन्य प्रदेशों में भी मनता है, लेकिन यहाँ इसमें जो राजस्थानी स्नेह की मिठास होती है, वह इसे कुछ खास ही बना देती है।

भारतवर्ष में अन्य तीज-त्यौहारों की भांति गणगौर तीज का भी बड़ा महत्व है। सदियों से राजस्थान वासियों द्वारा गणगौर त्योहार बड़े ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। गणगौर ‘गण’ और ‘गौर’ शब्दों के मेल से बना है। ‘‘गण’’ का अर्थ ‘‘शिव’’ और ‘‘गौर’’ का अर्थ ‘‘पार्वती’’ से किया जाता है परंतु लोक जीवन में गणगौर का अर्थ पार्वती तक सीमित रह गया है।

शिव के स्थान पर ‘‘ईसर’’ शब्द प्रचलित है। वैसे ‘‘गणगौर’’ को और भी कई नाम गवरल, गवरजा, गौंरा, गौरादे, गवरी नाम से भी जाना जाता हैं। माना जाता है कि गणगौर पूर्वजन्म में सती और ईसर महादेव थे। सती 18 दिन की साधना के बाद गौरी रूप में पुनः जीवित हुई, इसलिए यह त्यौहार 18 दिनों तक पूजने का क्रम आज तक चला आ रहा है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने अंततः पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अक्षय सौभाग्य का वरदान दिया और पार्वती ने अपनी सहज करूणा से इस विधि विशेष को संपूर्ण नारी जाति के लिए सौभाग्यशाली विधि के रूप में प्रचलित कर दिया। तभी से यह त्यौहार चैत्र बदी प्रतिपदा से चैत्र सुदी तृतीया तक यानी 18 दिनों तक मनाया जाता है।


ऐसे होती है शुरूआत

होली के दूसरे दिन से ही गणगौर का त्योहार आरंभ हो जाता है, जो पूरे अठारह दिन तक लगातार रहता है। बड़े सवेरे ही होली की राख को गाती-बजाती स्त्रियाँ अपने घर लाती हैं। मिट्टी गलाकर उससे सोलह पिंडियाँ बनाती हैं, शंकर और पार्वती बनाकर सोलह दिन बराबर उनकी पूजा करती हैं।

दीवार पर सोलह बिंदिया कुंकुम की, सोलह बिंदिया मेहंदी की और सोलह बिंदिया काजल की प्रतिदिन लगाती हैं। कुंकुम, मेहंदी और काजल तीनों ही श्रंगार की वस्तुएं व सुहाग की प्रतीक हैं। शंकर को पूजती हुई कुँआरी कन्याएँ प्रार्थना करती हैं कि उन्हें मनचाहा वर प्राप्त हो। शंकर और पार्वती को आदर्श दंपत्ति माना गया है। दोनों के बीच अटूट प्रेम है।

गणगौर

शंकर के जीवन में और मन में कभी दूसरी स्त्री का ध्यान नहीं आया। सभी स्त्रियाँ अपने जीवन में पति का ऐसा ही अखंड प्रेम चाहती हैं। कन्याएँ एक समूह में सज-धज कर दूब और फूल लेकर गीत गाती हुई बाग-बगीचे में जाती हैं। घर-मौहल्लों से गीतों की आवाज से सारा वातावरण गूँज उठता है। कन्याएँ लोटों को सिर पर रखकर घर से निकलती हैं तथा किसी मनोहर स्थान पर उन लोटों को रखकर इर्द-गिर्द घूमर लेती हैं।

जोधपुर में लोटियों का मेला लगता है। वस्त्र और आभूषणों से सजी-धजी, कलापूर्ण लोटियों की मीनार को सिर पर रखे, हजारों की संख्या में गीत गाती हुई नारियों के स्वर से जोधपुर का पूरा बाजार गूँज उठता है।


ऐसे करते हैं गणगौर स्थापना

चैत्र शुक्ल तीज को गणगौर की प्रतिमा एक चौकी पर रख दी जाती है। यह प्रतिमा लकड़ी की बनी होती है। उसे जेवर और वस्त्र पहनाए जाते हैं। उस प्रतिमा की सवारी या शोभा यात्रा निकाली जाती है। नाथद्वारा में सात दिन तक लगातार सवारी निकलती है।

