नहीं रहे बिड़ला घराने के ‘पितामह’ श्री बसंतकुमार बिड़ला

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बिड़ला उद्योग समूह के चेयरपर्सन कुमार मंगलम् बिड़ला के दादाजी तथा विदुषी उद्यमी श्रीमती राजश्री आदित्य बिड़ला के श्वसुर श्री बसंतकुमार बिड़ला नहीं रहे। अपनी आयु के ९९ वर्ष पूर्ण करने के करीब रहे श्री बिड़ला ने गत ३ जुलाई को अपने कर्मयोगी जीवन से अंतिम विदा ले ली। देश के कई शीर्ष उद्यमी ही नहीं बल्कि शीर्ष राजनेताओं, समाजसेवियों, कलाकारों आदि कई हस्तियों ने उपस्थित होकर उन्हें अश्रुपूरित अंतिम बिदाई दी।

स्व. श्री बसंतकुमार बिड़ला की ख्याति समाज की नहीं बल्कि लगभग अधिकांश चिरपरिचितों में बीके बाबू के रूप में भी थी। श्री बिड़ला की पहचान उद्योग जगत में एक ऐसे कर्मयोगी के रूप में थी, जिन्होंने अपने कर्तव्यों को पूर्ण करने में उम्र को भी परास्त कर दिया, उन्हें बढ़ती उम्र भी कभी रोक नहीं पाई। जिस उम्र में लोग सेवानिवृत्ति ले लेते हैं, उस उम्र में भी आपने अपने औद्योगिक साम्राज्य का विस्तार किया।

आपका दूसरा पहलु था समाजसेवा, जिसके प्रति भी आप समर्पित रहे। ऐसी अनगिनत समाजसेवी संस्थाएं हैं, जिनकी या तो बीके बाबू ने स्थापना की अथवा जिन्हें सतत वित्तीय सहयोग दिया। माहेश्वरी समाज के लिए तो आप स्नेह का वरदहस्त ही थे। श्री बिड़ला की विशिष्ट पहचान युगल रूप में थी, बसंतकुमार-सरला बिड़ला। दोनों ने ‘दो जिस्म मगर एक जान’ की तरह एक-दूसरे का साथ दिया और दोनों के इस दीर्घ जीवन की अंतिम यात्रा में भी मात्र ४ वर्ष का ही अंतर रहा। 

5 वर्ष की उम्र में उठा मां का साया:

बिड़ला घराने के कलकत्ता स्थित विशाल आवास “रायने पार्क” में प्रख्यात उद्योगपति घनश्याम बिड़ला व श्रीमती महादेवी जी के यहां बसंतकुमारजी का द्वितीय पुत्र के रूप में ४ फरवरी १९२१ को जन्म हुआ था। महादेवीजी जीडी बिड़ला की द्वितीय पत्नी थीं। प्रथम पत्नी दुर्गादेवी से उनका विवाह सन् १९०६ में हुआ था। एक पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम लक्ष्मीनिवास रखा गया। किन्तु दुर्भाग्य से १९०९ में ही पत्नी का निधन हो जाने से बहुत सदमा पहुंचा। इसके बाद पुनर्विवाह महादेवीजी के साथ हुआ। द्वितीय पत्नी से उन्हें दो पुत्र श्रीकृष्ण कुमार एवं श्री बसंतकुमार तथा तीन पुत्रियां चंद्रकला देवी, अनुसूया देवी एवं शांतिदेवी प्राप्त हुई।

किन्तु विधि के विधान स्वरूप १९२६ में ही महादेवी का भी एक लाइलाज मर्ज का शिकार होने से स्वर्गवास हो गया। पत्नी महादेवीजी का मोहक व्यक्तित्व बिड़ला हाउस में अपनी विशिष्ट सुगंध रखता था। अतः इस आघात से संपूर्ण बिड़ला परिवार ही शोक सन्तप्त हो उठा। विधि की इस विडंबना ने मात्र ५ वर्षीय बसंतकुमार से उनकी मां का साया भी छीन लिया था। इसके बाद पिताजी जीडी बिड़ला ने पुनर्विवाह नहीं किया और उन्हें अपनी तमाम व्यस्तता के बावजूद पिता के साथ-साथ माता का स्नेह भी देने का भरसक प्रयास किया।

