साहित्य जगत के ‘सृजन हंस’- Dr. Vinod Somani

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हंस आमतौर पर ऊँची व लंबी उड़ान तथा अपनी उत्कृष्टता के लिये जाने जाते हैं। अजमेर निवासी डॉ विनोद सोमानी की पहचान केवल उपनाम ‘हंस’ द्वारा ही नहीं बल्कि साहित्य जगत में उनकी हंस की तरह लंबी उड़ान से भी है। डॉ विनोद सोमानी (Dr Vinod Somani) अपनी इस दीर्घ साहित्य सेवा में अभी तक लगभग 36 पुस्तकों का सृजन कर हिन्दी व राजस्थानी दोनों साहित्य की सेवा कर रहे हैं।

साहित्य जगत में एक उत्कृष्ट कवि, कहानीकार, उपन्यासकार, व्यंग्यकार, निबंधकार, जीवनी लेखक एवं अनुवादक के रूप में अपनी पहचान रखने वाले 86 वर्षीय डॉ. विनोद सोमानी ‘‘हंस’’ वर्तमान में साहित्य जगत में एक अत्यंत सम्मानजनक नाम बन चुके हैं। उन्होंने अपनी लेखनी से न सिर्फ हिन्दी साहित्य को समृद्ध किया बल्कि राजस्थानी में भी पुस्तकों का सृजन किया।

अभी तक ‘‘हंस’’ की हिन्दी में 26 तथा राजस्थानी में 10 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। इनमें 15 कविता संग्रह, 10 कहानी संग्रह, 6 उपन्यास, 2 व्यंग्य तथा 3 जीवनी, अनुवाद व निबंध संग्रह शामिल हैं। 86 वर्ष की अवस्था में भी उनकी लेखनी साहित्य की सेवा कर रही है।

उनकी कई रचनाऐं देश की 200 से अधिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं और आकाशवाणी, दूरदर्शन आदि पर इनका प्रसारण भी हो चुका है। कई पत्रिकाओं का आपने मानद सम्पादन किया है। समाजसेवा के अंतर्गत महासभा कार्यकारी मंडल सदस्य तथा प्रांतीय व स्थानीय सभा के भी सक्रिय सदस्य रहे हैं।


हंस का जन्म 4 नवम्बर 1938 को महेन्द्रगढ़ (भीलवाड़ा) में पिताश्री स्व. श्री रामराय जी सोमानी एवं माताश्री स्व. अलोल बाई के यहाँ ग्रामीण माहौल में हुआ था। प्रारंभिक शिक्षा गांव-ढाणी में ही हुई। पिताजी को अध्यापकों ने कहा कि इस बालक को आगे भी पढ़ाओ। कक्षा 7 चित्तौड़ से, कक्षा 8, 9 व 10 तक रायपुर (भीलवाड़ा) के छात्रावास में रह कर शिक्षा ग्रहण की। मेट्रिक प्राइवेट की पर क्लासें स्कूल में ही लगती थी।

उनकी प्रथम कविता का जन्म एक कैंप के दौरान हुआ। कैंप पहाड़ी स्थान पर लगा था, जहाँ पहाड़, नदी, झरना सब कुछ था। गुरुजी ने वहाँ कुछ लिखने को कहा तो वहाँ पहली कविता ‘‘गंगा जैसा निर्मल पानी भरा हुआ है इस सर में’’, जब सुनाई तो सबको बहुत पसन्द आई।

उन्हीं दिनों आयोजित एक प्रतियोगिता में कविता, गायन, वाद-विवाद व निबन्ध प्रतियोगिताओं सभी में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। श्री मोहन लाल सुखाडिया के हाथों पुरस्कार प्राप्त हुआ। तभी से गुरुजनों व साथियों ने उन्हें हँस कहना प्रारंभ कर दिया और यह उपनाम आज भी जुड़ा हुआ है। हंस यानी नीर-क्षीर विवेक।


सन् 1957 में कई प्राइवेट नौकरियों के बाद जीवन बीमा निगम में चयन हुआ। इसके साथ उन्होंने प्रात:कालीन कक्षायें जॉइन कर बी.ए. व एम.ए. किया। डिपार्टमेंट की परीक्षायें भी पास की। घर भी संभाला, साहित्य भी साथी बना रहा। जीवन में जवानी कब आई पता नहीं। वक्त से पहले मेच्योरिटी आ गई। पिताजी कल्याण मंगवाते थे, वे भी वह पढ़ते थे, तो भाषा की समझ पैदा हुई। उसके कारण साहित्य में भी गंभीरता आ गई।

