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हम जागेंगे तभी बचेगा पर्यावरण

‘पर्यावरण’ का संक्षिप्त अर्थ है, हमारे चहुंओर का संपूर्ण वातावरण। पर्यावरण का संतुलन कितना आवश्यक है, इसका अनुमान आप इसी से लगा सकते हैं कि हमारे वेद, पुराण हों या प्राचीन शिलालेख अथवा पंचतंत्र की कथा या अन्य कोई धर्मग्रंथ लगभग सभी में इसका महत्व प्रतिपादित है। कारण यही है कि हम जागेंगे, तभी बचेगा पर्यावरण और पर्यावरण बचेगा, तभी हम।
– राजकुमार आर. जाजू, वर्धा

सजीव, निर्जीव, हवा, जमीन और पानी इन सारी बातों का समावेश अर्थात अपने चहुंओर जो भी दिखता है, वह है पर्यावरण। इस पृथ्वी पर चर-अचर का संबंध अटूट है। यह संबंध ही पर्यावरण का जनक है। इसका आधार संतुलन है। संतुलन डगमगाया नहीं कि पर्यावरण का ताना-बाना छिन्न-भिन्न होते देर नहीं लगती। हमने अपनी जरूरतों के लिए जंगल काट दिये और इससे वन्य जीवों का नाश हो गया जो कि पर्यावरण संतुलन से संबंध रखते थे।

बड़ी-बड़ी इमारतों, उद्योगों एवं रास्तों के निर्माण के लिए पहाड़ उजाड़ दिए। नदियों के पानी को पीने या नहाने लायक नहीं छोड़ा। कीटनाशकों के छिड़काव एवं रासायनिक खादों से हमने धरती की उर्वरा शक्ति घटा दी। पॉलिथीन हमारी जिंदगी का हिस्सा बनकर पर्यावरण के गले में फांस की तरह अटक रहा है। पैदल चलना हम भूल चुके हैं। बढ़ती आबादी से बढ़ते वाहनों ने जहरीला धुआँ छोड़कर तथा मोबाइल आदि की तरंगों ने हवा को भी प्रदूषित कर दिया है।

महात्मा गांधी ने कहा था कि कुदरत हमारी जरुरतों को तो पूरा कर सकते हैं, लेकिन लालच को नहीं। पर गांधीजी को कौन याद रखता है? और जब वैज्ञानिकों ने चेतावनियां देना आरंभ किया, पर्यावरण प्रदूषण समस्या गंभीर हुई तब संयुक्त राष्ट्र संघ ने सन १९७२ में महासभा में ५ जून को ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ घोषित किया।

अब प्रकृति होने लगी है नाराज :

पर्यावरण के साथ मनुष्य की छेड़छाड़ ने मौसम का मिजाज बदल दिया है। प्रकृति नाराज हो उठी है। यह विडंबना है कि एक ओर जहां उत्तर भारत लू के थपेड़े झेल रहा है, वहीं पश्चिमी तट पर बेमौसम भीषण तूफान आ रहे हैं। फसलें चौपट होने से ढेरों किसान आत्महत्या कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र पॅनल की नवीनतम रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि तापमान बढ़ने (ग्लोबल वार्मिंग) से ‘भारत’ सर्वाधिक प्रभावित होने वाले देशों में शुमार हो सकता है।

पहले तो कहा गया कि दुनिया सुंदर होती जा रही है लेकिन पर्यावरण में कुछ ऐसी हलचलें होने लगी कि औद्योगिकरण के इस सरपट भागते घोड़े पर लगाम लगाने की बात होने लगी लेकिन ब्रेक लगाना इतना आसान नहीं होता। जब हम कोयला जलाते हैं या तेल का उपयोग करते हैं तो वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों को पहुंचाते हैं और प्रदूषण बढ़ाते हैं।

इन गैसों को ग्रीनहाउस गैस इसीलिए कहा जाता है क्योंकि उनके प्रभाव से वायुमंडल एक अदृश्य आवरण से ढंक जाता है, जिसके कारण गर्म पृथ्वी अपना ‘बुखार’ कम करने में असमर्थ हो जाती है और उसका तापमान वैसे ही कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है। रेफ्रिजरेटरों, ऐरकण्डीशनरो तथा एयरोसेल स्प्रे में प्रयुक्त होने वाले रसायनों से भी ग्रीनहाउस गैसों का घनत्व बढ़ता है।

नहीं संभलें तो होगा महाविनाश :

