संवत 2079 में ग्रहों का मंत्री मंडल, ग्रह राशि परिवर्तन एवं जनमानस पर प्रभाव

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भारतीय नववर्ष विक्रम संवत् 2079 का आरम्भ हो चुका है। इसके साथ ही ‘‘नव संवत्’’ में ग्रहों का मंत्री मंडल में तो परिवर्तन हुआ ही है, लेकिन इस वर्ष खास रूप से प्रथम माह में ही कई बड़े ग्रह भी अपना राशि परिवर्तन कर रहे हैं। ऐसे में इन सभी का जनमानस पर प्रत्यक्ष प्रभाव महसूस होगा। तो आईये जानें इनका क्या होगा प्रभाव?

संवत 2079 का आगाज चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होगा। इसी दिन चैत्र नवरात्रा का प्रारंभ होगा। नल नामक इस संवत्सर में सौर मण्डलीय मंत्री मण्डल के राजा शनिदेव एवं मंत्री देवगुरु बृहस्पति रहेंगे। नववर्ष में मंत्री पद के कुल 10 पदों में से 5 विभाग पाप ग्रहों के पास तथा पांच विभाग शुभ ग्रहों के पास हैं।

इस वर्ष का सौर मण्डलीय मंत्री मंडल इस प्रकार है- राजा-शनिदेव, प्रधानमंत्री देवगुरू बृहस्पति, सेनापति (रक्षा विभाग) बुध सस्येश, (ग्रीष्म कालीन फसलों के स्वामी) शनिदेव, धान्येश (शीतकालीन फसलों के स्वामी)- शुक्र हैं। मेघेष (वर्षाकाल के स्वामी)- बुध, रसेश (रसदार उत्पादन)- चंद्र, नीरसेश (धातुओं के स्वामी)- शनिदेव हैं व वित्त विभाग भी शनिदेव के पास होगा। फलनायक (फल फूल के स्वामी) मंगल होंगे। इस वर्ष रोहिणी का निवास सागर में और संवत्सर का निवास माली के घर है।


कैसा रहेगा नववर्ष

नवसंवत्सर एवं उक्त सौर मण्डलीय विभाग वितरण के फलस्वरूप अन्न जल विभाग के अधिकारी क्रोध में रहेंगे, चोरों का भय होगा। चैत्र में रोग पीड़ा, प्रचण्ड वायु, लू रहेगी। वैशाख माह में अन्न संग्रह के योग हैं परंतु उपद्रव बढ़ेंगे। ज्येष्ठ में राज विग्रह, आपस में विरोध, आषाढ़ में अल्पवृष्टि, धान्य में तेजी, भाद्रपद में खण्डवृष्टि, धान्य में तेजी रहेगी।

आषाढ़ में अन्न संग्रह करें व आश्विन में बेचें। भाद्रपद में खण्डवृष्टि, तेजी, कार्तिक सामान्य, अगहन-पौष माह में बीमारी, भाव-ताव साधारण, फाल्गुन में रोग, उपद्रव, चोर भय बनेगा। उत्तर में तेजी, दुष्काल, भय और पूर्व में सुकाल रहने के योग हैं। नववर्ष प्रवेश मिथुन लग्न में होगा जो द्विस्वभाव, वायु तत्व राशि है।

वर्ष लग्न का स्वामी बुध दशम भाव में विराजमान है। इस वर्ष आर्थिक संपदा, मुद्राकोष, बैंक आदि में नवीन नीति सूत्रों का निर्धारण होगा। आर्थिक क्षेत्र में गिरावट के संकेत हैं। देश-विदेश के राष्ट्र नायक सीमा संभाग सुरक्षा की दृष्टि से परस्पर विरोधाभास से ग्रसित रहेंगे। रक्षा पर व्यय प्रभार बढ़ेगा।


