सुखद जीवन की रहस्यमयी विद्या- स्वर विज्ञान

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स्वर विज्ञान एक रहस्यमयी विद्या है। इसकी खोज प्राचीन समय में ही ऋषि मुनियों ने की थी। ऐसा भी कहा जाता है कि माता पार्वती ने शिवजी से पूछा था कि, संसार में आप हर मनुष्य के पास कैसे रहते हैं? तो उनका जवाब था, मैं हर व्यक्ति के पास उसकी श्वांस में रहता हूँ। स्वर विज्ञान पूर्णत: वैज्ञानिक एवं रहस्य के साथ रोमांच से भी भरा हुआ है। कभी इस विद्या का प्राचीन भारत में जनसाधारण में भी प्रयोग होता था परंतु कालांतर में यह विद्या लुप्त सी हो गयी है। वास्तव में यह इतनी प्रभावी है कि इसका उपयोग दैनिक जीवन में किया जाऐ तो अधिकांश समस्याऐं स्वत: नष्ट हो जाऐंगी।


इस शास्त्र को ‘‘शिव स्वरोदय’’ भी कहते हैं। भगवान आशुतोष ने माँ पार्वती को स्वरविद्या का ज्ञान दिया था जो अपने आपमें विलक्षण एवं विचित्र है। इस विद्या से लौकिक और अलौकिक सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं। स्वर योग का संंबंध हठयोग से भी है।

बायीं नासिका से जब श्वांस चलती है तो ‘हं’ कहते हैं और दायीं नासिका से श्वांस चलती है तो ‘ठं’ कहते हैं। इस प्रकार ‘हं’ ‘ठं’ से मिलकर हठयोग बना, जिसका सांसों से संंबंध है। इस ज्ञान की विशेषता ये है कि मनुष्य जो भी अपने जीवन में बनना चाहता है, वह सफल होगा कि नहीं इस विद्या से जान सकता है।

नाड़ियों पर आधारित सब कुछ शास्त्रों के अनुसार हमारे शरीर में 72 हजार 864 नाड़ियाँ हैं, जिनमें 24 नाड़ी प्रमुख होती हैं। उनमें 10 कुछ ज्यादा प्रमुख नाड़ियाँ होती हैं और इन 10 नाड़ियों में 03 अति महत्वपूर्ण नाड़ियां हैं जो कि हमारे जीवन में प्राण संचारित करती हैं, वे हैं इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।

यहां पर नाड़ी से तात्पर्य धमनियाँ या वे नसें नहीं हैं जिनमें रक्त का प्रवाह होता है बल्कि इनसे तात्पर्य यह है कि वह मार्ग है जिनमें प्राण संचारित होते हैं। जो एक्टिवली हमारे जीवन में कई कार्यों के लिए जिम्मेदार होती है। जो बदलती भी है और इन्हें बदला भी जा सकता है। सामान्यत: दोनों स्वर 60 से 80 मिनिट में बदलते रहते हैं।

आयुर्वेद में यह कहा जाता है कि यदि आप शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ रहना चाहते हैं तो तीन नाड़ियों में जो रूकावटें हैं उनको दूर कर लें तो आप जीवन पर्यन्त स्वस्थ रहेंगे मतलब कि नाड़ियों में संतुलन बना लें। हमारी दिन में कई बार ये नाड़ियाँ बदलती रहती हैं। इड़ा मन से संबंधित कार्य के लिए है और पिंगला शरीर से संबधित कार्य के लिए। एक पुरूष है तो एक स्त्रीतत्व नाड़ी। एक नैगेटिव है, तो एक पॉजिटिव। अत: दोनों का संतुलन आवश्यक है। जैसे-जैसे हमारी नाड़ियाँ संतुलित होती जाएंगी हमारा जीवन भी संतुलित होता जाएगा।


