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स्त्री धर्म

पार्वती जी के श्रीमुख से “स्त्री धर्म”

भगवन शिव और पार्वती के दाम्पत्य के चिर आनंदमय होने का रहस्य पति-पत्नी के निरंतर परस्पर संवाद में छुपा है। दोनों के पास जगत के असंख्य काम हैं और गृहस्थी के नियमित दायित्व भी मगर जब कभी अवकाश मिलता है, महादेव और महादेवी आपसी वार्तालाप में लीन हो जाते हैं। हमारे धर्मशास्त्र दोनों की चर्चाओं से जगमग है, जिनमे जीव, जगत और जगदीश से लेकर मनुष्य जीवन की सफलता, सार्थकता के लिए प्रश्नोत्तर के माध्यम से कभी शिवजी तो पार्वतीजी सुन्दर मार्गदर्शन करते हैं।

महाभारत के अनुशासन पर्व में दोनों का ऐसा ही एक सुन्दर संवाद है जिसके कुल 23 अध्यायों में 22 में शिवजी के उपदेश हैं और अंतिम में पार्वतीजी का। अद्भुत है कि पत्नी के अनेक प्रश्नों का उत्तर देने के बाद शिव जी की इच्छा हुई कि वे पार्वती के मुख से भी कुछ सुने। संकेत है जहाँ ‘पत्नी की भी सुनी जाती है’ वह दाम्पत्य सुखमय रहता है।


शिवजी ने कहा, ‘देवी! स्त्रियां ही स्त्रियों की परम गति है। स्त्री की कही बात को स्त्रियां अधिक महत्त्व देती हैं, अतः स्त्री धर्म क्या है, इस बारे में तुम मुझे बताओ। निश्चित ही तुम्हारे द्वारा कहा गया स्त्री धर्म विशेष गुणवान होगा और लोक में प्रमाण माना जाएगा।’

और तब भगवान के आग्रह पर भगवती ने अपने श्रीमुख से स्त्री धर्म बताया। कुल 26 श्लोकों में व्यक्त यह स्त्री धर्म प्रायः पति की सेवा और पति को ही सर्वस्व मानने पर केंद्रित है लेकिन इसके जिन दो श्लोकों में सबकी सेवा’ से पातिव्रतधर्म के पालन का फल बताया गया है, वे सबसे कीमती हैं।


इनका भावार्थ है, ‘जो स्त्री उत्तम गुणों से युक्त होकर सदा सास-ससुर की सेवा में संलग्न रहती है, जो अपने माता-पिता के प्रति सदा उत्तम भक्तिभाव रखती है वह साक्षात तपस्यारूपी धन से संपन्न मानी गई है। जो स्त्री ब्राह्मणों, दुर्बलों, अनाथों, दीनों और निर्धनों को अन्न दान करती है, वह पातिव्रतधर्म कके पालन का फल पाती है।’

साधो! पार्वती जी के कथन का सार यह कि संसार में स्त्री सदैव सेवा की पर्याय है। उसका सारा जीवन सेवा में समर्पित हो जाता है और सबके लिए जीकर ही वह ऊर्जा पाती रहती है। वह अनथक परिश्रम करती है और फिर भी मुस्कुराती रहती है।

सबकी चिंता, सबकी सेवा, सब पर दया, सबका सहयोग, सबको दान यही स्त्री का मूल स्वभाव है। यही उसका धर्म। मार्च महिलाओं को समर्पित मास है। इसी में महिला दिवस भी है और महाशिवरात्रि भी।

तब इस प्रसङ्ग के प्रतीकों से पुरुषों को समझ लेना चाहिए कि ‘स्त्रियों को भी सुने’ और स्त्रियों को अपने उसी धर्म का अनुसरण करना चाहिए जो साक्षात भगवती ने कहा है। इससे महिला सशक्तिकरण तो फलेगा ही घर, गृहस्थी और समाज सब मंगलमय हो जाएंगे।

डॉ. विवेक चौरसिया