वैसे तो गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा केवल 21 कि.मी. की है, लेकिन इसे दंडवत रूप में अर्थात् लोट-लोटकर करने के कारण यह अत्यंत कठिन परिक्रमा में से एक मानी जाती है। मुंबई निवासी 68 वर्षीय मनमोहन राठी ने उम्र के इस पड़ाव पर भी 125वीं दंडवती परिक्रमा का कीर्तिमान बनाया है।
हिन्दू धार्मिक स्थलों में सबसे महान तीर्थ स्थल ब्रज धाम है, जिसमें गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा के बारे में कहा जाता है कि चाहे चारो धाम की यात्रा कर लो या फिर गिरिराज पर्वत की 21 किलोमीटर की परिक्रमा, दोनों बराबर मानी जाती है। यह पर्वत छोटे-छोटे बालू पत्थरों से बना हुआ है।
इस पर्वत की लंबाई 8 कि.मी. है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि इसकी परिक्रमा करने से मांगी गई सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं। यह आस्था की अनोखी मिसाल है। इसीलिए तिल-तिल घटते इस पहाड़ की लोग लोट-लोट कर परिक्रमा पूरी करते हैं।
ऐसे हुई परिक्रमा की शुरुआत
ईश्वर में आस्था है, तो उलझनों में भी रास्ता है। इस कथन में विश्वास रखने वाले मन मोहन राठी का विभाजित भारत में वर्ष 1954 में सहारनपुर में संयुक्त परिवार में जन्म हुआ। श्री राठी के माता-पिता भी अत्यंत धार्मिक स्वभाव के थे। अत: धार्मिक भावना उन्हें विरासत में मिली।
55 वर्ष की आयु में उन्हें परमात्मा के सत्यस्वरूप को पहचानने की दिव्य अनुभूति हुई। उन्हें ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता के प्रति खिंचाव महसूस हुआ। इसी से प्रेरित हो पहली दंडवती परिक्रमा वर्ष 1978 में लगायी फिर गृहस्थ जीवन से बीच-बीच में अवकाश लेकर परिक्रमा लगाते रहे। वर्ष 2010 में इकलौते पुत्र के विवाह के बाद, परिवार सहित महानगर मुंबई के महेश नगर, गोरेगांव पश्चिम में बस गए।
विषम परिस्थिति भी बनी सहज
शुरुआती दिनो में व्यापार में घाटा हुआ और वर्ष 2012 में एक समय ऐसा भी आया कि वापस सहारनपुर जाने के बारे में सोचना पड़ा। लेकिन तभी ठाकुरजी की परिक्रमा का मन बना और गोवर्धनजी चले गए। तब से आज तक प्रत्येक माह में 10 दिन गोवर्धनजी रहकर दंडवती परिक्रमा लगा रहे हैं और फ़िर ऐसा कुछ चमत्कार हुआ कि सहारनपुर वापस जाने के बारे में कभी सोचने की जरुरत ही नहीं पड़ी।
चाहे झुलसती धुप हो, कंपकपाती ठण्ड या फिर चाहे घनघोर बरसात हो किसी बाधा से नहीं घबराते। भगवान की दिव्य अलौकिक शक्ति से पथरीली राह भी उन्हें पुष्पों सी कोमल लगने लगती है। अब तक ठाकुर जी की कृपा से 125 से ज्यादा दंडवती परिक्रमा लगा चुके हैं और इसके साक्षी है स्वयं श्री ठाकुर जी। ठहरने का स्थान माहेश्वरी भवन गोवर्धन और परिक्रमा का संकल्प दिलाने वाले पर परम पूज्यनीय गोसाई जी, श्री हर्षवर्धन कौशिक।
परिवार भी साथ-साथ
इस के साथ राठीजी परिवार में मुखिया की जिम्मेदारी या व्यापार की जिम्मेदारी या रिश्तेदारी या समाज के प्रती जिम्मेदारी हो सब को अच्छे से भली भाति निभा रहे हैं। भाजपा और आरएसएस को आदर्श मानते हुए राजनीति में और क्रिकेट में बहुत रूचि रखते हैं। परिवार में अपने इकलौते पोते कल्प ऋषि राठी के बहुत करीब है। उनकी बस अब एक कामना है ठाकुर जी से, जब तक जीवन है ये क्रम यू ही बना रहे।
कैसे कह दू की मेरी हर पुकार बेकार हो गई,
मै जब भी रोया मेरे श्याम को खबर हो गई।
-मनमोहन राठी










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