इड़ा नाड़ी

इसे चंद्र स्वर व चंद्र नाड़ी तथा स्त्री नाड़ी भी कहते हैं। यह नाड़ी बायीं नासिका से संचारित होती है। इसका रंग सफेद एवं पीला है। इसका स्वभाव ठंडा, शीतल और पॉजिटिव होता है। यह नाड़ी हमारी मानसिक ऊर्जा से संबंधित है।

स्वर

यह नारीत्व का भी प्रतिनिधित्व करती है। इसका उद्गम स्थल मूलाधारचक्र है। यह नाड़ी अंतर्मुखी करने वाली है। इसका संबंध हमारे दिमाग के दाहिने (राईट हेमेस्फीयर) से है। इड़ा नाड़ी को अमृत रूप भी माना गया है जो कि जगत का पालन करती है और यह सभी शुभ कार्यों को पूर्ण करती है। जिस व्यक्ति की इड़ा नाड़ी ज्यादा एक्टिव होती है वह व्यक्ति मानसिक रूप से ज्यादा सक्षम होता है।

इस नाड़ी का जैसे जैसे प्रयोग बढ़ता है उसकी बुद्धि का विकास होने लगता है। जब इड़ा स्वर चल रहा हो व यदि पृथ्वी व जल तत्व साथ में हो वह व्यक्ति अपना कोई कार्य किसी वरिष्ठ या ऊंचे ओहदे के व्यक्ति से करवाना चाहता है तो वह उस कार्य में सफल होगा। छोटी यात्राओं के लिए इड़ा स्वर सदैव शुभ रहता है। चंद्र नाड़ी को सम समझा जाता है।

इड़ा नाड़ी में करें ये कार्य:

पूजा करें, आभूषण धारण करें, संग्रह करें, कुआँ बनवाएँ, खम्बे गाढ़ें/पताका लगायें, यात्रा करें, विवाह करें। अलंकार धारण करें, पौष्टिक कार्य करें, मालिक से मिलें/राजकार्य को जायें, रसायन बनाएँ/खाएँ, गृह प्रवेश करें/जमीन खरीदें, खेती करें/उद्यम करें, सन्धि करें/करवाएँ, शिक्षा का शुभारम्भ करें, धार्मिक अनुष्ठान करें, सिद्धि प्राप्त करें। काल का ज्ञान प्राप्त करें, पशु खरीदें तथा घर लाएँ, हाथी घोड़े की सवारी करें, परोपकार करें, नाट्य करें/करवायें, यात्रा के समय गाँव या शहर में प्रवेश करें, स्त्रियाँ अपना बनाव श्रृंगार करें, तपस्या करें/कुण्डलिनी जाग्रत करें, दूर देश की यात्रा करें, गृहस्थ धर्म का पालन करें, धरोहर रखवा लें, तालाब बनवाएँ/पशुशाला बनायें, प्रतिष्ठा करें।

दान करें/मंदिर बनवायें, वस्त्र धारण करें, शान्ति हेतु कार्य करें, दिव्य औषधि बनाएँ/खाएँ, मित्रता स्थापित करें, व्यापार करें/नौकरी करें, यात्रा करें/वाहन खरीदें, भाइयों से मिलें, दीक्षा लें/यज्ञोपवीत पहनें, वेदाध्ययन करें/डिग्री लेने जायें, असम्भव रोगों की चिकित्सा करें/करवाएँ, गाना बजाना करें/ मनोरंजक कार्य करें, तिलक लगाएँ/लगवाएँ, जमीन जायदाद खरीदें, गुरु का स्वागत पूजन करें, विष स्तम्भन या नाश का उपाय करें, योगाभ्यास करें, योगासन करें। ये सभी कार्य जलतत्व में ही करें।


पिंगला नाड़ी

ये नाड़ी सूर्य स्वर के नाम से जानी जाती है। इसका स्वभाव गर्म होता है। यह हमारे दायीं नासिका से संचालित होती है। इसका रंग लाल है। इसको डोमिनेंट फैक्टर या इसे नैगेटिव नाड़ी भी माना जाता है। यह हमारे ब्रेन के बायें हिस्से (लेफ्ट हेमेसफियर) से संबंध रखती है। इसको पुरुष नाड़ी भी कहते हैं।

