संस्कृति व संस्कार के साथ संयुक्त परिवार भी जरुरी

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पशु और मानव में भेद मानव की संस्कृति व संस्कार के कारण है, अन्यथा दोनों समान ही हैं। वास्तव में देखा जाऐ तो इनके साथ ही वर्तमान में भी मानव जीवन के लिये सबसे ज्यादा जरूरी है तो वह है संयुक्त परिवार। कारण यह है कि संयुक्त परिवार यदि हैं, तो संस्कृति व संस्कार तो स्वत: ही आ जाते हैं।

Tribhuvan Kabra

हम परम भाग्यशाली हैं कि हमें मनुष्य जीवन प्राप्त हुआ है। जनम से लेकर मरण तक मनुष्य के सामने अनेकों सम्बन्ध, तरह-तरह की जिम्मेदारियां, विभिन्न परिस्थितियां आदि आती हैं। ईश्वर ने एकमात्र प्राणी ऐसा बनाया, जो इन सभी विषयों को निभाने में सक्षम हैं और वह दूसरा कोई नहीं, वह है ‘मनुष्य’। कुछ वर्षों के अंतराल में मनुष्य में कुछ-न-कुछ बदलाव आये और साथ में कुछ नई जिम्मेदारियां भी। साथ ही कुछ ऐसे मोड़ आते हैं, जब परिस्थितियां उसे कुछ फैसले लेने के लिए बाध्य कर देती हैं, जो उसकी इच्छा के विरुद्ध होते हैं, तब उसका मन विचिलित रहता है, वह पूरी तरह से प्रसन्न भी नहीं रह पाता।

एक महिला, अपने बच्चे को नौ महीने तक अपने गर्भ में बड़ा करती है और उसके बाद उसे जन्म देती है। इन नौ महीनों की अवधि में वह महिला जो कुछ भी करती है, उसका सीधा असर उसके गर्भ में पल रहे बच्चे पर पड़ता है। इसलिए महिला को गर्भ धारण के पश्चात अपने खान-पान, रहन-सहन, आचार-विचार आदि सभी पर विशेष ध्यान देना चाहिये। पारिवारिक सम्बन्ध में मधुरता भरा व्यवहार करना चाहिए, ईश्वर की पूजा-अर्चना करनी चाहिए, जिससे होने वाले बच्चे पर अपनी संस्कृति एवं संस्कार की छाप पड़े। महाभारत कथा में उल्लेख है- अभिमन्यु ने अपनी माँ के गर्भ में ही सुनकर युद्धकला सीख ली थी।

मन, वाचा, कर्मणा और शरीर को पवित्र रखना ही संस्कार है। संस्कार से ही हमारे सामाजिक एवं आध्यात्मिक जीवन की गरिमा बढ़ती है तथा इसका पालन करने वाले लोग सभ्य कहलाते हैं। संस्कारों के विपरीत आचरण करना असभ्य की निशानी है। माना कि मानव एवं समाज निरंतर परिवर्तनशील है, परंतु हमें परिवर्तन राष्ट्र विकास की ओर अग्रसर होने की दृष्टी से अपनाना चाहिए न कि संस्कृति और संस्कारों का पतन करने के लिए।

वर्तमान परिवेश में संस्कारों को मनमाने तरीके से लेकर मतभिन्नता का परिचय देना एक चलन-सा (फैशन) हो गया है, जो हमारी संस्कृति के विरुद्ध है। हमें सदैव याद रखना है कि संस्कार का सम्बन्ध सिर्फ व्यक्ति से ही नहीं है बल्कि परिवार, समाज एवं राष्ट्र से भी जुड़ा है। अतः जीवन में अपनी संस्कृति और संस्कार को कभी नहीं खोना चाहिये, चाहे परिस्थिति कैसी भी क्यों ना हों।

बड़ा दुःख होता है जब हम अपने आस-पास में अपने ही लोगों को अपनी संस्कृति और संस्कार के विपरीत चलते हुए देखते हैं। वह चाहे अनजाने में ही ऐसा कर रहे हों। हमें चाहिए कि हम ऐसा करने वाले लोगों को समझाऐं, उनसे आग्रह करें और ऐसा करने से उन्हें रोकें। समाज व राष्ट्र के प्रति यह हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा दक्षिण भारत के लोग अपनी संस्कृति और संस्कार के अनुसार ही अपना जीवन व्यतीत करना पसंद करते हैं। वे लोग किसी भी परिस्थिति में अपनी संस्कृति को नहीं भूलते, जबकि समय के साथ-साथ प्रगति की दृष्टी से आवश्यक परिवर्तनों को अपनाते भी हैं।

