अशोक सोमानी

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रेवाड़ी (हरियाणा) निवासी अशोक सोमानी ने न सिर्फ इस छोटे से कस्बे को अपने वृहद स्टोन व्यवसाय से विशिष्ट पहचान दी, अपितु समाजसेवा में जो योगदान दिया उसने तो एक मिसाल ही बना दी। स्वतंत्रता सेनानी पिता जो अधूरा सपना विरासत में छोड़ा था, उसे पूरा करने का श्रेय श्री सोमानी को ही है। श्री माहेश्वरी टाईम्स श्री अशोक सोमानी के समाजसेवा में दिए गए योगदानों को नमन करते हुए आपको श्री माहेश्वरी ऑफ द ईयर अवॉर्ड से सम्मानित करते हुए गौरवान्वित है।

रेवाड़ी किसी समय हरियाणा का एक गुमनाम छोटा सा कस्बा था। लेकिन आज ये व्यावसायिक रूप से देश के मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान रखता है। इसकी विशिष्ट पहचान है, अरावली पर्वत शृंखला के पत्थरों के कारण जो आज संपूर्ण विश्व में सिर चढ़कर बोल रहा है। इस पत्थर को विश्व के परिदृश्य तक पहुंचाकर क्षेत्र को विशिष्ट पहचान दिलाने का श्रेय है, यहां के व्यवसायी अशोक सोमानी को।

उन्होंने वह राह दिखाई जिसने संपूर्ण क्षेत्र को ही पहचान दे दी। आज यह क्षेत्र इस विशिष्ट पत्थर के लिए ही जाना जाता है। वैसे तो श्री सोमानी की यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है, लेकिन इससे भी बड़ी उनकी कोई उपलब्धि है तो इस पिछड़े क्षेत्रों में शिक्षा की सौगात।


स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्म

श्री अशोक सोमानी का जन्म 28 नवंबर 1953 को ख्यात स्वतंत्रता सेनानी स्व. श्री आरडी सोमानी के यहां हुआ था। पिताजी आरडी सोमानी मात्र 14 वर्ष की अबोध उम्र से ही स्वतंत्रता प्राप्त के यज्ञ में गांधीजी के आंदोलन में योगदान देने लग गए थे। बचपन से गांधीजी का चढ़ा रंग इस तरह व्यक्तित्व बन गया कि जब वे युवा हुए तो इनका संपूर्ण व्यक्तित्व ही गांधीवाद से प्रेरित हो चुका था। स्थिति यह थी कि इन्हें क्षेत्र में अहिरवार के गांधी के नाम से जाना जाने लगा।

विधिवत रूप से कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर सोमाणीजी ने महात्मा गांधी द्वारा संचालित हर आंदोलन में भाग लेना प्रारंभ कर दिया। द्वितीय विश्व युद्ध में अंग्रेजों ने भारतीय सैनिकों को भी युद्ध में झोंक दिया। इसके विरोध के लिए गांधीजी ने कांग्रेसजनों का व्यक्तिगत आंदोलन के लिए आह्वान किया। इस आंदोलन में जन समर्थन जुटाने के लिए श्री सोमाणी अपनी पूर्ण क्षमता के साथ जुटे रहे। इसका असर सन 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में नजर आया।

यह आंदोलन विश्व के इतिहास का सबसे बड़ा आंदोलन था। सोमाणीजी के नेतृत्व में अहिरवार का जन-जन भी इस आंदोलन के लिए अपने घर से निकल पड़ा। इस आंदोलन को कुचलने के लिए अंग्रेजी सरकार ने अपना दमन चक्र चलाया।

गांधीजी सहित कई बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। सोमाणीजी अपने क्षेत्र में आंदोलन को सतत जारी रखने के लिए भूमिगत हो गए और किसी तरह पुलिस से बचते हुए भी आंदोलन को जारी रखा। अंत में वे भी पकड़े गए और लगभग 20 दिन जले में रहने के बाद रिहा हुए।


असमय ही उठा पिता का साया

श्री सोमानी अपने पिताजी के व्यक्तित्व से विशेष प्रभावित रहे। लेकिन दुर्भाग्य से उन्हें पिता का सुख अधिक समय तक नहीं मिल पाया। एक बार सोमाणी जी ट्रेन से दिल्ली से रेवाड़ी आ रहे थे। तभी ऊपर रखा एक बक्सा उनके सिर पर आ गिरा। इससे सिर में गहरी चोट आई। अक्सर सिर में दर्द रहने लगा। जांच करवाने पर पता चला कि उनको ब्रेन ट्यूमर हो गया। आजादी के लिए लड़ी जंग के दौरान विकास के कई सपने देखे थे, लेकिन धीरे-धीरे मृत्यु की ओर बढ़ने लगे। इनके दो बेटे व तीन बेटियां थी लेकिन अपने जीवन काल में आप सिर्फ अपनी बड़ी बेटी सुशीला का विवाह ही कर पाए।