वर्षांतर्गत ग्रह राशि परिवर्तन

नववर्ष के प्रारंभ होते ही अप्रैल माह में सभी 9 ग्रह गोचर भ्रमणवश, निम्नानुसार राशि परिवर्तित करेंगे। सूर्य देव 14 अप्रैल को अपनी उच्च राशि मेष में, मंगल 07 अप्रैल को कुंभ राशि में, बुध 8 अप्रैल को मेष राशि, देवगुरू बृहस्पति 13 अप्रैल को मीन राशि में प्रवेश करेंगे। राहु एवं केतु 12 अप्रैल को क्रमश: मेष व तुला राशि में प्रवेश करेंगे।

वहीं न्यायाधीश सूर्य पुत्र शनिदेव भी इसी माह 29 अप्रैल 2022 को कुंभ राशि में प्रवेश कर जायेंगे, परंतु 12 जुलाई को वक्री होकर पुन: मकर राशि में जायेंगे। 17 जनवरी 2023 को पुन: कुंभ राशि में भ्रमण होगा। कुंभ राशि में गतिशील शनि के प्रभाव से तुला एवं मिथुन राशि के जातक शनि की ढैया से मुक्त होंगे।

कर्क एवं वृश्चिक राशि पर ढ़ैय्या प्रारंभ होगी। वहीं धनु राशि से शनि की साढ़े साती उतर जायेगी। मीन राशि पर शनि की साढ़े साती प्रारंभ होगी तथा मकर एवं कुंभ राशि पर साढ़े साती यथावत रहेगी।

ग्रहों का राशि परिवर्तन मानव जीवन को प्रभावित करता है, शुभ अथवा अशुभ फलों की प्राप्ति से प्राय: सभी राशियां प्रभावित होती हैं। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गोचर फलित का प्रभाव जन्मकुंडली में स्थित ग्रहों एवं दशान्तर्दशा के अधीन होता है।


