Jeevan Prabandhan

अपने मूल पर टिके रहें, जड़ों से नहीं कटें

हर मनुष्य के दो जन्म हुए हैं, एक शरीर के तल पर, दूसरे आत्मा के तल पर। हमने जन्म देने वाली स्त्री को माँ और जिस धरती के खंड पर जन्म लिया गया उसे मातृभूमि कहा है। अपने मूल पर टिके रहना, अपनी जड़ों से न कटना यह एक नैतिक दायित्व, मूल्य है। वर्षों में सब कुछ बदल जाता है, मूल्य नहीं बदलते। मातृभूमि के साथ-साथ आपका परिवार भी आपकी जड़ें हैं, आपकी पहचान है, इसलिए प्रेमपूर्वक उससे जुड़े रहें।

अपनी मातृभूमि से प्रेम करने के भाव का अर्थ है, जहाँ हमारा जन्म हुआ, उससे जुड़े रहना। आध्यात्मिक भाषा में यूँ कहा जाए की आत्मा के तल पर जन्म हुआ है तो आत्मा से जुड़े रहें, अपने भीतर उतरें, थोड़े स्वयं के निकट बैठें। सारी दुनिया घूमें परन्तु अपनी मातृभूमि, अपने परिवार को नहीं भूलें। वैसे ही शरीर पर टिकें, संसार में घूमें पर अपनी आत्मा को विस्मृत नहीं करें।

अमीर खुसरो ने फ़ारसी में नुह सिपिहर नामक मनस्वी में लिखा है कि हिन्दुस्तान मेरी मातृभूमि है। इसलिए इससे मुझे बहुत प्रेम है। हजरत पैगम्बर ने भी फ़रमाया है, देश प्रेम धार्मिक निष्ठा का ही अंग है। अमीर खुसरो तो यहाँ तक लिख गए कि दिल्ली हजरते देहली है। देहली की खूबसूरती यदि मक्का शरीफ सुन ले तो वह भी आदरपूर्वक हिन्दुस्तान की तरफ अपना रुख मोड़ ले। इस्लामी दीन में मक्का शरीफ का रूतबा दुनिया जानती है। इसकी तुलना दिल्ली से करने की हिम्मत अमीर खुसरो ने इसलिए की थी कि वे मातृभूमि के प्रेम को दर्शाना चाहते थे।

भारत में इस्लाम की नींव मोहम्मद गौरी ने डाली थी। कई मुसलमान शासकों ने भारत के सांस्कृतिक, धार्मिक दृश्य को तहस-नहस किया तो कई मुस्लिम बादशाहों ने इसे संवारा भी। इसलिए बहुत कुछ गुज़र जाता है पर जो रह जाता है, वह है मूल्य। खुसरो जैसे लोग उन्ही उन्ही मूल्यों पर अपनी कलम चलातें हैं। मातृभूमि से प्रेम का एक ऐसा भी अर्थ है कि अपने भीतर उतरो, यहीं खुदा है, ईश्वर है और वह सब कुछ है जैसा हम होना चाहते हैं।

-पं विजयशंकर मेहता


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श्री माहेश्वरी टाइम्स

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