रिश्तों से लुप्त होती उनकी आत्मा

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त्रिभुवन काबरा, वड़ोदरा

जी तरह ऑक्सीजन के बिना जीवन संभव नहीं, वैसे ही प्रेम व अपनत्व के बिना भी असंभव ही है। यह सौभाग्य है कि हमें ये सब रिश्तों में निहित भावनाओं के रूप में सहज उपलब्ध होते रहें हैं। लेकिन बदलते समय ने रिश्तों को निष्प्राण सा कर दिया है क्योंकि रिश्ते तो बचें हैं, लेकिन उनकी “आत्मा” प्रेम व अपनत्व नदारद हो रहें हैं।

बदलते समय के साथ रिश्ते निभाने के तरीके बदल रहें हैं। अब रिश्ते दिमाग से सोच समझकर निभाए जाते हैं। मन व भावनाओं का स्थान बहुत कम रह गया है। जब कभी यह सवाल मन में उठता है कि रिश्तों के मायने क्यों बदल गए, तब लगता है कि शायद यह विरासत हम आने वाली पीढ़ी को ठीक से नहीं दे पाए।

क्या अब रिश्ते सिर्फ एक सामाजिक बंधन रह गए हैं? क्या हम रिश्तों को जीना, उनकी भावनाओं को जीना भूल गए हैं? क्या आने वाली पीढ़ी के लिए यह शब्द विलुप्त हो जाएगा। कहाँ गए हमारे वो संस्कार जो रिश्तों कि अहमियत को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे लेकर जाते थे?

गुजरते समय के साथ जब कभी वो पुरानी बातें याद आती हैं, तो एक सुखद अहसास होता है कि शायद हमने अपने रिश्तों को जी भर के जिया है। तो कभी अनायास एक गहरी उदासी छा जाती है कि अब क्यों नहीं रह गया है, रिश्तों का महत्त्व?

कमज़ोर पड़ी रिश्तों कि कड़ी:

ऐसा लगता है जैसे लोहा समय के साथ जंग खाकर कमज़ोर हो जाता है, शायद हमारे रिश्तों के साथ भी वैसा ही कुछ हो गया है। रिश्तों कि कड़ियाँ समय के साथ कमज़ोर हो गई हैं या कहें कि टूट गई हैं। कभी कभी लगता है कि इस भीड़ में हर इंसान अकेला खड़ा है। रिश्ते सिर्फ मतलब के लिए रह गए हैं।

हमने रिश्तों के नाम बदल दिए हैं, कभी जो चाचा-चाची हुआ करते थे, वे अब अंकल-आंटी हो गए हैं। दादा-दादी ग्रैंडपा-ग्रैंडमा हो गए हैं क्योकि रिश्तों की बुनियाद बदल गई है। संयुक्त परिवारों की जगह न्यूक्लियर फैमिली ने ले ली है। हर छोटे-बड़े को प्राइवेसी चाहिए होती है। कभी जो बुज़ुर्ग घर की शान होते थे आज उनके लिए वृद्धाश्रम बनने लगे हैं।

आजकल बच्चों को नानी-दादी जैसे रिश्तों के बारे में भी बताना पड़ता है। एक समय था जब बिना उनकी कहानियाँ सुने बच्चे सोते नहीं थे। अब उनकी कहानियों की जगह टीवी, मोबाइल, स्कूल वर्क या देर रात की पार्टियों ने ले ली हैं।

त्योहारों पर भी सीधा संपर्क नहीं:

वह भी समय था जब त्यौहार परिजनों व समाज के साथ मनाते थे। त्योहार मनाने के लिए दूरदराज से भी अपने घरों को जाते थे तथा कई दिनों तक त्यौहार का आनंद अपनों के बीच लेते थे। बहन-बेटियों व उनके ससुराल वालों का विशेष ध्यान रखते, घर पर बानी मिठाइयां पहुंचाते, दो रूपए मिलनी के दे कर गले लगाते।

अड़ोस-पड़ोस व परिजनों के घर में जाने के लिए घंटी नहीं बजानी पड़ती थी। जो रिश्ते में भी नहीं होते उनको भी दादा, ताऊ, चाचा आदि कहकर सम्बोधित करते थे। आज हम विकसित हो गए हैं, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का जमाना है। दिमाग अपने मन पर हावी हो गया है।

त्योहारों की शुभकामनाए देने के लिए एक व्हाट्सप्प या मैसेज ही काफी है। अगर कोई बहुत काम आने वाला व्यक्ति है, तो कॉल करके शुभकामनाओं का आदान-प्रदान कर लेते हैं।

अब रिश्ते दिल से नहीं दिमाग से:

समय के साथ खाने व खिलाने का तरीका भी बदल गया है। आज सभी संस्थानों से सुसज्जित किचन होने के बावजूद हम लोग खाना जोमाटो या स्विगी जैसी वेबसाइट पर ढूँढ़ते रहते हैं। मगर एक समय था जब माँ अकेली रसोई में मिट्टी के चूल्हे में लकड़ियां फूँक-फूंककर पूरे घर का खाना बनाती थी मगर कभी माथे पर शिकन नहीं होती थी और ना ही थकती थी क्योंकि रिश्ते मन से थे, दिमाग से नहीं।

आज हम एक ही छत के नीचे रहते हुए भी एक दुसरे को अंदर से नहीं पहचान पाते हैं। हमें नहीं पता होता है की कौन कितना मानसिक संताप में जी रहा है? हमने भावहीन ज़िन्दगी जीने की प्रवृत्ति बना ली है।

आओ कोशिश करें फिर से रिश्तों को मन से जीने का, नहीं तो आने वाला कल इंसान को मशीन बना देगा, जिसमे मन व भावना का कोई पुर्जा नहीं होगा।


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