स्वस्थ देह के लिए जरूरी- स्वस्थ जीवन शैली

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धर्माशकाममोक्षाणामादोग्यं मूलमुत्तमम्-अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सबसे उत्तम साधन आरोग्य ही है। मनुष्य का यह पवित्र कर्त्तव्य है कि वह शारीरिक तथा मानसिक रूप से अपने आपको सदा निरोगी रखे, अन्यथा वह संसार के उन कर्मों को करने में असमर्थ रहेगा जिनको पूर्ण करने के लिए उसका जन्म हुआ है। निरोगी रहना दवाईयों के भरोसे संभव नहीं, यह काम तो सिर्फ स्वस्थ जीवन शैली ही कर सकती है।

shree krishnachand tawani
कृष्णचन्द्र टवाणी

कभी-कभी किसी पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति को देखकर हमारे मन में विचार आता है कि हम भी पूर्ण स्वस्थ क्यों नहीं रह सकते। स्वस्थ जीवन सबके लिए सम्भव है और इसे किसी भी कीमत पर प्राप्त करना आवश्यक है। यदि हम सावधान हैं, तो जीवन में कोई रोग हमारे निकट नही आयेगा।

स्वस्थ रहने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि हमारा जीवन निष्कलंक और निर्दोष बीतेगा। दोषपूर्ण आदतें और दोषपूर्ण विचार हमारे पास नहीं फटकेंगे। डॉक्टरों के चक्कर में हमारी तन-मन-धन की शक्तियों का अपव्यय नहीं होगा। स्वस्थ तो सभी रहना चाहते हैं, परन्तु जिन बातों के ज्ञान से मनुष्य स्वस्थ रहने में सफल होता है, उन्हें अपनाने का प्रयत्न बहुत कम लोग करते हैं। यही कारण है कि बहुत से लोग मौसम बदलने के साथ ही बीमार हो जाते हैं।

कोई भी बीमारी फैले, वे सबसे पहले उसके चंगुल में फँस जाते हैं। आप जीवन में यदि किसी का कोई उपकार करना चाहते हैं, तो सबसे पहले अपना उपकार कीजिए। अपना सबसे बड़ा उपकार है, अपने स्वास्थ्य की रक्षा करना और अपने-आप को बीमारियों से दूर रखना।


शरीर आत्मा का स्थान है, इसलिए वह ब्रह्म-मंदिर है (शरीर ब्रह्म मंदिरम्)। इसे स्वच्छ निरोग रखना हमारा मुख्य कर्त्तव्य है। शरीर की रक्षा, स्वास्थ्य की रक्षा के बिना नहीं हो सकती और स्वास्थ्य की रक्षा आरोग्य के नियमों का पालन किये बिना नहीं हो सकती।

मनुष्य जीवन के सम्पूर्ण सुखों का आधार आरोग्य ही है। राष्ट्र के हर बालक तथा बालिका को, तरुण तथा तरुणी को, युवक तथा युवती को, प्रौढ़ तथा प्रौढ़ा को, वृद्धा तथा वृद्ध को अपने स्वास्थ्य का पूरा ध्यान रखना जरूरी है, तभी हमारा देश एक स्वस्थ राष्ट्र बन सकता है। मनुष्य को रोग कब घेरता है ? उसके अपने अज्ञान के कारण। जब हम स्वास्थ्य के नियमों का पालन नहीं करते है तो स्वाभाविक रूप से कई प्रकार के रोग विकार हमें घेर लेते हैं।


वर्तमान समय में अधिकांश व्यक्ति थोड़े से बीमार होने पर अन्धाधुन्ध दवाईयाँ खाने लग जाते है। मन या मस्तिष्क से तो केवल आप सोच-विचार ही सकते हैं, अन्ततः कार्य तो आपके शरीर को ही करना पड़ता है। यदि उसमें बल-शक्ति का अभाव होगा, तो भले ही आप कितने ही बुद्धिमान है कितनी ही अच्छी बातें सोचें, भले ही कितनी अच्छी योजनाएँ बनाएँ आप उन्हें कार्य-रूप में परिणत नहीं कर सकते।

श्रीमदद्भगवत ‘गीता’ में श्रीकृष्ण ने ‘उत्तमकर्त्ता’ के लक्षण बताते हुए सबसे पहले ‘मन की प्रसन्नता’ का उल्लेख किया हैै। यानि जिसका मन प्रसन्न हो, वही कुशलता पूर्वक कार्य कर सकता है। दिमाग जब शरीर के कष्ट और रोग के बारे में ही चिंता कर रहा हो, तो वह कोई भी अच्छा कार्य कैसे कर सकता है और कोई भी नवीन योजना कैसे बना सकता है?


अच्छे स्वास्थ्य का निर्माण एक दिन में नहीं हो जाता। बचपन से ही स्वास्थ्य के नियमों का निरंतर पालन करते रहने से शरीर स्वस्थ रहता है। धीरे-धीरे शरीर पुष्ट तथा बलशाली बन जाता है और युवावस्था में उसका पूर्ण विकास हो जाता है। संसार में इस प्रकार का कोई भी जादू नहीं है, जिससे शरीर को एकदम हष्ट-पुष्ट तथा बलशाली बनाया जा सके। स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का परिपालन करते रहने का ही स्वाभाविक परिणाम ‘अच्छा स्वास्थ्य’ है।

स्वस्थ मनुष्य में रोग-निरोधक शक्ति अधिक होती है, जिससे वह बीमार कम होता है। स्वास्थ्य-सम्बन्धी नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति ही जीवन संघर्ष में सफल होता है। जो स्वास्थ्य सम्बन्धी नियमों का सदा ध्यान रखता है और उन नियमों का पालन करता रहता है, सफलता उसके पास स्वयं आती है। इसके लिए मन तथा इन्द्रियों को वश में रखना पड़ता है।

सही ढंग से सोचना, संतुलित भोजन, नियमानुसार उठना-बैठना, सोना-जागना, खेलना-कूदना, नहाना-धोना आदि जीवन के प्रत्येक कार्य-व्यवहार को नियम पूर्वक जो करता है, वह सदैव स्वस्थ रहता है। स्वास्थ्य से अधिक मूल्यवान कोई वस्तु न जीवन में है, न इस जगत में। जो इस अमूल्य सम्पदा को सँजोकर रखता है, वह बुद्धिमान और भाग्यशाली है। जो लोग इसे लापरवाही, अज्ञान और कुप्रवृत्तियों के वशीभूत होने के कारण नष्ट करते हैं, वे सुखों से वंचित होकर नाना प्रकार के कष्ट झेलते हैं और उनका जीवन नारकीय हो जाता है।


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