राजस्थान के उद्गम के कारण माहेश्वरी समाज के लिये भी राजस्थानी पर्व गणगौर (Gangaur) विशिष्ट पर्व है। इस पर्व पर शिव-पार्वती की ईशर-गौरी के रूप में पूजा कर उनसे अखंड सौभाग्य की कामना सुहागिनें करती हैं।
भारत में देवी शक्ति स्वरूपा सती, भगवती, पार्वती, उमा, अम्बिका, भवानी, जगदम्बे, गवरजा आदि आदि हैं। विभिन्न प्रांतों में गौरी स्वरूपों और पूजा में भी अंतर दृष्टव्य है। जैसे बंगाल में काली पूजा, महाराष्ट्र में गौरी पूजा, गुजरात में अम्बा, राजस्थान में गणगौर। पार्वती का गौरी रूप भारतीय पौराणिक कथाओं में सुहाग की कामना के लिए विशेष रूप से वर्णित है। जनक सुता सीताजी ने पुष्पवाटिका में गौरी की पूजा करके उनसे मनोनुकूल वर और सौभाग्य की याजना की थी।
रूक्मणी ने विवाह पूर्व गौरी की पूजा कर प्रार्थी की कि अम्बिका, माता ऐसा आशीर्वाद दीजिए कि भगवान कृष्ण ही मेरे पति हों। शायद यही भाव रखते हुए गणगौर का पूजन सभी कुंवारी कन्याएं, नवविवाहित वधुएँ व सुहागिन स्त्रियाँ सामूहिक रूप से पूजन करती है। गणगौर का पूजन और व्रत कुंवारी कन्याएं सुयोग्य, मनवांछित पति, स्वस्थ सबल परिवार, उत्तम ससुराल और उज्ज्वल भविष्य पाने की कामना से करती है सौभाग्यवती स्त्रियाँ अपने सुहाग की अखंडता और समस्त श्रीवृद्धि की कामना से करती है।
क्यों है यह ‘‘गणगौर-पर्व’’
भारतवर्ष में अन्य तीज-त्यौहारों की भांति गणगौर तीज का भी बड़ा महत्व है। सदियों से राजस्थान वासियो द्वारा गणगौर त्योहार बड़े ही धूमधाम के साथ मानाया जाता है। गणगौर ‘गण’ और ‘गौर’ शब्दों के मेल से बना है। ‘‘गण’’ का अर्थ ‘‘शिव’’ और ‘‘गौर’’ का अर्थ ‘‘पार्वती’’ से किया जाता है परंतु लोक जीवन में गणगौर का अर्थ पार्वती तक सीमित रह गया है।
शिव के स्थान पर ईसर शब्द प्रचलित है। ऐसे गणगौर को और भी कई नाम गवरल, गवरजा, गौंरा, गौरादे, गवरी से भी जाना जाता हैं माना जाता है कि गणगौर पूर्वजन्म में सती और ईसर महादेव थे। सती 18 दिन की साधना के बाद गौरी रूप में पुनः जीवित हुई, इसलिए यह त्यौहार 18 दिनों तक पूजने का क्रम आज तक चला आ रहा है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान शिव ने अंततः पार्वती की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अक्षय सौभाग्य का वरदान दिया और पार्वती ने अपनी सहज करूणा से इस विधि विशेष को संपूर्ण नारी जाति के लिए सौभाग्यशाली विधि के रूप में प्रचलित कर दिया तभी से यह त्यौहार चैत्र बदी प्रतिपदा से चैत्र सुदी तृतीया तक यानी 18 दिनों तक मनाया जाता है।
संस्कृति का भी दर्शन
‘खेलण दो गणगौर’ भंवर म्हाने पूजन दो गणगौर- इस प्रसिद्ध गीता में गवर का खेलना पूजने से पहले आता है इसीलिए होता है गवर पूजने की पद्धति धार्मिक क्रिया से ज्यादा खेलने जैसी है, बालिकाएँ गवरजा को माता नहीं, बहन मानती है और ईसरजी की साली बनकर उनसे हंसी ठिठोली करती हैं। इन लोग गीतों के माध्यम से कन्याओं में स्कूली शिक्षा के प्रति जागृति जागने जैसा हैं गवरजा बाई चले स्कूल, लगा के फूल, बगल में बस्त, यह गीत कुछ यही प्रेरणा देता है।
इनके पूजन के समय गाये जाने वाले गीतों में संगीत का माधुर्य, स्त्री सौंदर्य, साथ ही सामाजिक गूढ़-अर्थ छिपे होते हैं। गवर पूजने के अधिकांश गीत 10-15 पंक्तियों के होते हैं जिन्हें लड़कियाँ पारिवारिक नाम लेकर बार-बार गाती है जो संगीत शिक्षा का वैज्ञानिक रूप ही है। कन्याओं में स्पर्धा होती है सर्वश्रेष्ठ हरे-भरे सुंदर जवारे उगाने की।
व्यवहारिक शिक्षा का समावेश
भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह व्यवहारिक शिक्षा का सुंदर रूप है। आठवें दिन ईसर जी पधारते हैं और बालिकाएँ मेहमान-नवाजी की उत्तम शिक्षा प्राप्त करती है। लड़कियाँ स्वयं सजती और गणगौर का भी नखशिख शृंगार करती है। शृंगार के माध्यम से सांस्कृतिक स्त्री-सुलभ शिक्षा अनजाने में पा सकती है। घूड़ले से प्राप्त नगद राशि से गोठ करना पैसे का सदुपयोग सिखाता हैं साथ ही आपस में मेल-जोल का माध्यम होता है।
चौक मांडना, फलड़े चूनना, गर बनाना, घूड़ले घुमाना इन सभी में व्यवहारिक शिक्षा का ही समावेश है। यह त्यौहार बालिकओं का 18 दिवसीय प्रशिक्षण शैक्षणिक शिविर है, जिसमें प्रतिवर्ष नन्हीं-नन्हीं बालिकाएँ सम्मिलित होती है व विवाह तक शिक्षित होकर सुघड़ गृहिणी का रूप ले लेती है।
आज के बदलते परिवेश में स्पर्धा के युग में इसका स्वरूप बदलता जा रहा है। स्कूली शिक्षा के बोझ के कारण लड़कियाँ इस मौलिक शिक्षा से वंचित रह जाती है। सभी जागरुक माताओं को इस ओर ध्यान देना चाहिए व सुविधानुसार सांस्कृतिक मूल्यों को समझते हुए बालिकाओं को गणगौर पूजने के लिए प्रेरित करना चाहिए।










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