किन्तु उनका रहन-सहन, खान-पान, पहनावा, उनकी भाषा आदि में आज भी उनकी संस्कृति और उनके संस्कारों को स्पष्ट रूप में देखा जा सकता है। हम सभी को चाहिए कि हम भी उनकी इस अच्छी आदत को अपनायें और उसका पालन करें। हमें चाहिए कि समाज के अधिकतर लोगों के साथ अपनी मातृ भाषा में ही वार्तालाप करें। अपने आचरण, व्यवहार, पहनावे, विचार आदि के जरिए अपने संस्कारों की झलक दें। ऐसा करने से हम हमारी संस्कृति, हमारे संस्कार और हमारे समाज को विलुप्त होने से बचा सकते हैं।

हमारे समाज में भी संयुक्त परिवार की जगह एकल परिवार लेते जा रहा है, जिसकी संख्या निरंतर बढ़ती जा रही हैं। साथ ही एक ही बच्चे के बाद हम वंश को सीमित करते जा रहे हैं। हम सभी को इस विषय को गंभीरता से लेना चाहिए और इसकी रोक-थाम का प्रयत्न करना चाहिए। यदि हम वंश को नहीं बढ़ाएंगे, तो हमारा समाज विलुप्त होते जाएगा। आज-कल के बच्चों में अपने समाज की संस्कृति और संस्कारों की जानकारी का अभाव दिखाई देता है, जिसका मुख्य कारण है- दादा-दादी के साथ नहीं रहना, माता-पिता दोनों का घर से बाहर जाकर काम करना।

अपने रिश्तेदारों के प्रति बच्चों में अपनापन, प्रेम तभी उत्पन्न होगा जब वे उनसे मिलेंगे, उनके साथ रहेंगे। शायद इसीलिए बच्चों को छुट्टियों में अपने ननिहाल, अपनी बुआ, अपने चाचा के घर कुछ दिनों रहने के लिए भेजने की परंपरा है। माता-पिता स्वयं बच्चों के सामने अपने माता-पिता की सेवा कर उनकी देखभाल करेंगे, तभी तो उन बच्चों के मन में यह सब करने की भावना का निर्माण होगा, उनको प्रेरणा मिलेगी। इसीलिए हमें अपने व्यस्त जीवन में से कुछ समय निकालकर अपने बच्चों के साथ बैठकर उन्हें सम्बन्धो का महत्व बताना चाहिए। साथ ही उसे इस पवित्र सम्बन्ध को निभाने के लिए प्रेरित भी करना चाहिए।

सोशल मीडिया का आवश्यकता से अधिक उपयोग करना, यह भी वर्तमान की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। काम की व्यस्तता की वजह से पहले ही परिवार के लोगों के साथ समय बिताना मुश्किल होता है, फिर बचे हुए समय को भी हम व्हाट्सप, फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्यूटर आदि जैसे सोशल मीडिया के साथ बीता देते हैं। इस कारण परिवार के लोगो के साथ हम समय ही नहीं बीता पाते हैं। परिवार के लोगों के बीच दूरियां बढ़ने का यह भी एक मुख्य कारण है।

माता-पिता चाहते हैं कि मेरा बच्चा पढ़-लिखकर इंजीनियर, डॉक्टर, वकील, कलाकार आदि बने। साथ ही खेल-कूद में भी सबसे आगे रहे। इसे पूरा करने के लिए अनजाने में ही सही वे अपने बच्चो पर आवश्यकता से अधिक दबाव देने लगते हैं। वे बच्चों को मशीन अथवा रोबोट की तरह समझते हैं। इससे बच्चों पर निरंतर बोझ बढ़ता जा रहा है, परिणामस्वरूप उसके स्वास्थ्य व मानसिकता पर असर पड़ रहा है।

क्या हमने कभी ऐसा सोचा है कि हमारे बच्चे क्या चाहते है? हमें चाहिए कि हम अपने बच्चे की रूचि के अनुसार उसे उसके जीवन में आगे बढ़ने के लिए मार्गदर्शित करें। बच्चे तो कच्ची मिट्टी के समान होते हैं, उसे जिस सांचा में डालें वैसा ही रूप ग्रहण करता है, जैसा संस्कार मिलेगा वैसा ही व्यक्तित्व बनेगा।


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