संसार में रहते हुए हम लोग राष्ट्र, समाज तथा परिवार की व्यवस्था बनाते हैं और फिर स्वयं इस सिस्टम को तोड़ते भी हैं। इसी जोड़-तोड़ में जिंदगी बीत जाती है।
जब अपने ही बनाए संसार से परेशान हो जाते हैं तो भक्ति के मार्ग में उतर जाते हैं और भक्ति के इस संसार में हम अपनी इच्छा के अनुसार भगवान से मांग शुरू कर देते हैं। ईश्वर के नियम को समझने के लिए आध्यात्मिक समझ जरुरी है।
इस प्रकार हम ईश्वर की व्यवस्था में अपनी व्यवस्था का अतिक्रमण करते हैं। परमात्मा के साफ़-सुथरे, हरे-भरे कृपा के क्षेत्र में हम अपनी निजी हित की मांगों की झुग्गी-झोपड़ी, ठेले, गुमठी, भवन अट्टालिकाओं के अतिक्रमण को बीच में ले आते हैं।
भगवान के विधान को लेकर हम कुछ भ्रम पाल लेते हैं। भगवन जितना नियंता है, उतना ही नियमबद्ध भी है। पृथ्वी का एक नियम है कि इसमें गुरुत्वाकर्षण शक्ति होती है। जब कोई वास्तु ऊपर से नीचे गिरती है, तब पृथ्वी उसे खींचती है और इसी कारण से वह वस्तु पृथ्वी पर गिर जाती है।

यह एक सामान्य सा नियम है, लेकिन हम अगर चल रहे हों तथा हमारी ही भूल से यदि ठोकर लग जाए और हम गिर जाएं तो यहाँ हम यह नहीं कह सकते कि यह तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का नियम है, इसलिए गिर गए। हम अपनी ही भूल से गिरे हैं, पृथ्वी का नियम अपनी जगह है।
इस प्रकार भगवान ने सारी व्यवस्था कर रखी है। उन्होंने अपने कुछ नियम बना रखे हैं परन्तु धर्म तथा संस्कृति की जो आचार संहिता है, उसका पालन हमें करना होगा। परमात्मा के नियम अपनी जगह हैं, उनको समझने के लिए एक आध्यात्मिक समझ होना जरुरी है।
इसी समझ को कहीं-कहीं समाधि भी कहा गया। ऊहापोह और भ्रम के विचारों का वेग जब शांत हो जाए तब समझ या समाधि घटती है।
परमात्मा की व्यवस्था में जब जीने लगो तो समझ है और उसके अंग ही बन जाओ तो समाधि है। निर्विरोध और निर्विकल्प होकर ही ईश्वर के नियम का पालन किया जा सकता है। यह सीख परिवार प्रबंध में भी महत्वपूर्ण है।
–पं विजयशंकर मेहता
(जीवन प्रबंधन गुरु)














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