आज मैं ऊपर आसमां नीचे…

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खम्मा घणी सा हुकुम नारी कदैई भारी कदैई हारी आज ईण विषय पर चर्चा करा…नारी भले ही कोई पद पर आसीन हुवे पर हमेशा परिवार ने प्राथमिकता देवे। आज आधुनिकता री दौड़ में महिला किती भी सशक्त या आधुनिक समझे पर कदैई कदैई उण रै जीवन रा निर्णय पुरुष ले लेवे जिने नारी समाज और नियति मान ने स्वीकार कर भी कर लेवे।

आज समाज रो नजरियों लुगाइयाँ रे सम्मान, अधिकार व योग्यता रे संदर्भ में विस्तृत हुयो है।आज पुरुष समाज में महिलाओं के सशक्तिकरण बात उठण लागी जिन्हें कारण आज महिला देश रे प्रत्येक क्षेत्र में आपरी उपस्थिति दर्ज करा चुकी है ..व्यापार, पुलिस, दूरसंचार, कला, लेखन, राजनीति या अन्य कोई वर्ग क्यों नहीं हो। आज वा आकाश रो सीनो चीयर रही है, धरती माथे प्रभुत्व बणा रही है।


स्त्री समाज री वा इकाई है जिने बिना हर अंग अधुरो है। प्रकृति ग्रंथ, वेद, पुराण, साहित्य, ईश्वरीय भक्ति, देवत्व, लीलाएं सब श्रृंगार आधा अधूरा है। उन्हें उन हिस्से रो आसमान देवणों पड़ेला जठे वां असंख्य तारों रे बीच खुद रे व्यक्तित्व री कई रूपों री छटा बिखेरने और खुद री कला संस्कृति व शिक्षा में आगे बढ़ती हुई समाज रे विस्तृत धरातल पर स्वयं ने सिद्ध कर सके। छोरियां आज छोरों सूं कम कोनी हुकम।

आज नारी ने उच्च शिक्षा देवणी जरूरी है क्योंकि आधुनिक समाज मे शिक्षा ही एकमात्र साधन है जिने द्वारा कोई भी व्यक्ति विकास रे सुअवसरों रो लाभ उठाने सफलता प्राप्त कर खुद ने आत्मनिर्भर बणा सकें।

विवाह रे पेली पिता पर आश्रित रेवण वाली लड़की शादी रे बाद पति पर आश्रित हूँ जावे। उने वो सब सुविधा नहीं मिले जो पिता रे अठे मिले जण जीवन अंधकारमय बण जावें… जीवन रो वो मोड़ जठे यदि महिला खुद शिक्षित हुवे तो वह आपरी योग्यतानुसार किन्ही भी क्षेत्र में नोकरी करने आत्मनिर्भर बण सकें। बेटी ने दहेज नहीं हुक्म योग्यता दो, आत्मनिर्भर हुवण नी।


हुक्म ,नारी रे जीवन सूं जुड़ियोडा दो तटबंध.. जिनमें नारी कदैई संतुष्ट कदैई अधीर हूँ जावे क्योकि भगवान भी सामाजिक परम्पराओं री जिम्मेदारी नारी रे कंधों पर डाली है …ऐड़े में जब तक किन्ही भी कार्य मे पुरूष रो साथ पूर्ण सम्मान नहीं मिले तब तक जीतण-हारण रे प्रपंच सूं घिरयोड़ी नारी चर्चा रो विषय हुवती रही है और हुवती रेवेला।

एक फिल्मों गानो है हुक्म ‘ आज मैं ऊपर आसमां नीचे, आज मैं आगे ज़माना है पीछे ‘ ऊपर लिखियोड़ी बात पर खरी उतरें… अबे उन दबावनी भूल मत करणी भी भुल है। आप दांया हाथ हो तो वा बांयो हाथ है, आप रथ रो एक चक्को हो तो वे दूजी है। रथ दो पहियों माथे इज चाल सके।

ओ जदे इज सम्भव है जदे ऊण ने प्यार, दुलार , सम्मान मिले ला। सहभगिता मिले ला। पुरुष दोई हाथों में लड्डू नहीं रख सके। अबे रिश्तों इण हाथ दे उण हाथ ले…वालो है। वे घर स्वर्ग है जठे उने स्नेह, सम्मान, सहयोग मिले नहीं तो नरक तय समझो हुक्म।

स्वाति जैसलमेरिया, जोधपुर


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