गणगौर

सवारी में भाग लेने वाले व्यक्तियों की पोशाक भी उस रंग की होती है जिस रंग की गणगौर की पोशाक होती है। सात दिन तक अलग-अलग रंग की पोशाक पहनी जाती है। आम जनता में गणगौर उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।


कैसे करें व्रत

चैत्र कृष्ण पक्ष की एकादशी को प्रातः स्नान करके गीले वस्त्रों में ही रहकर घर के ही किसी पवित्र स्थान पर लकड़ी की बनी टोकरी में जवारे बोना चाहिए। इस दिन से विसर्जन तक व्रती को एकासना (एक समय भोजन) रखना चाहिए। इन जवारों को ही देवी गौरी और शिव या ईश्वर का रूप माना जाता है। जब तक गौरीजी का विसर्जन नहीं हो जाता (करीब आठ दिन), तब तक प्रतिदिन दोनों समय गौरी जी की विधि-विधान से पूजा कर उन्हें भोग लगाना चाहिए।

गौरीजी की इस स्थापना पर सुहाग की वस्तुएँ जैसे काँच की चूड़ियाँ, सिंदूर, महावर, मेहंदी, टीका, बिंदी, कंघी, शीशा चढ़ाई जाती है। इसके पश्चात गौरीजी को भोग लगाया जाता है। भोग के बाद गौरीजी की कथा कही जाती है। कथा सुनने के बाद गौरीजी पर चढ़ाए हुए सिंदूर से विवाहित स्त्रियों को अपनी माँग भरनी चाहिए।

कुँआरी कन्याओं को चाहिए कि वे गौरीजी को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। चैत्र शुक्ल द्वितीया (सिंजारे) को गौरीजी को किसी नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर उन्हें स्नान कराएँ। चैत्र शुक्ल तृतीय को भी गौरी-शिव को स्नान कराकर, उन्हें सुन्दर वस्त्राभूषण पहनाकर डोल या पालने में बिठाएँ।

इसी दिन शाम को गाजे-बाजे से नाचते-गाते हुए महिलाएँ और पुरूष भी एक समारोह या एक शोभायात्रा के रूप में शामिल होकर गौरी-शिव को नदी, तालाब या सरोवर पर ले जाकर विसर्जित करें। इसी दिन शाम को उपवास भी छोड़ा जाता है।


राजस्थान का विनोद भी शामिल

‘खेलण दो गणगौर’ भंवर म्हाने पूजन दो गणगौर- इस प्रसिद्ध गीत में गवर का खेलना पूजने से पहले आता है। ऐसा इसीलिए होता है कि गवर पूजने की पद्धति धार्मिक क्रिया से ज्यादा खेलने जैसी है, बालिकाएँ गवरजा को माता नहीं, बहन मानती है और ईसरजी की साली बनकर उनसे हंसी ठिठोली करती हैं।

गणगौर

इन लोक गीतों के माध्यम से कन्याओं में स्कूली शिक्षा के प्रति जागृति जागने जैस है, ‘‘गवरजा बाई चले स्कूल, लगा के फूल, बगल में बस्त,’’ यह गीत कुछ यही प्रेरणा देता है। इनके पूजन के समय गाये जाने वाले गीतों में संगीत का माधुर्य, स्त्री सौंदर्य, साथ ही सामाजिक गूढ़-अर्थ छिपे होते हैं।

गवर पूजने के अधिकांश गीत 10-15 पंक्तियों के होते हैं जिन्हें लड़कियाँ पारिवारिक नाम लेकर बार-बार गाती है जो संगीत व शिक्षा का वैज्ञानिक रूप ही है। कन्याओं में स्पर्धा होती है, सर्वश्रेष्ठ हरे-भरे सुंदर जवारे उगाने की।


Sri Maheshwari Times
Sri Maheshwari Times
Monthly Maheshwari community magazine connecting Maheshwaris round the globe.

Share post:

Subscribe

spot_imgspot_img

Popular

More like this
Related

Sri Maheshwari Times- March 2026 Edition

Check out Sri Maheshwari Times March 2026 'Mahila Visheshank'...

Varshika Gaggar को अमेरिका मे गोल्ड मेडल

नागौर। स्व. श्री महादेवजी एवं स्व. श्रीमती गीता देवी...

Sri Maheshwari Times- February 2026 Edition

Check out Sri Maheshwari Times February 2026 Edition on...

Ashva Ratna Mudra for Concentration

अश्व रत्न मुद्रा (Ashva Ratna Mudra) का अभ्यास एकाग्रता...