महाभारत का पर्यावरण संदेश

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महाभारत के आदिपर्व की दो कथाएं आज भी मनुष्य जाति के लिए पर्यावरण संदेश की प्रेरक बनी हुई है। आवश्यकता केवल इसके प्रतीकों के निहितार्थ को समझने की है।

आपने सुना होगा कि भगवान श्रीकृष्ण और अर्जुन ने अग्निदेव के आग्रह पर इंद्रप्रस्थ के निकट खांडव वन को जला दिया था। अग्निदेव इस वन को जलाने का सात बार प्रयास कर चुके थे लेकिन हर बार असफल हुए थे, कारण इस वन में देवराज इंद्र का सखा तक्षक नाग रहता था। उसकी रक्षा के लिए इन्द्र हर बार जलवर्षा करते और वन को जलाने का अग्नि का मनोरथ अधूरा रह जाता।

तब अग्नि ने कृष्ण-अर्जुन की सहायता मांगी और इन्द्र के विरोध करने पर उन सहित देवताओं से लड़ने के लिए कृष्ण को चक्र व कौमोद नामक गदा, अर्जुन को गाण्डीव धनुष, दो अक्षत तरकश तथा दिव्य कपिध्वज रथ भी दिए थे। तब दिव्यास्त्रों की सहायता से कृष्ण-आर्जुन ने विशाल खाण्डव वन को जला दिया।

घटना के समय तक्षक वन में नहीं था, यद्यपि इन्द्र ने वन को बचाने में पूरी शक्ति झोकी मगर बचा नहीं पाया। परिणामस्वरूप भीषण दाह में वन के लाखों वृक्ष तो जले ही, उसमें निवास करने वाले असंख्य पशु-पक्षी, जीव-जंतु भी आग में जलकर खाक हो गए। केवल तक्षक पुत्र नाग अश्वसेन, मयासुर और चार शारङ्ग पक्षियों को छोड़ कोई भी जीव और वनस्पति न बची।


खाण्डव दाह पर्व की कथा प्रमाण है कृष्ण-अर्जुन ने यह कार्य आवेश और लाभ के लिए किया या जिसमें वन के साथ उसमें बसे मूक प्राणियों के हित की स्पष्ट उपेक्षा की गई थी। हम भी इसी तरह आज तक बगैर अन्य प्राणियों की चिंता किए जंगलों को नष्ट किए जा रहे हैं। यह भूलकर कि केवल वर्षा और वायु के कारक वन ही नहीं, इस धरती के प्राणीमात्र हमारे पर्यावरण का महत्वपूर्ण अंग है।

सभी के साहचर्य में ही हमारा भी हित है जब हम केवल अपने स्वार्थ की पूर्ति पर केंद्रित रख वनों के विनाश का कार्य करते हैं, तो एक समय तो वह सही प्रतीत होता है, किंतु उसके प्रभाव आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ते हैं। प्रकृति और पेड़ों को नष्ट होने से न केवल अकाल और विषाक्त वायु के दुष्प्रभाव सामने आते हैं बल्कि हमारी भावी सन्तति को भी उसकी कीमत अंततः चुकाना पड़ती है।


जिसका संकेत आदिपर्व के आस्तिक पर्व की कथा में है, जिसमें खाण्डव वन को जलाने के प्रतिशोध में तक्षक नाग ने अर्जुन के पोते परीक्षित को डँस कर मार डाला था। तब जब परीक्षित की हत्या का बदला लेने के लिए जनमेजय ने नागयज्ञ किया तो आस्तिक मुनि ने आकर उसे रुकवा दिया। उस यज्ञ में अनेक सर्प जलकर भस्म हो गए, लेकिन तक्षक बचा लिया गया।

मानो आस्तिक मुनि ने प्रतीकात्मक रूप से जनमेजय के बहाने हम सब मनुष्यों को सिखाया कि प्रतिशोध की प्रतिक्रिया प्रतिशोध होगी, तो यह सिलसिला कभी खत्म न होगा। वन को अकारण जलाने पर तक्षक ने परीक्षित के प्राण लिए, अब तक्षक के मारे जाने पर उसकी संताने आगे भी प्रतिशोध लेती रहेगी।

इस घृणा का अंत तब तक नहीं है, जब तक धरती पर हम सब साथ रहने की आदत न डाल लें। मनुष्य बिना कारण बन न फूंके, प्राणियों की हिंसा न करें, नदियों को प्रदूषित न करें तो जल-थल-नभ के सारे जीव भी सुरक्षित रहेंगे और उनके साथ पर्यावरण भी शुभ बना रहेगा। सब मिलकर रहेंगे तो पर्यावरण ही नहीं, सबका जीवन भी मङ्गलमय होगा।

विवेक चौरसिया


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