एक सवाल उठता है कि परिवार क्यों अशांत हो जाता है। दरअसल, परिवार बनता है अनेक सदस्यों से। पति-पत्नी, पिता-पुत्र, माँ-बेटी सबमें अपना अपना अहंकार और अपनी-अपनी कामनाएँ होती है। कम या अधिक हो सकती हैं पर होती जरूर हैं।
प्रेम जरूर बचाएँ – देखा जाए तो प्रेम ही परिवार का आधार है। परिवार में जितना अधिक प्रेम होगा उतनी अधिक शान्ति और स्वर्ग की अनुभूति होगी। परिवार के प्रेम को ठिकाने लगाने के लिए अहंकार और स्वार्थ कैंची की तरह काम करते हैं।
अहंकार के कारण परिवार के सदस्य एक-दूसरे पर अपना अधिकार जमाने का प्रयास करते हैं और स्वार्थ के कारण हर सदस्य अपने हित व सुख की बात सोचने लगता है। ऐसे में सदस्यों के बीच जो पारिवारिक राग होता है वह द्वेष में बदलने लगता है और प्रेम बैर का रूप ले लेता है।
देखा गया है कि मतभेद की शुरुआत हँसी-मज़ाक के साथ टीका-टिपण्णी से शुरू होती है और यहीं से अंतर्मन में दरारें पड़ना शुरू हो जाती है।
व्यक्तिगत टिप्पणियाँ व्यक्तियों के बीच दूरी बढ़ाती हैं। इस दौर में द्वेष को प्रवेश की जगह मिल जाती है। परिवार में अधिकांश संबंध राग से शुरू होते हैं। जिन्हे लोग प्रेम कहते हैं किन्तु यह विशुद्ध प्रेम नहीं होता, सिर्फ राग होता है। राग धीरे-धीरे द्वेष में बदलता है और इसमें अहंकार की बड़ी भूमिका रहती है।
अहंकारी के मन का स्वभाव होता है कि वह अपने मनपसंद काम कराने के लिए दूसरों को बाध्य करता है। ठीक यही बात दूसरे सदस्यों के मन में भी होती है। यदि इसका उल्टा हो, मन में प्रेम, सेवा अपनेपन की भावना हो तो सामने वाले में भी वैसी भावना जागने लगती है। मन संक्रमण करता है। इसलिए परिवार बचाना हो तो प्रेम बचाएँ और प्रेम को अहंकार तथा राग से बचाएँ।
–पं विजयशंकर मेहता
(जीवन प्रबंधन गुरु)
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