हम जागेंगे तभी बचेगा पर्यावरण

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वर्तमान में बिगड़ता पर्यावरणीय संतुलन सम्पूर्ण विश्व की गहन समस्या बनता जा रहा है। चाहे इसके संरक्षण के कितने ही दावे किये जाऐं लेकिन पर्यावरण लगातार और बिगड़ता जा रहा है। आइये जानें ख्यात पर्यावरणविद् व पीपुल फॉर एनीमल्स के राजस्थान प्रभारी बाबूलाल जाजू से इस समस्या का समाधान।

हमारे पास पीने का पानी नहीं है और जो है वह भी प्रदूषित हो रहा है। पर्यावरण का सवाल हमारे परिवेश का सवाल है। यह हमारे जीवन का मूलभूत प्रश्न है क्योंकि पर्यावरण की सुरक्षा पर ही हमारा जीवन निर्भर है। हवा प्रदूषित हो रही हैं। वन खत्म हो रहे हैं।

वनों में रहने वाले जीव, जिनका पर्यावरण सुरक्षा में सीधा योगदान होता है, वे खत्म हो रहे हैं, ऐसे में हम कैसे बचे रह सकते हैं? हम चाहे जितने भी धनी हो जाएं और जितने भी विकसित हो जाएं, उससे हमारा जीवन नहीं चलने वाला है। जीवन तो प्रकृति के साथ ही चलना है, इसलिये पर्यावरण की सुरक्षा उतनी ही जरूरी है, जितना जरूरी औद्योगिक विकास है। यह बुनियादी बात है, जिसे समझ कर ही हम अपने परिवेश को बचाने वाले किसी प्रयास की बात कर पायेंगे।


अंधाधुंध विकास ने बढ़ाई समस्या

भारत में पर्यावरण आंदोलन कोई बहुत पुराना आंदोलन नहीं है। चूंकि यहां औद्योगिक गतिविधियां देर से शुरू हुई और उसमें भी उदार आर्थिक-नीतियां को अपनाने के बाद ही तेजी आई, इसलिये पहले पर्यावरण को लेकर अपने यहां बहुत चिंता नहीं थी। इस लिहाज से देखें तो दूसरे विकसित देशों ने पहले तो अंधाधुंध विकास किया और खूब उद्योग धंधे लगाए। यह उन्होंने अपने और दूसरों के पर्यावरण की कीमत पर किया।

जब उनका विकास पूरा हो गया और खूब धन उनके पास आने लगा तो उस धन का इस्तेमाल पर्यावरण सुधार में करने लगें। इस तरह से उन्होंने पहले पर्यावरण को प्रदूषित किया और अब स्वच्छ बना रहे हैं। भारत ऐसा नही कर सकता है क्योंकि यहां तो अभी औद्योगीकरण की प्रक्रिया शुरू ही हुई है।

चूंकि यहां की बड़ी आबादी आज भी गरीबी रेखा के नीचे रहती है और बड़ी तादाद में लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं है, इसलिये विकास के काम रोके नहीं जा सकते हैं लेकिन अंधाधुंध विकास की होड़ में पर्यावरण का क्षरण भी नहीं होने दिया जा सकता है। यह भारत के लिये बड़ी दुविधा की स्थिति है। इस पर पर्यावरण सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन बिठाने की आवश्यकता है। इस लिहाज से भारत की चुनौती दूसरे देशों से कहीं ज्यादा कठिन है।


सम्मिलित प्रयास जरूरी

अपनी आंतरिक चुनौतियों के साथ-साथ भारत के सामने वैश्विक चुनौतियां भी हैं। कुछ गड़बड़ियां ऐसी हुई है, जिनमें भारत या अनेक दूसरे देश शामिल नहीं है, लेकिन वे उनका खाजियाजा भुगत रहे हैं, ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन इसका एक उदाहरण है। यह जग विदित तथ्य है कि कार्बन उत्सर्जन सबसे ज्यादा अमेरिका करता है और इसे रोकने के लिए हुई अंतर्राष्ट्रीय संधि को भी नहीं मानता है, लेकिन इसका नुकसान दुनिया के सभी देशों को भुगतना पड़ रहा है।