13 वर्ष में प्रारंभ व्यावसायिक यात्रा:

१९३४ में मुश्किल से तेरह वर्ष के दसवीं कक्षा के छात्र ही थे कि बसंतकुमार ने कलकत्ता स्टॉक एक्सचेंज की जानकारी प्राप्त करना शुरू किया। उसके चाचा ब्रजमोहन ने गंगादासजी झावर नाम से एक ब्रोकर को लगाया, जिसने किशोर बसंतकुमार की ‘हावड़ा जूट’ और ‘इंडियन रेयॉन’ के कुछ सौ शेयर खरीदने में मदद की। पहले साल के अंत तक, बसंत ने ३५०० रुपए का लाभ कमाया।

इसके दो वर्ष बाद १८ मार्च १९३६ को प्रथम बार पिता का कार्यालय देखा। बस यही जीवन का स्मरणीय दिन था। इसके अगले दिन ‘केशोराम मिल्स’ गए और मात्र ४ माह में प्रसाधन सामग्री निर्माण के उद्योग ‘कुमार केमिकल वक्र्स’ प्रारंभ कर दिया। बस फिर क्या था केशोराम मिल्स सहित पिताजी ने उन्हें कई उद्योगों की जिम्मेदारी सौंप दी। वहीं स्वय भी एक के बाद एक नए उद्योगों की स्थापना करते चले गए। 

उम्र भी उत्साह न रोक पायी:

श्री बिड़ला ने जब से उद्योग जगत में कदम रखा तब से जिस उत्साह के साथ औद्योगिक विस्तार प्रारम्भ हुआ उसे उम्र का कोई पड़ाव भी नहीं रोक पाया। वर्ष १९९० में जब श्री बिड़ला उम्र का ७०वें वर्ष का पड़ाव पार कर रहे थे, तब भी उनके उत्साह में कोई कमी नहीं आई। इसके बाद ही उन्होंने ६ सीमेंट प्लांट, पल्प एवं कागज कारखाने व टायर्स उद्योग स्थापित किए। ये उद्योग आज भी अच्छी तरह से चल रहे हैं। वर्ष १९९५ के बाद उद्योग जगत ने कई करवट ली।

नई चुनौतियाँ उभरी और प्रबंधन में भी विश्वव्यापी परिवर्तन आये। इस परिवर्तन ने कई उद्योगों के पैर उखाड़ दिए। २-३ साल बिड़ला समूह को भी कुछ कठिनाईयां आई लेकिन उनके हौसले और उनकी तीक्ष्ण बुद्धि ने समय की मांग के अनुरूप प्रबंधन में ऐसा परिवर्तन किया कि उद्योग पुनः वक्त के साथ कदम से कदम मिलाकर दौड़ने लग गये। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे स्वस्थता की स्थिति में प्रतिदिन प्रातः ८.४५ बजे ऑफिस जाते और वहाँ से शाम ४ बजे लौटते थे।

पुत्र की मृत्यु का सहा सदमा:

किसी भी पिता के लिये उसके बेटे की अपनी आंखों के सामने मौत होने से अधिक कष्टप्रद कुछ भी नहीं होता, लेकिन बिड़ला दंपति को अपने जीवन में यह क्षण भी झेलना पड़ा। १९६० से उनके पुत्र आदित्य इस विशाल औद्योगिक साम्राज्य के संभालने व उसे शिखर की ओर पहुंचाने में सतत योगदान दे रहे थे। बिड़ला दंपति अब औद्योगिक क्षेत्र की चिंता से लगभग मुक्त होने लगे थे लेकिन वर्ष १९९३ उनके सामने ७२ वर्ष की आयु में नई चुनौती लेकर आया। यह चुनौती थी उनके बेटे आदित्य को हुई कैंसर की बीमारी।

