जीवन में कुछ लोगों से कुछ घटनाओं पर बोलना भी पड़ता है और मौन भी रखना पड़ता है। इस मामले में अत्यधिक सावधान रहिए कि कब बोलना है और कब चुप रहना है। प्रशंसा में बोलें, आलोचना में मौन साधें। यह सावधानी घर और बाहर दोनों जगह रखनी होगी। चलिए, घर परिवार की बात करते हैं।
हमें हमारे परिवार के कई सदस्यों से यह शिकायत सुनने मिल जाएगी कि आपने कभी हमारी प्रशंसा की ही नहीं। हमने हमेशा अच्छे काम किए पर घर में किसी ने तारीफ़ नहीं की। शिकायत यहाँ तक आगे बढ़ जाती है कि काम हमने अच्छे किए पर क्रेडिट दूसरा सदस्य ले गया और चुप रहे। वाणी की मुखरता और मौन दोनों यदि गलत समय हो तो परिवार में कलह का कारण होता है।
अपने परिवार के सदस्यों के मामले में कुछ क्षेत्र में ज़रूर बोलिए। जैसे: खान-पान, पहरावे, दिखने, खेल में, सफलता पर, शिक्षा में और कला के समय उन्हें प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए ज़रूर बोलिए। इस समय आपकी चुप्पी महँगी पड़ सकती है और जब इन्हीं क्षेत्रों में आलोचना करना हो या किसी कारण से आपको आवेश आ रहा हो तो मौन साधिए।
अपने पारिवारिक सदस्यों की अच्छाई देखने में लोग अकारण कंजूस हो जाते हैं। एक काम करते रहिए। अपने निकट के सदस्यों द्वारा किए गए अच्छे कामों की सूची अपनी डायरी में ज़रूर बनाएं। हम दिल की किताब में उनके द्वारा किए गए हमारे नापसंद कामों की सूची तो रखते हैं लेकिन उनके अच्छे कामों की लिस्ट ज़रूर बनाएं।
उस समय को अपने मानसिक पटल पर ज़रूर अंकित करें जब उन्होंने अच्छे काम किए हों। फिर इन स्मृतियों को शब्द दें और मुखर हो जाएं। तब उनको लगेगा कि आप तारीफ़ भी कर रहे हैं तो दिल से कर रहे हैं क्योंकि आपने इसकी पूरी तैयारी की है। इससे आप स्वयं को भी शांत पाएंगे।
कब बोलना है और कब चुप रहना है यह बड़ी सावधानी का विषय है। वाणी की मुखरता और मौन दोनों यदि गलत समय हो तो परिवार में कलह का कारण होता है। किसी के अच्छे काम पर ज़रूर बोलिए, आलोचना में मौन साधें।














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