शास्त्रों में 16 दिवसीय श्राद्ध पक्ष (Shraddh Paksha)को पितृ पर्व कहा गया है। अर्थात् पितरों का वह महापर्व जब वे पितृ लोक से मृत्यु लोक में आते हैं और श्राद्ध कर्म में अपने परिजन द्वारा अर्पित कव्य को ग्रहण कर हर्षित हो उन्हें आशीर्वाद देते हुए जाते हैं। आईये जाने 7 सितम्बर से प्रारम्भ हुए श्राद्ध पक्ष के बारे में–
श्रद्धा +अर्ध्य अर्थात् श्रद्धा के साथ पितरोें को जो अर्पण किया जाता है, वही श्राद्ध है। पितर इससे प्रसन्न होकर आशीर्वाद प्रदान करते हैं और इससे परिवार में सभी सुखों की वृद्धि होती है, ऐसा पुराणों में उल्लेख किया गया है। भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास कृष्ण पक्ष में अमावस्या तक का 16 दिवसीय पक्ष श्राद्ध कहा जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस पक्ष में एक प्रकार से पितरों का मेला लगता है।
ये पृथ्वी लोक में निवास कर रहे अपने सगे संबंधियों के यहाँ जाते हैं और उनके द्वारा प्रदान किए गए कव्य से तृप्त होकर वर्षभर आशीर्वाद प्रदान करते हैं। अतृप्ति की स्थिति में रुष्ट होकर ये शाप देते हैं जिससे परिवार कई प्रकार के दुःखों का भाजन बनता है।
किन किन का करें श्राद्ध
वैसे तो हर व्यक्ति अपने पिता पक्ष की 7 पीढ़ी और माता पक्ष की चार पीढ़ी का ऋणी होता है अतः इनका श्राद्ध आवश्यक है। फिर भी यथाशक्ति अपने पूर्वजों का श्राद्ध किया जा सकता है। इसके साथ ही अपनी पत्नी, मित्र, जामाता, शिष्य, पुत्र व अन्य प्रियजनों का श्राद्ध करने का भी विधान है। संक्षेप में कहा जाए तो ऐसे सभी अपने दिवंगतजनों का श्राद्ध अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए जिनसे हमें स्नेह व प्रेम की प्राप्ति हुई हो, क्योंकि उनकी आत्मा इसकी अपेक्षा करती है।
कहाँ करें श्राद्ध
शास्त्रों में किसी भी तीर्थ स्थान पर किसी भी पवित्र नदी के तट पर अथवा अपने घर पर पिंडदान आदि विधानों के पश्चात गाय के गोबर से बने कंडे को प्रज्वलित कर उस पर धूप देने का नियम है। समयाभाव की स्थिति में अपने निवास पर भी श्राद्ध कर्म किया जा सकता है। प्रथम श्राद्ध मृत्यु तिथि के पश्चात तीसरे वर्ष में पिंडदान के साथ किया जाना चाहिये। इसके पश्चात प्रतिवर्ष मृत्यु तिथि को श्राद्ध किया जाता है।
कैसे करें?
श्राद्ध के पूर्ण लाभ के लिए सही विधि भी अपनाना आवश्यक है। सर्वप्रथम अपने पूर्वज को आमंत्रित करें। इसके पश्चात श्राद्ध स्थल पर काले तिल बिखेर कर दक्षिण दिशा में उन पूर्वज का स्मरण करते हुए तर्पण जल पिण्ड एवं धूप दें। तत्पश्चात् ब्राह्मण भोजन करवाएँ। पितृ श्राद्ध के लिए आमंत्रित किए जाने वाले ब्राह्मणों की संख्या विषम होनी चाहिए।
ब्राह्मण यथा संभव शुद्ध सात्विक प्रकृति के व वेदपाठी हों यह प्रयास करें। दिवंगत पितृ से दुर्भावना रखने वाले ब्राह्मणों को आमंत्रित न किया जाए। भोजन करवाते समय आमंत्रित ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में उत्तराभिमुख बैठाकर भोजन करवाएँ। इसके पश्चात यथा शक्ति वस्त्र, अलंकरण आदि दक्षिणा प्रदान करें। यह सभी पितृ के निमित्त ही होगा। धूप देने के तत्काल बाद गौ, कुत्ते व कौवे को ग्रास देना आवश्यक है।
भाग्योदय का भी अवसर
ज्योतिष में लग्न कुंडली के नवम भाव को भाग्य भाव कहा जाता है। यह भाव गुरु, माता व पिता की सेवा तथा उनके आशीर्वाद से ही पुष्ट होता है। यदि माता, पिता, गुरु व अन्य परिजन जीवित हैं तब तो उनकी सेवाकर आशीर्वाद प्राप्त किए जा सकते हैं और यदि वे दिवंगत हैं तो फिर उनके आशीर्वाद प्राप्ति का श्राद्ध के सिवा और कोई रास्ता नहीं होता। अतः ज्योतिष के अनुसार भी भाग्य भाव को पुष्ट करने में श्राद्ध महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।










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