पत्नी स्व. विद्या सोमानी व पुत्र डॉ. (सी.ए.) श्याम सोमानी का बहुत सहयोग रहा। लिखना तो सन् 53 में ही चालू कर दिया था पर, पहली पुस्तक आने में काफी विलम्ब रहा। एक बार एक कवि-सम्मेलन में उनकी भेंट रामकल्याण लड्ढा (कोटा) से हो गई। उनको श्री सोमानी की कविताएँ बहुत पसन्द आई। वे काव्य प्रेमी भी थे- समाज सेवी तो थे ही, उद्योगपति भी हैं। उन्होंने प्रेरणा दी, पहली पुस्तक का सारा व्यय उठाया और 1968 में ‘त्रिकोण’ नाम से पहला कविता-संग्रह छपा।

भाग्य से गौरी शंकर तोषनीवाल के सहयोग से सेठ गोविन्ददास जैसे प्रख्यात सांसद, हिन्दी सेवी व साहित्यकार से मिलना हो गया। उन्होंने भूमिका लिख दी और इस तरह पुस्तक प्रकाशन का मार्ग प्रशस्त हो गया जो उनकी 86 वर्ष की आयु में भी चालू है। समाज रत्न रामचंद्र बिहानी, सांसद श्रीकरण शारदा, कर विशेषज्ञ राम निवास लखोटिया, बालकृष्ण बलदुआ, चांदरतन मोहता आदि कई महानुभावों का आशीर्वाद मिला। बृजलाल बिहाणी, रामकृष्ण धूत्त, राम कृष्ण जाजू आदि की प्रारंभिक प्रेरणायें वरदान रहीं।


उनके लिखे सैंकड़ों भजन विभिन्न गायको द्वारा गाये जा रहे हैं। उनमें से प्रमुख हैं- राजस्थान की आशा भोंसले वीणा मोदानी (जयपुर), श्रद्धा गट्टाणी (उदयपुर), सविता शारदा (निम्बाहेडा), स्व.विद्या सोमानी, सीमा समदानी, दीपाली गट्टाणी, वन्दना नोबाल (जयपुर) कविता सोढाणी (मुंबई) आदि अन्य कई गायकों ने सीडी, वीडीओ आदि बनाकर प्रचारित किया है। तेजश्री परवाल ने भी उनके लिखे गीत गाये हैं।

अनेक सामाजिक, साहित्यिक संस्थाओं ने सार्वजनिक सम्मान किया है। जीवन बीमा निगम में सेवाकाल के दौरान अभिनन्दन किया गया। रावत सारस्वत केन्द्रीय साहित्य अकादमी में थे, तभी कहानी-संग्रह छपा था उसमें उनकी कहानी शामिल की गई। ‘‘हंस’’ अभी तक गणेशी लाल व्यास ‘उस्ताद’ पद्य पुरस्कार ‘राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी (बीकानेर), ‘अमृत सम्मान’ राजस्थान साहित्य अकादमी (उदयपुर) ‘लखोटिया पुरस्कार’ रामनिवास आशारानी लखोटिया ट्रस्ट (नईदिल्ली), ‘राष्ट्रीय राजस्थानी अनुवाद पुस्कार’ साहित्य अकादेमी (नई दिल्ली), प्रेमचंद लेखक पुरस्कार दलित साहित्य अकादमी (महाराष्ट्र), महाकवि गुलाब खण्डेलवाल काव्य पुरस्कार’ स्मृति संस्थान (चित्तोड़गढ़)। आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत हो चुके हैं।

इसके साथ ही आप अभी तक भारती रत्न, मरुश्री, महाकवि वृन्द, राजस्थान रत्न, बृज गौरव, रोशनी का रथ, कोरोना कलम योद्धा आदि अलंकरणों से अलंकृत हुए हैं। आपने एम.ए. तथा ए.एफ.आई.आई की उपाधि तो स्वयं ने शिक्षा से ग्रहण की, उनकी प्रतिभा ने उन्हें डी.आर. लिट्. की उपाधि से मानद रूप से अलंकृत भी करवाया।


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