जो लोग घर में, परिवार में या किसी व्यवस्था में उम्र में बड़े हों, शीर्ष पद पर हों उन्हें निर्णय लेने में गहराई और दूरदर्शिता बनाए रखना चाहिए। इसके परिणाम सकारात्मक होते हैं। भगवान राम के एक निर्णय से ऐसा ही संकेत मिलता है।
जब विभीषण श्रीराम की शरण में आए तो रामजी ने शरणागत वत्सलता की रघुकुल रीत निभाई और विभीषण के सिर पर कृपा का हाथ रख दिया। श्रीराम के मित्र और वानरराज सुग्रीव इस निर्णय से सहमत नहीं थे। उन्होंने राय दी, “हे रघुवीर, विभीषण पर विशवास करना ठीक नहीं। आखिर वह हमारे शत्रु का भाई है। संभव है, हमारा भेद लेने आया हो। इसे बांधकर रखना उचित होगा।”
सुग्रीव अपनी असहमति स्पष्ट रूप से जता चुके थे। श्रीराम ने उनका भी मान रखने के लिए कहा था, “मित्र सुग्रीव, तुमने नीति तो अच्छी बताई है लेकिन मैंने प्रण ले रखा है शरणागत के भय को दूर करने का।” श्रीराम ने विभीषण को न केवल मान्यता दी बल्कि समुद्र से जल मांगकर उनका लंका के राजा के रूप में राज्याभिषेक भी कर दिया। यहाँ श्रीराम का निर्णय सर्वोपरि रहा।

जब जीवन सामूहिक स्थितियों में हो तब शीर्ष पुरुषों को निर्णय लेने में कई कोणों पर अपना ध्यान टिकाना पड़ता है। विभीषण से सुग्रीव सहमत नहीं थे और लक्ष्मण, सुग्रीव तथा विभीषण दोनों से ही असहमत रहे किन्तु श्रीराम के लिए ये तीनों महत्वपूर्ण थे। इन तीनों से श्रीराम के जो सम्बन्ध थे उनमें हनुमान एक महत्वपूर्ण कड़ी थे।
हनुमानजी सेवा और प्रेम के पर्याय हैं। श्रीराम जानते थे कि उन्हें निर्णय अपनी दृष्टि से लेना है किन्तु सबको सहमत और प्रसन्न रखना है। अतः उन्होंने ऐसा ही किया भी। परिवार की दृष्टि से भी देखा जाए तो उसके प्रमुख, उसके मुखिया के लिए यह बड़ी सीख है। बड़प्पन इसी का नाम है।
विचारों की गहराई व दूरदर्शिता से लिए गए निर्णयों के परिणाम सकारात्मक होते हैं। सामूहिक परिवार होने की स्थिति में इस बात का ज्यादा ध्यान रखना होता है। सबको सहमत और प्रसन्न रखना मुखिया के लिए एक बड़ी चुनौती होती है लेकिन बड़प्पन भी इसी में है।














Got a Questions?
Find us on Socials or Contact us and we’ll get back to you as soon as possible.