ग्रहों का राशियों पर प्रभाव

  • मेष- मेष राशि को द्वादश गुरु पूज्य होगा। आर्थिक पक्ष की मजबूती एवं व्यावसायिक सफलता के लिए प्रयत्नशील रहना पड़ेगा। सामाजिक, मानसिक, पारिवारिक शांति बनी रहेगी। कुंभ राशि में ग्यारहवां शनि आमदनी के स्त्रोत बढ़ायेगा। परंतु मेष का राहु अशांति देगा लेकिन धन धान्य की वृद्धि, संतान के लिए शुभ रहेगा। सप्तम स्थान का केतु मान सम्मान में वृद्धि करेगा। अचानक धन धान्य की वृद्धि करेगा। ‘‘ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय’’ मंत्र का जप करें, शिवलिंग पर जल चढ़ायें।
  • वृष- वृष में गुरु के एकादश (लाभ) स्थान पर भ्रमण करने से आर्थिक पक्ष की मजबूती होगी। गुरु शुभ फलदायक होगा। व्यावसायिक सफलता के लिए मजबूत रहना पड़ेगा। स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहें, मानसिक तनाव रहेगा। राजकीय सहयोग एवं आर्थिक लाभ होगा। जन्म कुंडली में शनि की स्थिति शुभ होगी तो दशमस्थ शनि राजयोग कारक बनेगा। पिता को सम्मान मिलेगा। आपकी राशि से बारहवाँ राहु घर से दूर स्थानांतरण के योग बनायेगा। कार्य अधिकता के कारण व्यस्तता बढ़ेगी। छटे स्थान का केतु शत्रुओं से भय, नेत्र पीड़ा, खर्च की अधिकता, कार्य संपादन में बाधा उत्पन्न करता है। केतु मंत्र के जप करें, शिवजी को जल अर्पित करें। कुलदेवी की पूजा करें।
  • मिथुन- दशमस्थ गुरू पूज्य होता है। आर्थिक व्यावसायिक क्षेत्र में मजबूती बढ़ेगी। राज्य पक्ष से सफलता, धन लाभ के योग बनेंगे। स्वास्थ्य के प्रति सतर्क रहें। वाणी पर संयम रखें। नवम (भाग्य) भाव में शनि का विचरण शुभ कारक रहेगा। भाग्योन्नति के साथ उत्थान के मार्ग प्रशस्त होंगे। एकादश (लाभ) स्थान का राहु भी शुभ फल प्रदान करेगा। दान-पुण्य में रूचि बढ़ेगी। मित्रों से कष्ट, संतान के लिए कष्टप्रद हैं। पंचम स्थान का केतु संतान के लिए कष्टकारी व भाग्योदय में बाधक बनेगा। लग्न कुंडली में बुध की स्थिति ठीक हो, केंद्र में स्थित हो, उच्च गत स्वराशिस्थ हो तो पन्ना धारण करें। गणेशजी को हरी दूब चढ़ायें, संकट नाशन गणेश स्त्रोत के पाठ प्रतिदिन करें।
  • कर्क- भाग्य स्थान पर गुरु का विचरण शुभ है, व्यावसायिक सफलता के लिए प्रयत्नशील रहें। सामाजिक स्थिति में अनुकूलता आयेगी। शनि की ढैया प्रारंभ होगी। अत: स्वास्थ्य के प्रति सावधान रहें। मानसिक तनाव बढ़ेगा। आपकी राशि पर राहु केतु का भ्रमण लाभकारी है। शनि की वस्तुओं का दान करें, शनिवार का व्रत करें। दशरथकृत शनि स्त्रोत का पाठ लाभकारी बनेगा।
  • सिंह- अष्टम स्थान का गुरू प्रतिकूल प्रभाव में होगा। अधिक श्रम के फलस्वरूप भी उचित लाभ नहीं मिलेगा। सामाजिक कार्यों में अवरोध उत्पन्न होगा, संतान कष्ट, धनोपार्जन में बाधक होगा। सप्तमस्थ शनि हालांकि अनुकूल हैं, साझेदारी में बाधक होगा। सप्तमस्थ शनि हालांकि अनुकूल है, साझेदारी में बाधक रहेगा। पति-पत्नी के स्वास्थ्य में अचानक कमजोरी हो सकती है। नवम भाव में राहु के विचरण से अचानक भाग्योदय, लाभ एवं राज्य मित्रों से सहयोग के योग बनेगे। तृतीय भाव का केतु भी भाग्यवृद्धि, शत्रुओं पर विजय एवं मित्रों से लाभ कराता हैं। गुरु से संबंधित वस्तुओं का दान करें। गोपाल सहस्त्रनाम के पाठ करें।
  • कन्या- सप्तम गुरु, षष्ठम शनि श्रेष्ठ रहेंगे, वाणी पर संयम बरतें, स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें, धन लाभ रहेगा। व्यर्थ के खर्चों से बचें। आर्थिक-सामाजिक कार्यों में सुधार होगा। रचनात्मक कार्यों में धन का व्यय होगा। अष्टम भाव का राहु यदाकदा दीर्घकालीन रोग दे सकता है। दूसरे स्थान का केतु अचानक धन वृद्धि एवं नेत्र पीड़ा दे सकता है। शिवजी की पूजा करें, शिव चालीसा के पाठ करें।
