स्वस्थ व सुखी जीवन का आधार- “उचित दिनचर्या”

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डॉ सलिल माहेश्वरी
(मुख्य चिकित्सा अधिकारी, पतंजलि योग ग्राम, हरिद्वार)

उचित दिनचर्या – सुखी व स्वस्थ्य जीवन कौन नहीं चाहता लेकिन फिर भी यह आज के दौर में सपना बनता जा रहा है। वास्तव में देखा जाये तो इसका आधार है, उचित दिनचर्या। यदि मात्र दिनचर्या को हम ठीक कर लें तो अधिकांश समस्याओं से बच सकते हैं। खासकर वरिष्ठों के लिये तो यह वरदान से कम नहीं है। तो आइये देखे, कैसी हो हमारी नित्य की दिनचर्या?

नित्य सुबह ब्रह्ममुहूर्त अर्थात् प्रातः 3 से 5 बजे के बीच उठें। उठते ही मुस्कुराते हुये परमात्मा को शुक्राना करें, मानव तन के लिये, आज के दिन के लिये, अगली श्वास के लिये, जो कुछ मिला उसके लिये। फिर 2-3 गिलास सामान्य ताप का पानी पियें बिना कुल्ला, पिये बैठ कर। गिलास मुंह से लगाकर ही पानी पीयें। फिर मुंह में कुल्ला भर कर आंखो को ठंडे पानी से छपके लगाते हुये धोयें, शौचालय को वाचनालय न बनायें, इसमें 5 मिनिट से ज्यादा समय न लगायें।

कैसे करें स्नान-

स्नान नित्य करें लेकिन रोज साबुन नहीं लगायें। सूखे खुरदुरे तौलिये से पूरे शरीर को रगड़ कर गर्म करे, फिर ताजा पानी से हाथों से रगड़ते हुये स्नान करें। फिर बालो को फोल्ड कर तौलिये से पौछें, बाकी शरीर की हाथों से मालिश कर लें और कपड़े पहन ले। समय कम हो तो शॉवर के नीचे शरीर को स्क्रबर या खुरदरे तौलिये से रगड़ते हुये स्नान कर लें।

नित्य योगाभ्यास के साथ मुस्कुराहट-

नित्य नियमित योगाभ्यास करें। इसमें 1 से डेढ़ घंटे में आसन, प्राणायाम, ध्यान, सूर्यनमस्कार, जॉगिंग आदि कर सकते है। स्नान के तुरंत बाद योग कर सकते हैं। योग के आधा घंटे बाद स्नान या नाश्ता कर सकते हैं।

रोजाना एक से डेढ़ घंटे अपने आप से जुड़े, सत्संग करें सद्त्साहित्य पढ़ें। दिन भर के कार्य व्यवहार में तीन बातें ध्यान में रहें- 1. मुस्कुराना एवं शुक्राना- 24 घंटे में 700 बार, 2. कमर सीधी रखें, 3. देवता बनें व लेवता भी न बनें,

शाम के भोजन के बाद ब्रश जरूरी-

शाम के भोजन के पश्चात् दांत अवश्य साफ करेंं। दातुन, मंजन या ब्रश द्वारा। मसूढ़ो की मालिश और जीभ की सफाई भी अच्छी प्रकार करें, रात्रि 10 बजे सोने का प्रयास करें ताकि सुबह जल्दी उठ सकें। दिन में 15-20 मिनट की हल्की नींद ली जा सकती है। सोते समय बिल्कुल हल्के होकर कपडे भी हल्के कर मन भी हल्का कर सोयें।

क्या खायें और कब खायें-

पेड़ पर पके ताजा फल, अंकुरित अन्न, सलाद चोकर समेत आटे की रोटी, उबली हरी सब्जी, देशी गाय का दूध, दही, घी।

यह न खायें-

चाय, कॉफी, कोल्ड ड्रिंक, फास्ट फूड, तली चीजें, डिब्बा बंद खाद्य पदार्थ, नॉन वेज, तेज मिर्च मिर्च मसाला, बिस्किट, ब्रेड, जैम, जैली, नशे की चीजें जर्दा, गुटखा, शराब।

कैसे खायें-

अच्छी तरह से चबा-चबा कर खाने से मुंह की लार से पाचन होता है, स्टार्च का। पीने की चीजें भी घूंट-घूंट कर पियें। दांतों (ग्राइन्डर) का काम आंतों से न लें।

कितना खायें-

भरपेट न खायें, आमाशय आधा भोजन से भरें, आधा खाली रखें। पाचक रसों एवं मिश्रण के लिये। खाली स्थान के लिये बार-बार न खायें।

कब खायें-

समय से खायें, बिना भूख के न खायें। समय हो गया और भूख नहीं है तो पोस्टपोन न करें, लंघन करें। रात्रि को देर से भोजन न करें। सर्वोत्तम है, जैन लोगों की तरह सूर्यास्त से पहले कर लें। संभव न हो तो रात 8 बजे बाद अन्न न खायें- फल, सब्जी या सूप ले लें।

किस भाव से खायें-

अपने पॉजीटिव विचारों द्वारा चार्ज करके भगवत् प्रसाद बना कर खायें। पीने की चीजों को भी पॉजीटिव विचारों द्वारा चार्ज करके पियें। परमात्मा की दिव्य शक्ति से परिपूर्ण यह भोजन/पेय तन-मन को शान्ति, शक्ति और स्वास्थ्य दे रहा है- इस भाव के साथ क्रोधित, चिंतित अवस्था में या जल्दबाजी में भोजन न करें।

भोजन बनाने वाले का भाव भी पवित्र हो कि भगवान का प्रसाद बना रहे हैं। जो सकारात्मक बात परिवारजनों तक पहुंचाती है, उन विचारों को उस भोजन में डालते हुये भोजन बनायें, परोसें। भोजन के साथ या तुरंत बाद में पानी न पियें। आधे या एक घंटे पहले और एक डेढ़ घंटे बाद पानी पियें।

-उचित दिनचर्या


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