इसका उद्गम स्थल है मूलाधार चक्र। यह मूलाधार चक्र के दाहिने हिस्से से निकलकर दायीं नासिका में पहुंचती है। जब हमारे दाहिने नासिका से श्वांस का फ्लो है तो हम समझ सकते हैं कि प्राण दाहिने स्वर यानि पिंगला स्वर में चालू है। जिसके शरीर में पिंगला फ्लो ज्यादा बहता है वह शारीरिक रूप से ज्यादा काम करने वाला होगा और उसके लिए शारीरिक कार्य ही उचित होता है।

जब हम इनरजेटिक समझते हैं तब ये माना जाना चाहिए कि पिंगला नाड़ी का प्रयोग अधिक है। यदि किसी व्यिक्त का पिंगला स्वर पृथ्वी या जल तत्व के साथ हो ऐसे में वह अपने से नीचे ओहदे के व्यक्ति से कोई कार्य करवाना चाहता है तो निश्चित रूप से उस स्थिति में वह उसका कार्य करेगा, उसकी बात को मानेगा।

इसका प्रयोग जब शारीरिक कार्य जैसे कसरत, युद्ध करना ऐसा कोई कार्य जो श्रम से संबंधित है उसमें सफलता के लिये किया जाता है।

पिंगला नाड़ी में करें ये कार्य:

कठिन विद्या को पढ़ें या पढ़ाएँ, शास्त्राध्ययन करें, अस्त्र-शस्त्र अभ्यास व तन्त्र साधना करें, पहाड़ पर चढ़ें, वाहन पर चढ़ें, आकर्षण कर्म करें, अस्त्र-शस्त्र धारण करें, सांसारिक उपभोग करें, भोजन करें, अस्त्र-शस्त्र बनाएँ, यात्रा करें (दूर की), व्यायाम करें,अक्षरों का लिखना प्रारम्भ करें, विदेशी भाषा पढ़ें, इतिहास पढ़ें, स्नान करें, भरपूर सोया करें।


सुषुम्ना नाड़ी

जब प्राण का प्रवाह दोनों नासिका से चल रहा हो उसे सुषम्ना नाड़ी व सुषुम्ना स्वर एवं मध्य नाड़ी भी कहते हैं। इसको संतुलन की नाड़ी भी कहते हैं। इसका प्रयोग ध्यान, योगाभ्यास, प्राणायाम, भक्ति आदि कार्यों में होता है।

चूंकि सुषुम्ना स्वर में अग्नि का वास होता है इसलिये सांसारिक कार्य निषेध माना गया। जब यह स्वर चलता है उस समय कोई भी सांसारिक कार्य सफल नहीं होता। इसलिए सुषुम्ना स्वर में सांसारिक कार्य नहीं करना चाहिये। इस स्वर का समय सामान्यत: चार मिनिट माना जाता है।

वैसे यह हर व्यक्ति की प्रकृति पर भी निर्भर करता है। ऐसा देखा गया है कि जब संध्या का समय होता है तब सुषुम्ना नाड़ी के चलने की संभावना सबसे अधिक होती है। यह नाड़ी न तो नैगेटिव और न पॉजिटिव होती है। न स्त्रीप्रधान होती है न पुरूष प्रधान। सुषुम्ना में स्वर संचालित होता है तो हमारे चक्रों का जागरण होता है और वह कुंडली जागरण का कार्य करती है।

सुषुम्ना नाड़ी में करें ये कार्य:

जब सुषुम्ना स्वर चल रहा हो तब चर व स्थिर कार्य न करें। मकान, मंदिर आदि की प्रतिष्ठा कार्य सुषुम्ना स्वर में नहीं करना चाहिये और न ही परदेश जाना चाहिए। सुषुम्ना स्वर में जो कोई विदेश जायेगा तो दुर्भाग्य, कष्ट और पीढ़ा और उसके चित्त में क्लेश बना रहेगा।


