मकर संक्रांति का पर्व लगभग सम्पूर्ण देश में ही मनाया जाता है बस अंतर है तो यह की इसके नाम भिन्न भिन्न हैं व आयोजन की पद्धतियां भी। लेकिन सभी के मूल में सूर्योपासना ही है जिसके द्वारा प्रकृति के शक्ति केंद्र सूर्य से ऊर्जा को प्राप्त करना ही है।
संक्राति का अर्थ है एक स्थान से दुसरे स्थान को जाना या एकमेव हो जाना। सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में जाता है तो संक्रांति होती है। यह हर मास होती है लेकिन मकर राशि और कर्क राशि में प्रवेश करने पर इसका विशेष महत्त्व होता है। पंचांग के अनुसार कुल 27 नक्षत्र हैं, जिनकी बारह राशियां हैं। सूर्य की ये संक्रांतियां हैं। मेष राशि को उत्तर भारत के लोग ग्रामीण भाषा में ‘सतुआ संक्रांति’ कहते हैं।
इस दिन सूर्य उत्तर की ओर झुकता दिखाई देता है। इसे सूर्य की उत्तरायण दशा कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन से सर्दी का प्रकोप कम होने लगता है और दिन बड़े होने लगते हैं। इस तरह मकर संक्रांति मौसम के परिवर्तन का पर्व है।

मूल रूप से मकर संक्रांति सूर्योपासना का पर्व है। यह हमें ऊर्जा, प्रकाश और पोषण देता है। इसके बिना जीवन असंभव है। सूर्य अपने रथ पर सवार होकर अहर्निश गतिमान होता है। इसकी गति से दिन और रात होती है। चन्द्रमा ही सूर्य से प्रकाशित होता है।
पौराणिक महत्त्व
विष्णु पुराण के अनुसार भगवान भास्कर जिस दिन मकर राशि पर आए, उसी दिन से माघ के तीस दिन पावन होते हैं। इसमें स्नान और दान का विशेष महत्त्व है। महाभारत युद्ध के समय महानायक भीष्म पितामह भी शरशैया पर पड़े प्राणों की डोरी तब तक थामे रहे, जब तक कि सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण पर नहीं आ गया।
संक्रांति बेला में ही उन्होंने प्राण त्यागे। धर्म कहता है कि सूर्य को भगवान विष्णु ने योगमाया का सन्देश दिया। सूर्य को बताया कि उसका तेज केवल उसके लिए नहीं है वरन पूरे विश्व के लिए है।
मानव जीवन और मकर संक्रांति
मकर संक्रांति का पर्व ही असम में ‘माघ बिहु’ कहलाता है। पंजाब में इसको ‘लोहड़ी’, बंगाल में इसको ‘संक्रांति’ और समस्त भारत में ‘मकर संक्रांति’ के नाम से जाना जाता है। यह पर्व सूर्योपासना का प्रसिद्ध पर्व है। सूर्य की उपासना किसी न किसी रूप में हमारे जीवन से जुड़ी है।
कहा जाता है कि प्रातः काल को सूर्य का एक लोटा जल चढ़ाने से सारे रोग दूर हो जाते हैं। ग्रहों की प्रकोप लीला शांत होती है। सूर्य सात किरणों से युक्त है। यही जीवन है। रथ में सात अश्व हैं। तीन नाभि वाले पहिये को एक घोड़ा ले जाता है। सभी लोक इस पहिए के अधीन कहे जाते हैं। पास वाले सात पहिए के रथ को सात अश्व खींचते हैं। सूर्य का बारह राशियों वाला अंक से युक्त रथ आकाश के चारों ओर घूमता है। ऋतुएं भी इसके साथ घूमती है।

मकर संक्रांति के पर्व पर तिल के दान का विशेष महत्व है। गुड़, घी, खिचड़ी बनाने के पीछे भी वैज्ञानिक आधार ही है। यह पर्व सदा 14 जनवरी को होता है। मकर संक्रांति सामाजिक समरसता का पर्व है।
इसी प्रकार लोहिड़ी का उत्सव भी पंजाबी संस्कृति का प्रतीक पर्व है। इस रात लोहिड़ी जलाकर नई फसलों का पर्व मनाया जाता है। तिल, घी, गुड़ और काली उड़द की खिचड़ी का दान करने और उसका सेवन करने से शीत का प्रकोप शांत होता है।
सूर्य भगवान से कामना की जाती है कि अब बहुत हो गया, आप अपने रूप में आइये और सर्दी का प्रकोप शांत करिए।










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