Articles

कल आज और कल

आज से 30-40 साल पहले का बचपन देखें तो हर शाम गली में बच्चों का शोर सुनाई देता था। गर्मी में मोहल्ले की गलियों में बच्चे खेलते नज़र आते थे। सितोलिया, रस्सी कूद, पहल दूज, बैडमिंटन, क्रिकेट, पोसंबा भाई पोसंबा, रात को गलियों में छुपन-छुपाई और न जाने क्या क्या? घर में एक टीवी हॉल हुआ करता था।

वहीं सब के दिन भर के कार्यों पर बातें हो जाती थी। घर के टीवी ने हर कमरे तक जगह बनाई। टीवी के बाद कम्प्यूटर, लैपटॉप, मोबाइल सबके हाथों पहुँच गया। हॉल में एक ही महत्वपूर्ण सदस्य और हुआ करता था टेलीफोन और क्या सदस्य ही तो था, जो अकेला रिश्तों के तार जोड़े रखता था। समय बदलता गया। हम उन्नति करते गए ना जाने बचपन कहाँ खो गया।

परेशानी का सबब बनता मोबाइल:

विकास की ओर बढ़ते इस युग में अभिभावकों की परेशानी बना, बच्चों का मोबाइल और टेबलेट की ओर बढ़ता रुझान। परेशानी का जन्मदाता कौन? क्या बच्चों ने जन्म लेते ही मोबाइल क्या है, जान लिया था? कहीं अभिभावक स्वयं ही तो परेशानी का कारण? क्षमा चाहूंगी, लेकिन ये एक कटु सत्य है।

हम अभिवावक स्वयं ही रूचि जागृत कर रहें हैं, बच्चों को इन सब गैजेट की ओर आकर्षित हम ही कर रहें हैं। छोटे बच्चों को खाना खिलाने के लिए मोबाइल प्रलोभन। मकसद बस कार्टून देखते-देखते जल्दी खाना खत्म हो जाए। मम्मी को कुछ काम करना है या मेहमान घर पर आएं तो बस बच्चे को मोबाइल दे देना। “बेटा गेम खेल में ये काम कर लूँ”। पार्टियों में भी देखें तो बच्चे फ़ोन पर गेम खेलते दिख जाएंगे।

बंद कमरे में घंटों फ़ोन के साथ बंद रह सकते हैं। साथ ही हैडफ़ोन भी मिल जाए तो सोने पे सुहागा। इसलिए हर अभिवावक शिकायत करता दिखेगा की दिनभर फ़ोन पर लगा रहता है या लगी रहती है। बिल गेट्स ने अपने बच्चों को 14 साल की उम्र तक मोबाइल नहीं दिया था। एप्पल के संस्थापक स्टीव जॉब्स ने अपने एक इंटरव्यू में बताया की उन्होंने अपने बच्चों को आईपैड इस्तेमाल नहीं करने दिया था। विदेशों में 8-10 साल तक के बच्चों को मोबाइल और टीवी से दूर रखा जाता है। और हम है की कभी-कभी स्टेटस सिंबल बना देते हैं।

कल अर्थात लगभग 30 – 40 वर्ष पूर्व का दौर। उसका चिंतन करें तो आज तक में बहुत कुछ बदल गया है, जो सैकड़ों सालों में नहीं बदला था। इस बदलाव की स्थिति में विचारणीय है की यदि यही रफ़्तार रही तो आने वाला “कल” कैसा” होगा? इन सबका प्रभाव सबसे अधिक बच्चों और उनके बचपन पर पड़ा है।

अम्बिका हेड़ा, अजमेर

हमसे दूर जा रहे हैं बच्चे:

शोधकर्ताओं की बातों को भी अगर हम ना माने तो क्या हम ये नहीं मानते डिजिटल उपकरणों का प्रयोग हमारे बच्चों के जीवन में इतना बढ़ रहा है की बच्चे हम से भी दूर जा रहे हैं। इससे पारिवारिक वार्तालाप समाप्त हो रहा है। अभिवावकों के साथ कहीं जाने से बच्चे जी चुरा रहे हैं। शारीरिक श्रम कम होता जा रहा है। वे बातों को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं। छोटे बच्चों को चश्मा जल्दी लग रहा है।

आउटडोर एक्टिविटी कम हो रही है। सोचने की क्षमता कम हो रही है क्योंकि सब कुछ इंटरनेट पर मिल जाता है आदि। याद रखें बच्चे हमारा भविष्य है, हमारा कल हैं, जब तक हो सके मोबाइल, टीवी से बच्चों को दूर रखें। मोबाइल से दूर रखने के लिए बच्चों में अतिरिक्त गतिविधियों की ओर रूचि पैदा कीजिए। बच्चों को उनकी पसंदीदा गतिविधि में व्यस्त रखिए। चाहे वो बागवानी हो, चित्रकला हो, संगीत हो या कुकिंग। बच्चे आउटडोर गेम्स खेलें उस पर जोर दीजिए।


Subscribe us on YouTube

Via
श्री माहेश्वरी टाइम्स
Back to top button