अमेरिका में विशेषज्ञ डॉक्टरों से आपरेशन के बाद भी कुछ नहीं हो सका और वे असहाय होकर तिल-तिलकर मौत की ओर बढ़ते हुए अपने बेटे को देखते रहे। आखिरकार १ अक्टूबर १९९५ की रात १२ बजकर २१ मिनट पर उनका यह चिराग बुझ गया। उनके जीवन में तो जैसे अंधेरा ही छा गया लेकिन पूरे परिवार को संभालने की जिम्मेदारी भी सामने थी।

वैसे तो स्व. श्री आदित्य के पुत्र व श्री बिड़ला के पौत्र कुमार मंगलम् बिड़ला समूह को संभालने लग गये थे लेकिन फिर भी वे बहुत अधिक अनुभवी व परिपक्व नहीं थे। इस स्थिति ने श्री बिड़ला पर नई जिम्मेदारियां फिर से डाल दी। ये थी काम में कुमार मंगलम को सहयोग व परामर्श देना। इसके लिए उनकी दिनचर्या पुनः व्यस्त हो गई।

अत्यंत आदर्श दंपति:

श्री बसंतकुमार बिड़ला का विवाह ३० अप्रैल १९४२ को ख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी विदर्भ केसरी श्री ब्रजलाल बियाणी की विदुषी सुपुत्री सरलाजी से हुआ था। ७३ वर्ष के दीर्घ दांपत्य के बाद श्रीमती सरला बिड़ला का ४ वर्ष पूर्व २८ मार्च २०१५ को देहावसान हो गया। श्री व श्रीमती बिड़ला की जोड़ी वास्तव में आदर्श दांपत्य की मिसाल ही थी क्योंकि दोनों ने हर कदम पर कंधे से कन्धा मिलाकर एक-दूसरे का साथ दिया। कहते हैं कि किसी पुरुष की उन्नति के पीछे किसी नारी का हाथ होता है, यह सरलाजी ने चरितार्थ कर दिया।

उनके आपसी रिश्तों में पति-पत्नी के कर्तव्य तो शामिल थे ही, साथ ही मित्रतापूर्ण संबंध भी थे। इसका प्रमाण यही है कि उस दौर में जब विवाह के पूर्व लड़के-लड़की एक दूसरे की सूरत भी नहीं देख सकते थे, ऐसे दौर में भी विवाह के पूर्व ही पत्र-व्यवहार द्वारा दोनों के मित्रवत संबंध जारी थे। एक अद्र्धांगिनी के रूप में आपने बसंतकुमारजी को हर अच्छी-बुरी परिस्थितियों में तो संबल दिया ही, साथ ही आध्यात्मिक व मानवसेवी गतिविधियों की ओर प्रेरित भी किया।

ससुर जीडी बिड़ला भी इनके स्वभाव से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने इन्हें स्नेहवश एक पुत्रीवत् दर्जा ही दे रखा था। श्रीमती बिड़ला श्री बिड़ला के लिए वास्तव में उनके लिए प्रेरणा ही थी।

२०० करोड़ से इंडियन स्कूल की शुरुआत:

बसंतकुमार बिड़ला व सरला के पुत्र आदित्य की उम्र जब स्कूल जाने की हुई तो विकट समस्या उत्पन्न हो गई। ये आदित्य को श्रेष्ठ शिक्षा देना चाहते थे कि लेकिन उस समय कलकत्ता में केवल कॉन्वेंट स्कूल ही थे, जो इस श्रेणी में आते थे। समस्या यह थी कि इनकी विचारधारा गांधीवादी होने से स्वदेशी को प्राथमिकता देने की थी। अतः कान्वेंट स्कूल में पुत्र के प्रवेश का तो प्रश्न ही नहीं था।