  • तुला- छठा गुरु मिश्रित प्रभाव देगा, अधिक श्रम करने से ही सफलता मिलेगी। व्यवसाय में भाग्य एवं कर्म के प्रारब्ध का सहयोग मिलेगा। आर्थिक लाभ, पद प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। पंचम शनि शुभ है, संतान पक्ष को लाभकारी होगा। सप्तम स्थान पर भ्रमणशील राहु अचानक व्यापार में वृद्धि, राज्य व मित्रों से लाभ करायेगा, मानसिक अशांति देगा। प्रथम भाव का केतु मान-प्रतिष्ठा, धन धान्य की वृद्धि, संतान को लाभकारी है। राम रक्षा स्त्रोत के पाठ निरंतर करें।
  • वृश्चिक- पंचम गुरु शुभ है, संतान के लिए विशेष लाभकारी बनेगा। महत्वाकांक्षी योजनाओं में लाभकारी। आर्थिक सामाजिक कार्यों में सुधार होगा। चांदी के पाये से प्रारंभ हो रही शनि की ढैय्या शुभ एवं लाभकारी होगी। वृश्चिक राशि वालों के लिए दीर्घकालीन रोग वृद्धि करता है। नेत्रपीड़ा देता है, धन हानि, मानहानि एवं आय में कमी कर सकता है। द्वादश स्थान पर गतिशील केतु भी खर्च ज्यादा करायेगा, सुख की हानि, निवास स्थान से दूर प्रवास कराता है। शिवजी की आराधना भक्ति लाभकारी है। देवी के नवार्ण मंत्र का जप करें, कुलदेवी की पूजा करें।
  • धनु- चतुर्थ गुरू अशुभ है। श्रम अधिक करना होगा। शारीरिक, मानसिक तनाव, पारिवारिक सुख-शांति में कमी रहेगी। सत्कर्मों में रूचि बढ़ेगी। नवीन कार्य व्यवसाय के लिए आकर्षण बढ़ेगा। तृतीयस्थ शनि मनोबल में कमी ला सकता है। पंचम राहु प्रतिष्ठा व वैभव में वृद्धि करता है। शेयर दलाली आदि कार्यों से लाभ के संकेत हैं। भाग्य लाभ में वृद्धि के संकेत हैं। लाभ भाव का केतु धन वैभव की वृद्धि करता है। जन्म कुंडली में गुरु प्रतिकूल हो तो गुरु से संबंधित दान पुण्य अवश्य करें, गोपाल सहस्त्रनाम के पाठ नित्य प्रति करना लाभकारी होगा।
  • मकर- तीसरा गुरू पूज्यनीय है। व्यापारिक सफलता के लिए प्रयत्नशील रहना होगा। मानसिक तनाव रहेगा, स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहें, नियमित जांच आदि करायें। पारिवारिक सहयोग मिलेगा। तांबे के पाये से शनि की साढ़े साती का अंतिम चरण प्रारंभ होगा। जो शुभ रहेगा। परंतु चतुर्थ भाव का राहु अशुभ है। धन वैभव की हानि, दलाली व शेयर व्यापार से हानि होती है। पारिवारिक सुख शांति में बाधा हो सकती है, कृषि व्यापार में रूकावट के साथ धन प्राप्ति के योग बनेंगे। दशम केतु पूज्य होता है। वायु विकार, उदर विकार के कारण स्वास्थ्य बाधित रहेगा। केतु मंत्र के जप करें। रामरक्षास्त्रोत के पाठ करें।
  • कुंभ- आपकी राशि से दूसरे स्थान का गुरु शुभ होकर व्यापारिक क्षेत्र में लाभकारी होगा। स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतें, वाणी पर संयम रखें, व्यर्थ वार्तालाप से बचें। अच्छे कार्य व्यवसाय में धन खर्च होगा, शनि साढ़ेसाती चांदी के पाये से हृदय पर गतिशील रहेगी। जो शुभकारक ही होगी। तीसरा राहु शुभफलदायक होता है। शत्रुओं पर विजय, मित्रों से लाभ दिलाता है। अचानक भाग्योदय एवं धनदायक बनता है। नवम भाव में भ्रमणशील केतु अचानक भाग्योदय कराने में सक्षम है। संतान के लिए लाभकारी है। राम रक्षा स्त्रोत के पाठ नित्य प्रति करें। शनि संबंधी उपाय भी करते रहें।
  • मीन- मीन राशि वालों के लिए कुंभ का गुुरू अशुभ कारक बनेगा। कड़ी मेहनत के बाद भी जल्दी से सफलता हासिल नहीं होगी। कार्यावरोध बना रहेगा। शनि साढ़ेसाती का प्रारंभ स्वर्ण पाद से मस्तक पर होगा जो स्त्री परिवार के लिए कष्टकारक है। पुत्र से विरोधाभास, राज्यपक्ष से भय, व्यापार में नुकसान, मानसिक व शारीरिक व्याधि से परेशानी हो सकती है। द्वितीयस्थ राहु एवं अष्टमस्थ केतु भी परेशानियों का कारण बनेंगे। परंतु जन्म कुंडली में गुरु-शनि-राहु-केतु ग्रहों की उत्तम स्थिति होने पर अशुभ गोचरीय ग्रहों में कमी आयेगी। शनि-गुरु ग्रहों के उपाय करें। गजेंद्र मोक्ष के नित्य प्रति पाठ करें।

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