Save 20% off! Join our newsletter and get 20% off right away!
माया

हमारे और परमात्मा के बीच माया को नहीं आने दें

पं विजयशंकर मेहता

रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि माया को सरलता से समझना हो, तो श्रीरामकथा के एक दृश्य में प्रवेश किया जाए। वनवास के समय श्रीराम आगे चलते थे, मध्य में सीताजी होती थीं और उनके पीछे लक्ष्मण रहते थे।

जरुरत की चादर और मोह की दुशाला इन दोनों में जो फर्क है, उस अंतर को समझने का अब समय आ रहा है। आध्यात्मा मार्ग के लोगों को ध्यान रखना होगा की आवश्यकता वस्तुएं तो बनाई जाएँ लेकिन उससे मोह नहीं पालें, क्योंकि मोह धीरे से लोभ में बदल जाता है और लोभ भक्ति के साथ-साथ पारिवारिक दायित्वों में भी बाधक होता है।

भगवान श्रीराम परमात्मा का रूप हैं, लक्ष्मणजी आत्मा या कहें जीवात्मा हैं और इन दोनों के बीच में माया स्वरुप में सीताजी हैं। सीताजी रामजी के चरणों की अनुगामी थीं। जहाँ-जहाँ श्रीराम पैर रखते थे वहीं-वहीं सीताजी चलती थीं और इसी कारण लक्ष्मणजी श्रीरामजी को ठीक से देख नहीं पाते थे। संयोग से कोई मोड़ आ जाता तो ही लक्ष्मणजी को श्रीराम दिख जाते थे।

सन्देश यह है कि परमात्मा और जीवात्मा के बीच जब तक माया है, परमात्मा दिखेंगे नहीं। किसी मोड़ पर माया ज़रा सी हटी और परमात्मा के दर्शन हुए। भक्ति में ऐसे मोड़ आते ही रहते हैं। इसलिए जीवन में माया तो रहेगी पर हमें मोड़ बनाए रखना है। यही हमारी भक्ति की परीक्षा होगी।

परिवार से भी प्रेम तो रखें, बहुत जरुरी भी है लेकिन ऐसा न हो कि उसके मोह में परमात्मा को ही भूल जाएं। माया से पार पाने के लिए एक काम और किया जा सकता है- जरा मुस्कुराइए सदा मुस्कुराइए।

Subscribe us on YouTube