स्वर-परिवर्तन की विधियाँ

  • जो स्वर चलाना चाहो, उसके विपरीत करवट बदलकर उसी हाथ का तकिया बनाकर लेट जाओ। थोड़ी देर में स्वर बदल जायेगा। जैसे यदि सूर्यस्वर चल रहा है और चंद्र स्वर चलाना है तो दाहिनी करवट लेट जाओ।
  • कपड़े की गोटी बनाकर या हाथ के अंगूठे से नासिका का एक छिद्र बंद कर दो। जो स्वर चलाना हो, उसे खुला रखो, स्वर बदल जायेगा।
  • बगल में तकिया दबाकर रखने से भी स्वर बदल जाते हैं।
  • अनुलोम-विलोम, नाड़ी शोधन, प्राणायाम, पूरक, रेचक, कुम्भक, आसान तथा वज्रासन से भी स्वर-परिवर्तन हो जाता है। स्वर-परिवर्तन में मुँह बन्द रखना चाहिये। नासिका से स्वर-साधन करें।

चलित स्वर की प्रधानता में कार्य

  • प्रातःकाल सूर्योदय काल के बाद भी चलित स्वर वाली करवट से उठो और बैठकर उसी तरफ की हथेली के दर्शन कर मुँह पर फिर चेहरे पर घुमाओ, फिर सारे शरीर के हाथ-पैर पर घूमाओ। इसके बाद मंत्र बोलो-

कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्।।

अर्थात् हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में ब्रह्मा का निवास है। ऐसे पवित्र हाथों का प्रातःकाल स्वर के साथ दर्शन करना चाहिये। कर्म का प्रतीक हाथ ही है। कुछ भी प्राप्त करने के लिये कर्म जरूरी है। इसके बाद बिस्तर त्याग के साथ जिस ओर का स्वर चल रहा हो, उसी ओर का पैर पृथ्वी पर बढ़ाये और मंत्र बोलें-

समुद्रवसने देवि पर्वस्तनमण्डिते।
विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।।

अर्थात् समुद्र रूपी वस्त्रों को धारण करने वाली, पूर्व रूपी स्तनों से मण्डित भगवान् विष्णु की पत्नी पृथ्वी देवि! आप मेरे पादस्पर्श को क्षमा करें। इस मंत्र से सिद्ध होता है कि भारतीय संस्कृति में जड़ वस्तुओं में चेतन को देखने की क्षमता है। तत्पश्चात् चलित स्वर के अनुसार कदम बढ़ाये। यदि चंद्रस्वर है तो 2,4,6 सम में और सूर्य स्वर है तो 1,3,5 विषम में कदम बढ़ाये। ऐसा करने से दिन का प्रारंभ शुभ होता है और इच्छित कार्य में सफलता मिलती है। आरोग्यता के साथ मनोकामना सिद्ध होती है।

  • चलित स्वर की ओर से हाथ-पैर डालकर कपड़े पहनने से प्रसन्नता बनी रहती है।
  • दूसरे को देने में, उससे ग्रहण करने में, घर से बाहर जाने पर जिस तरफ का स्वर चलित हो उसी हाथ तथा पैर को आगे करके कार्य करने में सफलता मिलती है। ऐसा करने से व्यक्ति सर्वदा सुखी और उपद्रवों से बचा रहता है।
  • चलित स्वरों के अंगों को प्रधानता देकर हर स्थिति में कार्य किया जा सकता है और सफलता प्राप्त होती है। स्वर-ज्योतिष की जानकारी से मनुष्य शरीर और मन को नियंत्रित कर रोग, कलह, हानि, कष्ट और असफलता को दूर कर सकता है, इसके साथ ही वह जीवन को आनन्दमय बनाकर परलोक को भी सुधारकर कल्याण को प्राप्त हो सकता है।

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