तटीय विपदा : ग्लोबल वार्मिंग के कारण सन २१०० तक समुद्र का जल स्तर ४० से.मी. तक बढ़ जायेगा और भारत के तटीय इलाकों में ५ करोड़ लोग विस्थापित हो जायेंगे। सन २०२० तक मुंबई का गेटवे ऑफ इंडिया आधे से अधिक डूब जायेगा।
मैदानी इलाकों में आफत : शीत ऋतु की अवधि घट जायेगी जिससे पानी की कमी हो जायेगी। चरागाहों का आकर घट जायेगा और चारे की समस्या पैदा हो जायेगी।
डेंगू जैसी महामारी : मच्छरों की आबादी और किस्में बढ़ेंगी और इनसे डेंगू तथा मलेरिया जैसी बीमारियाँ तेजी से बढ़ जायेंगी। पैचिस, हैजा और कुपोषण जैसी बीमारियाँ मौत का तांडव रचती हुई कहकर बरपा देंगी।
हिमनदों का का पिघलना : तिब्बत के पठारों पर हिमनद तेजी से पिघलने लगेंगे और २०३० तक इनका आकार ५ लाख वर्ग कि.मी. से घटकर १ लाख वर्ग कि.मी. रह जायेगा। पहले तो नदियों में भयंकर बाढ़ आयेगी, फिर नदियाँ तेजी से सूखने लगेंगी। गंगा का पठार तो पूरी तरह बंजर हो सकता है। रेगिस्तान फैलता ही जायेगा।
समुद्री संकट : समुद्रों के अधिक गर्म होने से ब्लीचिंग की प्रक्रिया शुरू होगी। सीपियों, शंखों, मछलियाँ एवं समुद्री जीवों आदि का विनाश होगा।
नष्ट होंगे वन : अनियमित बारिश और ठंड की तीव्रता घटने से भारत के जंगल तेजी से कम होंगे। जैव-विविधता नष्ट हो जायेगी।
बदतर हालात : फैलते रेगिस्तान के कारण उत्तर भारत में दुश्वारियां बढ़ेंगी। भारत में अनाज कम से कम ३३ प्रतिशत तक घट जायेगा। सबसे ज्यादा असर गेहूँ की पैदावार पर होगा। पानी की किल्लत आम हो जाएगी।

पर्यावरण के लिये क्या करें हम:

ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगायें : देश की आबादी तेजी से बढ़ रही है। इससे मनुष्यों को सांस लेने के लिए अधिक ऑक्सीजन की जरूरत पड़ेगी। पेड़ कार्बन डाय ऑक्साईड सोखते हैं और भरपूर मात्रा में ‘प्राणवायु’ देते हैं। यदि एक व्यक्ति एक भी पेड़ लगा दे तो कई अबर पेड़ बड़े होने लगेंगे। लोगों को यह बताया जाना जरूरी है कि एक पत्ता अपने जीवनकाल में इतना ऑक्सीजन उत्पादित करता है जिससे एक आदमी चार दिनों तक सांस ले सकता है। एक बड़ा पेड़ अपने जीवनकाल में करीब साढ़े तीन सौ करोड़ रुपये के बराबरी तक की सेवाएँ प्रदान करता है।
जल संरक्षण : अपने मैदान या फसलों की सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर या ड्रिप-इरिगेशन उपकरणों का इस्तेमाल करें। जल संरक्षण के लिये रैन वॉटर हार्वेस्टिंग जैसी पद्धति तत्काल अपनाना होगी। खुली जगहों पर पेड़-पौधे या घास उगाकर हम पानी रोक सकते हैं। खेल, खलिहान, मकान या दुकान जहाँ कहीं भी पानी बह रहा हो उसे सहेजकर जमीन में उतारना होगा।
पैदल चलें-गाड़ी से नहीं : अगर आपको चिप्स या पान खरीदना हो तो मुहल्ले की दुकान तक पैदल जाएं, गाड़ी से नहीं, अगर गाड़ी से ही जाना हो तो एक साथ कई काम कर लें। हो सके तो साइकिल का इस्तेमाल करें, जिससे बचत तो होगी, व्यायाम भी हो जायेगा। वातावरण भी कार्बन-डाय-ऑक्साईड गैस से प्रदूषित होने से थोड़ें अंश से ही सही बच जायेगा।
पॉलीथिन बैग्ज का प्रयोग न करें : पॉलीथिन थैलियां जमीन में दब जाने से धरती बंजर हो जाती है। पशुओं के लिए ये जानलेवा साबित हो रही है। कचरे के साथ इन्हें जलाने से जहरीली गैसों से वायु प्रदूषित हो रही है। जल की निकासी इनसे अवरूद्ध हो जाती है। अतः इनकी जगह कागज के लिफाफों का उपयोग करें।
बायोफ्युल अपनाएं: बायोडीजल से लेकर एथेनॉल जैसे प्राकृतिक ईंधन पर चलने वाली कारों का इस्तेमाल करें।
बिजली की बचत : लंबे समय तक चलने वाले व एक चौथाई ही बिजली खपत करने वाले सीएफएल व एलईडी लगाएं। जब काम हो जाएं कम्प्यूटर, लाईट, गीजर तत्काल आदि बंद कर दें।
सौर उपकरण लगाएं : सोलर हीटर, सोलर गिजर, सोलकर कुकर जैसे उपकरण पर्यावरण के लिए बेहतर साबित हो रहे हैं।
पवन ऊर्जा का प्रयोग करें : हम अपने घर पवन चक्की तो नहीं लगा सकते पर ‘सेज’ में कारखाना लगा रहे हैं तो पवन- ऊर्जा को बढ़ावा देने की वकालत तो कर ही सकते हैं।
स्वच्छ प्रौद्योगिकी की मांग करें : सरकार पर दबाव डालें कि वे विकसित देशों से पर्यावरण के अनुकूल प्रौद्योगिकी खरीदें ताकि हम अनुसंधान और विकास पर मोटी रकम खर्च किए बगैर उत्सर्जन की मात्रा कम कर सके
टायर प्रेशर चेक करें: वाहनों के टायरों का परीक्षण करते रहें। पर्याप्त हवा से ईंधन कम खपत होता है।
पर्यावरण के अनुकूल भवन बनाएं : हम ऐसे वास्तुकार की मदद ले सकते हैं जो ऊर्जा के अधिकतम इस्तेमाल का तरीका जानता हो।
हवाई यात्रा कम करें : इसकी जगह अगर फोन या ई मेल से काम हो सकता है, तो ऐसा ही करें। पैसा भी बचेगा और दुनिया कार्बन डायऑक्साईड के उत्सर्जन से भी बचेगी।
दूसरों को भी शिक्षित करें : भले ही आप प्राकृतिक संसाधनों को संरक्षित कर रहे हों, लेकिन आपका पड़ोसी अगर ऐसा नहीं कर रहा है तो आपको कोई खास फायदा नहीं हो रहा है।
कम उपयोग करें : आप ‘योगी न बनें’ पर कुछ अतिरिक्त खरीदते वक्त स्वयं से पूछें कि क्या आपको वाकई इसकी जरूरत है।

सभी समझें अपनी जिम्मदारियां:

हम चाहें जितने भी धनी हो जायें और कितने भी विकसित हो जाए, उससे हमारा जीवन नहीं चलने वाला। पर्यावरण की सुरक्षा पर भी हमारा जीवन निर्भर है। लोगों को जागरुक करने और पर्यावरण से जुड़ी बुनियादी समस्याओं का अध्ययन कर लेने के बाद जरूरी है कि अब नीति बनाने वाले लोगों पर दबाव बनाया जाये ताकि वे औद्योगिकीकरण से लेकर आवास की समस्या हल करने तक जो भी नीति बनायें उसमें पर्यावरण सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें।

हमें यह मानसिकता बदलनी होगी कि पहले विकास कर लें और फिर पर्यावरण के बारे में सोचेंगे। दोनों काम साथ-साथ करने होंगे। तीसरी बात यह है कि पर्यावरण सुरक्षा की नीतियों में आम लोगों को तथा गैर-सरकारी संस्थाओं को भी शामिल करना होगा। स्कूल, कॉलेजेस में आरंभ से ही पर्यावरण विषय अनिवार्य करना होगा। जनमानस में भी चेतना जगाने के लिए स्पर्धाओं के माध्यम से ही सही ‘पर्यावरण’ विषय चर्चा में रखना होगा।

यदि हम ऐसा कर पाये तो अब भी बहुत देर नहीं हुई है। आइये हम हमारे बच्चों को प्रदूषण मुक्त, स्वच्छ एवं बिल्कुल नैसर्गिक पर्यावरण उपहार में देकर जाने का संकल्प करें।


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Sri Maheshwari Times

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