एक वृक्ष सौ पुत्र समान की कसौटी पर पीपल भी शत-प्रतिशत या कहें उससे भी अधिक खरा उतरता है। इसे हमारी संस्कृति में साक्षात् लक्ष्मीनारायण के रूप में पूजा जाता है। इस पूजन का आधार सिर्फ धार्मिक ही नहीं बल्कि वैज्ञानिक भी है। कारण है इसका संरक्षण क्योंकि यह वृक्ष अपने आप में कई जीवनदायी गुणों से भरपूर है। आईये देखें आखिर क्यों पूजनीय है, पीपल।
विशिष्ट भारतीय संस्कृति में पीपल वृक्ष को बहुत पवित्र एवं पूज्य माना जाता है। कहा गया है कि पीपल के वृक्ष में देवता निवास करते हैं। इसका अर्थ यह है कि पीपल में अनेक विशिष्ट गुण हैं। पीपल का वृक्ष चौबीसों घंटे प्राणवायु देकर वातावरण को शुद्ध एवं स्वास्थ्यप्रद बनाए रखने का कार्य करता है। अतः यह गुण उसे स्वतः ही पूजनीय बना देता है। पीपल को भगवान शंकर के रूप में भी पूजा जाता है।
इसका कारण यह है कि जिस प्रकार समुद मंथन से प्राप्त विष को भगवान शंकर ने पीकर पृथ्वी को बचाया उसी तरह पीपल का वृक्ष भी वातावरण से जहरीली गैसों को निरंतर पीते रहकर मानव जाति को चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देकर कल्याण करता है। यह एक प्रकार से ऑक्सीजन यंत्र ही है।
अतः फेफड़ों, दमा व अस्थमा के रोगियों को इसकी छाया में बैठने से आरोग्य की प्राप्ति होती है। इसके संपर्क में रहने वाले व्यक्ति की आयु लंबी एवं शरीर स्वस्थ रहता है। यह सृष्टि का एकमात्र वृक्ष है, जो 24 घंटे ऑक्सीजन देता है। अन्यथा अन्य सभी वृक्ष तो केवल दिन में ही ऑक्सीजन देते हैं। रात्रि में तो सभी कॉर्बन डाइऑक्साईड ही छोड़ते हैं।
धार्मिक रूप से भी अतिमहत्वपूर्ण
पशु-पक्षियों एवं पेड़-पौधों के पर्यावरणीय महत्व को स्वीकार करते हुये हमारी संस्कृति में उनका सम्मान करने के लिये त्योहारों पर उनकी पूजा व अनुष्ठान तक किए जाते हैं। पीपल की पूजा वैसे तो वर्षभर की जाती है लेकिन होलिका दहन के दसवें दिन ‘दशा माता पर्व’ पर पीपल पूजन का विशेष कार्यक्रम तय है। इसी क्रम में दो दिन पूर्व शीतला सप्तमी या अष्टमी का पूजन भी पीपल के नीचे बने स्थानक के ऊपर रखी खंडित मूर्तियों के पूजन से सम्पन्न होता है।
दशा माता उस गृहदेवी को मानते हैं जो परिवार को सुदशा या सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। पीपल की छाया में व्रत-उपवास करके दशा माता का पूजन एक ओर जहां पीपल के जीवनदायी महत्व का सम्मान करना है, वहीं जीवन में धार्मिक अनुशासन एवं मानवीय गुणों का विकास करना भी है।
पेड़-पौधों का आदर एवं उनकी रक्षा का संकल्प लेना वास्तव में मनुष्य के लिये स्वयं की रक्षा की व्यवस्था करना ही है। पीपल के पवित्र वृक्ष को धार्मिक, ऐतिहासिक या सार्वजनिक स्थलों पर ही रोपित किये जाने का विधान है। इसे घरों में लगाये जाने की मनाही है क्योंकि वैसा पवित्र वातावरण उसे घरों में नहीं मिल सकता है जैसी कि आवश्यकता होती है।
जीवनदायी है पीपल
इस वृक्ष की अनेक विशेषताओं में से एक यह है कि जब वायु बिल्कुल शांत हो तब भी इसके पत्ते हिलते रहते हैं। साथ ही इसके नीचे पानी के कणों का अहसास होता है जिसके कारण भीषण गर्मी में भी इसकी छाया में शीतलता का अनुभव होता है। शांत हवा होने पर भी पत्तों के निरन्तर हिलने और जल वाष्प के कारण छाया के शीतल रहने के बावजूद भी पीपल के पेड़ के नीचे कभी भी अन्धेरा नहीं रहता।
सूर्य की रश्मियाँ सहज ही इसके पत्तों को पार कर धरती पर आती रहती हैं और वातावरण को स्वच्छ बनाती रहती हैं। पीपल के वृक्ष की जड़, टहनियां, पत्ते, फल, छाल, गोंद तथा रस व रेशे आदि सभी अंग मनुष्य को निरोग बनाने में सहायता करते हैं। आयुर्वेद ग्रंथों में इसके चिकित्सीय गुणों को विस्तार से वर्णित किया गया है तथा चिकित्सा शास्त्री मानव को नया जीवन एवं शक्ति देने वाली श्रेष्ठ औषधियां पीपल के अंगों से ही तैयार करते हैं।
साधारण लोग भी इसकी अनेक विशेषताओं से परिचित हैं तथा घरेलू ढंग से कई रोगों के उपचार में पीपल के विभिन्न अंगों का प्रयोग करते है। गांवों के वनों में पीपल के वृक्ष इसीलिये ज्यादा लगाये जाते है ताकि वहां का वातावरण स्वास्थ्यप्रद बना रहे। पीपल की छाल पीलिया रोग दूर करती है।
बोधीवृक्ष के रूप में भी पूज्य
पीपल का वृक्ष लम्बी आयु का वृक्ष है इसलिये इसे अति महत्वपूर्ण स्थानों पर रोपित करने की परम्परा रही है। भारतीय इतिहास में तो इसे हर युग में महत्वपूर्ण स्थान रहा है। यह वृक्ष अपने नीचे बैठने वाले व्यक्ति को न केवल आरोग्य व बल प्रदान करता है, वरन् उसे विवेकशील, ज्ञानवान व योगी के गुण भी प्रदान करता है, फलस्वरूप उसे सत्य का बोध हो जाता है।
बोधत्व प्रदान करने के इस गुण के कारण ही इसे बोधीवृक्ष के रूप में पूजा जाता है। बुद्ध को बोधीवृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्ति से लेकर अशोक की पुत्री संघमित्रा का बोधीवृक्ष की डाल लेकर धर्मदूत की मैत्री यात्रा के उद्देश्य से श्रीलंका जाना विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखी घटना है।
बौद्धकाल में राजमार्गों, धार्मिक स्थलों के आसपास व कुंओं के निकट पीपल के वृक्ष लगाने की ही परंपरा थी, जिसके कारण यात्रियों को विश्राम के लिये उत्तम छाया एवं शुद्ध जल की प्राप्ति होती थी।










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