शेष चारों की जिम्मेदारी पत्नी पर छोड़ 3 जुलाई 1972 को स्वर्ग सिधार गए। उस समय अशोक जी मात्र 18 वर्ष के अविवाहित युवक थे। उनका इस तरह साथ छोडत्र जाना श्री सोमानी के लिए गहरा आद्यात था। फिर भी श्री सोमानी ने उनके आदर्शों और सपनों को अपनी शक्ति बनाकर अपनी विकास यात्रा तेज कर दी।


पिताजी के सपनों को किया साकार

पिताजी श्री सोमानी का जीवन संघर्षों से भरा था। गांधीजी के प्रभाव ने उन्हें सत्य, अहिंसा व देशप्रेम का ऐसा पाठ पढ़ाया था जो उनके व्यक्तित्व में रच बस गया। आजादी के बाद देश की राजनीति में आए परिवर्तनों के दौरान सिद्धांतों को लेकर समझौता न कर पाने के कारण वे राजनीति में किसी महत्वपूर्ण पद पर न पहुंच पाए। देश व समाज के लिए लड़ने वाले इन सेनानी को दो-दो मुख्यमंत्रियों का कोपभाजन बनना पड़ा।

पंजाब के मुख्यमंत्री राव वीरेंद्रसिंह ने आरडी सोमाणी को बर्बादी के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया था लेकिन वे कभी घबराए नहीं। निराशा के भाव तो उनके चेहरे पर कभी आए ही नहीं। बस व्यवसाय को शिखर पर नहीं पहुंचा पाने का दर्द उनके मन में हमेशा बना रहा था। यही उनका अधूरा सपना अशोक सोमानी को विरासत में मिला। बस उन्होंने इसे साकार कर दिखाया। पिताजी का दूसरा दर्द क्षेत्र में शिक्षा सुविधाओं की कमी के कारण अधिक शिक्षा ग्रहण न कर पाना था।

अतः इस क्षेत्र की शिक्षा सुविधाओं का विकास भी उनका सपना बन गया था। इसे भी श्री सोमानी ने साकार किया। वर्तमान में वे इस क्षेत्र में एक अत्यंत प्रतिष्ठित शिक्षण संस्था सोमानी पब्लिक स्कूल का संचालन कर रहे हैं। उनका परिवार क्षेत्र की युवा पीढ़ी की दक्षता को बढ़ाने के लिए सोमानी तकनीकी शिक्षण संस्थान का संचालन भी कर रहा है।


कई संस्थाओं को सक्रिय सहयोग

श्री सोमानी अपनी व्यावसायिक व्यस्तता के बावजूद समाजसेवा के क्षेत्र में कई संस्थाओं से सम्बद्ध होकर तन-मन-धन से योगदान प्रदान कर रहे हैं। वर्तमान में माहेश्वरी समाज के अंतर्गत अभा माहेश्वरी महासभा उत्तरांचल के उपाध्यक्ष के रूप में सेवा दे रहे हैं। हरियाणा-पंजाब-हिमाचल-जम्मू कश्मीर प्रादेशिक माहेश्वरी सभा के सतत दो सत्र 2010-2016 में प्रदेशाध्यक्ष रहे। इसे इनके सफल कार्यकाल की उपलब्धि ही कहा जा सकता है कि वे दो बार प्रदेशाध्यक्ष बने।

वर्ष 2010 से अभा माहेश्वरी महासभा के कार्यसमिति सदस्य हैं। हरियाणा पंजाब प्रादेशिक ट्रस्ट के ट्रस्टी एवं श्रीमती लीलावती सोमानी एजुकेशन ट्रस्ट के ट्रस्टी तथा श्री अखिल भारतीय माहेश्वरी सेवा सदन के ट्रस्टी के रूप में भी अपनी सेवा दे रहे हैं। अन्य समाजसेवी गतिविधियों के अंतर्गत लायंस क्लब 321 ए-1 के चार्टर्ड सदस्य हैं। लायंस क्लब के 2 सत्रों तक अध्यक्ष रहे।


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