सरलाजी ने अपनी सहेली इंदु पार्लिकर के सहयोग से आधुनिकतम् शिक्षा सुविधा से युक्त इंडियन स्कूल की स्थापना की, जिसकी प्राचार्य श्रीमती पार्लिकर को ही बनाया गया। स्कूलों के संचालन के लिए २०० करोड़ रुपए की लागत से एक शैक्षणिक ट्रस्ट की स्थापना की गई। इसके साथ ही कुछ ही समय में देश के विभिन्न भागों में २५ स्कूलों की स्थापना की गई।

वर्तमान में ट्रस्ट की इस पूंजी का ब्याज ही १५ करोड़ रुपए प्रतिवर्ष से अधिक बन रहा है जो इनके आधुनिकतम शैक्षणिक कार्यक्रमों में योगदान दे रहा है। 

बिट्स की दी सौगात:

बिड़ला परिवार की जन्मभूमि पिलानी के विकास के लिए भी सरलाजी ने बसंतकुमारजी को प्रेरित किया। पिलानी एक छोटा सा कस्बा था, जहां शिक्षा के संसाधन सीमित थे। इस समस्या को देख वहां के अपनों की उन्नति के उद्देश्य से बिड़ला इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी एंड सार्इंसेस (बीआईटीएस) नामक इंजीनियरिंग कॉलेज की स्थापना की।

यह इंजीनियरिंग कॉलेज आज देश के शीर्ष तकनीकी शिक्षण संस्थाओं में से एक है जिसमें प्रवेश पाना विद्यार्थी अपना सौभाग्य समझते हैं। शैक्षणिक क्षेत्रों में और भी संस्थाओं की स्थापना कर शिक्षा के क्षेत्र में पिलानी को देश-विदेश में सम्मान दिलवाया।

वर्तमान में बिट्स के पिलानी ही नहीं बल्कि कई अन्य प्रमुख शहरों में भी तकनीकी संस्थान कार्यरत हैं। इन संस्थाओं की प्रतिष्ठा ठीक आईआईटी जैसी ही उच्चस्तरीय है। 

दोनों में ही था कलाकार दिल:

चाहे श्री बिड़ला उद्योगपति थे लेकिन उनमें व उनकी धर्मपत्नी दोनों में ही कलाकार हृदय धड़कता था। यही कारण है कि वे दोनों कई कला संस्थाओं से संबद्ध थे। जिनके जन्म के साथ आप दोनों जुड़े रहे। उनके द्वारा स्थापित स्वर संगम और संगम नामक कला संस्थान में ८०० विद्यार्थी कला के साथ साहित्य, धार्मिक व आध्यात्मिक विषयों का भी अध्ययन कर रहे हैं।

इसके साथ ही सामाजिक क्षेत्रों में योगदान के अंतर्गत कलकत्ता में महादेवी बिरला मंगल निकेतन नामक भवन का निर्माण वयोवृद्ध व्यक्तियों के लिए करवाया गया। वैसे तो शीर्ष उद्यमी होने से उनकी व्यवस्तता अत्यधिक रहती थी, फिर भी वे अधिकांशतः इनका कला संस्थाओं के महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में शामिल हुए बिना नहीं रहते थे।

एक स्वर्णिम ऐतिहासिक पत्र:

श्रीघनश्यामदासजी बिरला द्वारा अपने पुत्र श्री बसंतकुमारजी बिरला को जो पत्र लिखा था, आज के परिवेश में भी उतना ही उपयोगी है जितना लिखने के समय था:

