कौरव और पांडव भाई-भाई होकर भी राज्य यानी धन के लिए लड़े। कौरव मारे गए और पांडवों ने राज्य पाया। मगर धन अकेला नहीं आता, अपने साथ बहुत कुछ लाता है। महाभारत कहता है असंतोष ही लक्ष्मी की प्राप्ति का मूल कारण है। मतलब लक्ष्मी उसी को मिलती है जो सदा असंतुष्ट रहता है।
तब असंतुष्ट के पास धन के साथ सौ संताप भी आते हैं। धन खोकर ही सुख नहीं आता, धन पाकर भी आता है। जैसे युधिष्ठिर ने अनुभव किया। शांतिपर्व की कथा है महायुद्ध में धन के लिए भाइयों को मारकर युधिष्ठिर को ग्लानि और विरक्ति दोनों एक साथ हुई।
वे पाकर भी मन ही मन इतने दुःखी हो गए कि मिला हुआ राजपाट छोड़कर जंगल जाने को आमादा हो गए। आशय था जिसके लिए इतने कष्ट उठाए, वन-वन भटके, अज्ञातवास में छुपकर रहे और फिर लड़े, उस दिन धन को प्राप्त कर भी शांति न थी। यानी शान्ति न खोने में है, न ही पाने में। तब शान्ति किस चीज़ में है?
इस कथा के प्रसंग में इसका उत्तर महामुनि देवस्थान के उपदेश में मिलता है। कथा के अनुसार जब युधिष्ठिर भाइयों के रोके भी संन्यास से रुकने को राज़ी न हुए तब मुनि देवस्थान बोले संतोष के बगैर शांति नहीं है, जो लोग स्वर्ग-सा सुख और मन की शांति चाहते हैं उन्हें अपने भीतर संतोष को साधना चाहिए।
इसलिए कि ‘हे राजन! मनुष्य के मन में संतोष होना स्वर्ग की प्राप्ति से भी बढ़कर है। संतोष ही सबसे बड़ा सुख है। यह संतोष यदि मन में भइलभाँति प्रतिष्ठित हो जाए तो उससे बढ़कर संसार में कुछ भी नहीं है।
किसी से द्रोह न करना, सत्य बोलना, सभी प्राणियों को यथायोग्य उनका भाग समर्पित करना, सबके प्रति दया भाव रखना, मन और इन्द्रियों का संयम रखना, अपनी ही पत्नी से संतान उत्पन्न करना तथा मृदुता, लज्जा व अञ्चलता आदि गुणों को अपनाना, ये ही श्रेष्ठ और अभीष्ट धर्म है। जो संतोषपूर्वक जीवन में इनका पालन करता है, वह मन-जीवन की हर ‘महाभारत’ से बच जाता है।
जो नहीं करता वह या तो दुर्योधन आदि की तरह मरता है या युधिष्ठिर की तरह राज्य पाकर भी रोता है। शुक्र था कि युधिष्ठिर ने मुनिवर की बात मान ली! इसमें यह भी सीख है कि संशय, संताप और शोक में श्रेष्ठजनों का कहना मान लेने(सत्संग करने) से भी शान्ति का मार्ग प्रशस्त हो जाता है।
Subscribe us on YouTube










Got a Questions?
Find us on Socials or Contact us and we’ll get back to you as soon as possible.