महाभारत के शांतिपर्व की कथा है कि त्रेता और द्वापर युग के सन्धिकाल में लगातार 12 वर्षों तक वर्षा न होने से अकाल पड़ गया। इंद्र ने वर्षा बन्द कर दी जिसने प्रलयकाल-सा उपस्थित कर दिया। तब बृहस्पति वक्री हो गए और चन्द्रमा विकृत होकर दक्षिण मार्ग पर चला गया। न कुंहासा था, न रहे और न ही नदियों में जल शेष बचा। सरोवर, कूप, झरने सब श्रीहीन हो गए।
हालत यह हुई कि देवालय, मठ-मन्दिर आदि संस्थाएं उठ गई। बच्चे, बूढ़े, जवान अनेक जन मर गए। पशुओं की प्रजातियां नष्ट हो गई और भूखे लोग एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। यहाँ तक कि भूख से पीड़ित लोग एक-दूसरे को खाने पर आमादा हो चले।
आपद्धर्म पर्व की कथा कहती है ऐसे माहौल में एक दिन महर्षि विश्वामित्र प्राणियों का वध करने वाले हिंसक चांडालों की बस्ती में पहुंचे। महर्षि ने देखा कि बस्ती में कुत्तों को काटने वाले हथियार धरे थे और सूअरों व गधों की हड्डियां पड़ी हुई थी। महर्षि ने उस बस्ती में भीख मांगी लेकिन अन्न, फल, मांस तक न मिल सका।
तब उन्होंने आपत्तिकाल में प्राणरक्षा के लिए एक चांडाल के घर मूल तो क्या से कुत्ते के माँस का एक टुकड़ा चुरा लिया। इस चेष्टा के दौरान संयोगवश झोपड़ी में सोया चांडाल जाग उठा और साक्षात महर्षि को अभक्ष्य वस्तु की चोरी करते देख स्तब्ध और दुःखी हो उठा।
जब चांडाल ने महर्षि से इस कुकर्म का कारण पूछा तो विश्वामित्र ने कहा, ‘भाई! मेरे प्राण शिथिल हो रहे हैं। मैं जानता हूँ कि यह अधर्म है मगर जीवन की रक्षा के लिए अब मेरे पास इसके सिवाय दूसरा उपाय नहीं रह गया है।’
चांडाल ने महर्षि के पैर पकड़ लिए और ऐसा निन्दित कर्म न करने की बार-बार प्रार्थना की। तब महर्षि विश्वामित्र ने अद्भुत वचन कहा। बोले-
येन येन विशेषेण कर्मणा येन केनचित्।
अभ्युज्जीवेत् साद्यमानः समर्थों धर्ममाचरेत्।।
अर्थात जो भूखों मर रहा हो, वह जिस जिस उपाय से अथवा जिस किसी भी कर्म से सम्भव हो, अपने जीवन की रक्षा करे। क्योंकि जीवन की रक्षा हो गई तो वह समर्थ होकर पुनः अपने मूल धर्म का आचरण कर सकता है।
कथा कहती है अंतत: थक-हार कर चांडाल ने महर्षि को मांस ले जाने का अनुमोदन कर दिया। महर्षि ने उसे पकाया और ग्रहण करते उसके पहले ही जीवन रक्षा के उनके संकल्प से प्रभावित होकर इंद्र ने वर्षा की और अकाल की वह विभीषिका समाप्त हो गई।
अपनी तप शक्ति से कुछ दिन महर्षि बगैर अभक्ष्य का भक्षण किये निराहार रहे और मात्र कुछ ही दिनों में संसार फिर पूर्ववत हराभरा हो गया।
साधो! सार यह है कि हर स्थिति में जीवन, धर्म से बहुत बड़ा है। धर्म जीवित व्यक्तियों द्वारा ही सुरक्षित रह सकता है। अत: हर हाल में धर्म से अधिक जीवन रक्षा को महत्व देना ही श्रेष्ठ जनों का लक्षण है।
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