चि. बसंत,
जो भी तुम्हें लिख रहा हूं-उसे तुम्हें बड़े और यहां तक कि, बूढ़े होने पर भी पढ़ते रहना चाहिए। 
मेरा लिखा अनुभव पर आधारित है। यह सही है कि मानव बनकर जन्म लेना ही कठिन है, और जो भी व्यक्ति अपने मानव-जन्म रूपी विशेषाधिकार को नहीं समझता, वह पशु तुल्य है। तुम्हारे पास धन, अच्छा स्वास्थ्य और जीवनयापन के सभी आवश्यक साधन हैं। यदि तुम उन्हें मानवता की सेवा के लिए उपयोग करते हो, तो ही वे उपयोगी हैं अन्यथा, वे शैतानी बलाएं बन जाते हैं। तुम्हें इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए-
१. धन का उपयोग केवल मजे और मौज के लिए मत करो। रावण ने ऐसा किया लेकिन जनक ने इससे मानवता की सेवा की। धन-संपदा सदैव नहीं रहती, अतः इसका अधिक से अधिक उपयोग समाज सेवार्थ करो। अपने पर न्यूनतम ही खर्च करों धन से निर्धनों की दुर्दशा को दूर करो।
२. धन शक्ति है। इस शक्ति के मद में, दूसरों पर अन्याय होने की संभावना हो सकती है, इससे बचने की कोशिश करना। 
३. अपने बच्चो को बताना यदि वे धन को केवल सांसारिक भोगों पर ही खर्च करते हैं तो यह पाप होगा। ऐसे में हमारा व्यापार भी नष्ट हो जायगा। ऐसी अवांछनीय ची़जों पर धन कभी मत खर्चना-इस तरह से उसका अपव्यय करने के बदले, उसे गरीबों में बाँट दो। तुम्हें स्वयं को एक निमित्तमात्र समझना चाहिए। हम सभी भाईयों ने इस व्यापार को इसी आशा से फैलाया है कि तुम इसे उचित प्रकार सँभालोगे। 
४. हमेशा सोचते रहो कि तुम्हारे धन पर जनता का भी अधिकार है। तुम्हें सिर्फ स्वयं के लिए ही धनार्जन नहीं करना है। 
५. ईश्वर का ध्यान हमेशा करो। इससे तुम्हारे मन में शुभ विचार आयेंगे।
६. अपनी इंद्रियों पर संयम रखो- अन्यथा वे तुम्हें समस्या ग्रस्त कर डालेंगी। 
७. नित्य व्यायाम करो।
८. भोजन ऐसे करो, जैसे दवा लेते हो। जो स्वाद के लिए ही भोजन करते हैं- वे समय से पूर्व ही अवसान को प्राप्त होते हैं और उनसे ठीक से काम भी नहीं होता।
काकोजी (श्रीघनश्यामदासजी बिरला)

युगल गीत बना था यादगार:

सन् १९३५ में फिल्म “अछूत कन्या” बहुत ही लोकप्रिय हुई थी। श्रीमती सरला बिड़ला इससे संबंधित एक घटना को ऐसे जीवंत रूप में बताती थीं कि जैसे वह आजकल ही हो। इस फिल्म के गीत घर-घर में गूंज रहे थे। इसका एक गीत ‘‘वन की चिड़िया’’ सर्वाधिक लोकप्रिय था। सन् १९८३ में संगीत कला मंदिर में एक कार्यक्रम था जिसमें श्री बसंतकुमार बिड़ला व श्रीमती सरला बिड़ला दोनों मौजूद थे। कला मंदिर के सदस्यों ने इनके सामने युगल गीत गाने का प्रस्ताव रखा। हॉल पूरा खचाखच भरा हुआ था।

सब उन्हें सुनने को इच्छुक थे। दोनों ने वन की चिड़िया गीत गाना शुरू किया। गाना शुरू होने के कुछ ही सेकेंडो के पश्चात श्रोताओं ने बड़े स्नेह से तालियां बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया। जब गीत समाप्त हुआ तो करतल ध्वनि से हॉल गूंज उठा। कार्यक्रम के बाद श्री बिड़ला ने भावविभोर हो कहा था कि कंपनियों को सुचारु रूप से चलाने पर भी शेयर होल्डर्स ने कभी इतनी सराहना नहीं की, जितनी हमारे इस गायन पर तालियां मिलीं। बसंतकुमार जी की आंखों में आंसू थे क्योंकि वे जानते थे कि ये तालियां कला मंदिर सदस्यों के स्नेह की प्रतीक थीं। 


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