यह ग्लोबल वार्मिंग का एक मुख्य कारण है। इसलिये भारत को अपने आंतरिक मोर्चे पर जूझने के साथ-साथ वैश्विक मोर्चे पर भी जूझना है। इसी से पर्यारण को बचाने की जो वैश्विक पहल है उसका लाभ भारत को मिलना है। भारत में पर्यावरण सुरक्षा में जुटी सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं दुनिया की ऐसी संस्थाओं के साथ मिलकर इस चुनौती का मुकाबला कर रही हैं।

आज कोई भी देश ऐसा नहीं है, जो सिर्फ अपने दम पर यह दावा करें कि वह अपना पर्यावरण सुरक्षित रख लेगा। ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि धरती, आसमान, हवा, पानी आदि के साथ जो ज्यादती हो रही हैं वह अकेले यह देश नहीं कर रहा है। इसलिये उसे दुनिया के दूसरे देशों में चल रहे प्रयासों के साथ जुड़ना ही होगा। यह एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या है और इससे उसी ढंग से निपटना होगा।


जनजागृति का विकास जरूरी

चूंकि भारत में पर्यावरण का आंदोलन देर से शुरू हुआ इसलिये अभी बहुत लाभ नहीं दिखता है, लेकिन इस आंदोलन से जुड़ी सरकारी और गैर-सरकारी संस्थाओं ने पर्यावरण के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा की है और देश की पर्यावरण समस्या का काफी गहराई से अध्ययन कर इसके बारे में तथ्य जुटाए हैं।

अब लोग वनों, पेड़ों आदि के बारे में सोचने लगे हैं। लोग जब अपने परिवेश के बारे में गंभीरता से सोचने लगेंगे, तभी उन्हें नीति निर्धारकों पर दबाव बनाने के लिये तैयार किया जा सकता है। लोगों को जागरूक करने और पर्यावरण से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का अध्ययन कर लेने के बाद जरूरी है कि अब नीति बनाने वाले लोगों पर दबाव बनाया जाए कि वे औद्योगीकरण से लेकर आवास की समस्या हल करने तक जो भी नीति बनाएं, उसमें पर्यावरण सुरक्षा को सवौच्च प्राथमिकता दें। जब तक ऐसा नहीं होगा, हम सुरक्षित परिवेश नहीं हांसिल कर पाएंगे, लेकिन अफसोस की बात है कि भारत में अभी ऐसा नहीं हो रहा है।

देश की नीतियां आज भी विश्व बैंक के लोगों द्वारा तैयार की जा रही हैं। वे अपनी ही सोच रहे हैं और उनकी सोच भारत की जरूरतों के अनुकूल नहीं है। विकास का उनका फार्मूला हमारे लिए ठीक नहीं है। इसलिये हमें अपना फार्मूला खुद तलाश करना चाहिये। सबसे पहले तो विकास की पहल हम अपनी क्षमता के हिसाब से करें। ऐसा करने से कई समस्याएं खुद ब खुद सुलझ जाएंगी।

दूसरी बात यह है कि सरकार के नीति निर्धारकों की यह मानसिकता बदलनी चाहिये कि हम विकसित हो जाएंगे तो सारी चीजें अपने आप ठीक हो जाएगी। ऐसा नहीं होगा कि पहले विकास कर लें और फिर पर्यावरण के बारे में सोचें। दोनों काम साथ-साथ करने होंगे। तीसरी बात है लोगों की भागीदारी बढ़ाना- शामिल करने की। यह काम सरकार के स्तर पर हो सकता है। गैर सरकारी संस्थाएं तो लोगों को अपने अभियान में शामिल कर ही रही है।

अगर सरकार नीतिगत स्तर पर बदलाव के साथ-साथ अपनी और आम लोगों की मानसिकता में बदलाव की कोशिश भी करे तो अब भी बहुत देर नहीं हुई है। पर्यावरण सुधार के लिये प्रत्येक जनसाधारण को जी-जान से जुटकर पर्यावरण बचाने के यज्ञ में आहूति देने के लिए आगे आना होगा अन्यथा स्थितियां बेकाबू होती जा रही है।

‘‘अनमोल हैं पेड़-पौधे, पशु-पक्षी व पानी, इन्हें बचाइये।’’


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