विश्व धरोहर में शामिल हुआ रामप्पा मंदिर

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वरंगल अब विश्व स्तर पर अपनी पहचान बना रहा है और इस पहचान का कारण है, 900 वर्ष से भी पुराना रामप्पा मंदिर। यह मंदिर यूनेस्को (UNESCO) द्वारा विश्व धरोहर में शामिल किया गया है। इससे विश्व भर के पर्यटक इसे देखेंगे और इसके माध्यम से प्राचीन भारतीय वास्तुकला की ख्याति को विश्व भर में पहुंचाऐंगे।

तैरने वाले पत्थरों से बने भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की मूर्तियों और छत के अंदर जो पत्थर उपयोग किया गया है वह है बेसाल्ट जो कि पृथ्वी पर सबसे मुश्किल पत्थरों में से एक है। इसे आज की आधुनिक DIAMOND ELECTRON MACHINE ही काट सकती है, वह भी केवल 1 इंच प्रति घंटे दर से। अब आप सोचिये कैसे इन्होंने 900 साल पहले इस पत्थर पर इतनी बारीक कारीगरी की।

यहां पर एक नृत्यांगना की मूर्ति भी है जिसने हाई हील पहनी हुई है। सबसे ज्यादा अगर कुछ आश्चर्यजनक है वह है इस मंदिर की छत। यहां पर इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसकी सुंदरता देखते ही बनती है। मंदिर के बाहर की तरफ जो पिलर लगे हुए हैं उन पर कारीगरी देखिए, दूसरा उनकी चमक और लेवल में कटाई। मंदिर प्रांगण में एक नंदी भी है जो इसी पत्थर से बना हुआ है और जिसकी ऊंचाई नौ फीट है। उस पर जो कारीगरी की हुई है वह भी बहुत अद्भुत है।

पुरातात्विक टीम जब यहां पहुंची तो वह इस मंदिर की शिल्प कला और कारीगिरी से बहुत ज्यादा प्रभावित हुई लेकिन वह एक बात समझ नहीं पा रहे थे कि यह पत्थर क्या है और इतने लंबे समय से कैसे टिका हुआ है। पत्थर इतना सख्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा हल्का है और वह पानी में तैर सकता है। इसी वजह से आज इतने लंबे समय के बाद भी मंदिर को किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुंची है। यह सब आज के समय में भी करना असंभव है, इतनी अच्छी टेक्नोलॉजी होने के बाद भी, जबकि 900 साल पहले तो इनके पास मशीनरी भी नहीं थी।


प्राचीन स्थापत्य का नमूना

Ramappa temple pillar

इसे देखकर लगता है कि उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा आगे थी। यह सब इस वजह से संभव था कि उस समय वास्तु शास्त्र और इसे देखकर लगता है कि उस समय की टेक्नोलॉजी आज से भी ज्यादा शिल्पशास्त्र से जुड़ी हुई बहुत सी किताबें उपलब्धि थीं जिनके माध्यम से ही यह निर्माण संभव हो पाये।

उस समय के जो इंजीनियर थे उनको इस बारे में लंबा अनुभव था क्योंकि सनातन संस्कृति के अंदर यह सब लंबे समय से किया जा रहा है। मंदिर का नाम इसके शिल्पी के नाम पर रखा हुआ क्योंकि उस समय के राजा शिल्पी के काम से बहुत ज्यादा खुश हुए और उन्होंने इस मंदिर का नाम शिल्पी के नाम पर ही रख दिया।

यह मंदिर भीषण आपदाओं को झेलने के बाद भी आज तक सुरक्षित है। छह फीट ऊंचे प्लैटफॉर्म पर बने इस मंदिर की दीवारों पर महाभारत और रामायण के दृश्य उकेरे हुए हैं। यह रामायण और महाभारत दृश्य एक ही पत्थर पर उकेरे गए है, वह भी छीनी हथोड़े से। आप बनाते समय की कल्पना कीजिये, हथौड़ा गलत पड़ा और महीनों वर्षों का श्रम नष्ट।


किसी भी आपदा से क्षतिग्रस्त नहीं

आज तक इस मंदिर में कोई क्षति नही हुई है, मंदिर के न टूटने की बात जब पुरातत्व विज्ञानियों को पता चली, तो उन्होंने मंदिर की जांच की। पुरातत्व विज्ञानी अपनी जांच के दौरान काफी प्रयत्नों के बाद भी मंदिर के इस रहस्य का पता लगाने में सफल नहीं हुए। बाद में जब पुरातत्व विज्ञानियों ने मंदिर के पत्थर को काटा, तब पता चला कि यह पत्थर वजन में काफी हल्के हैं।

उन्होंने पत्थर के टुकड़े को पानी में डाला, तब वह टुकड़ा पानी में तैरने लगा। पानी में तैरते पत्थर को देखकर मंदिर के रहस्य का पता चला। सबसे बड़ा रहस्य यह है कि इस मंदिर में जो पत्थर मिले हैं, वह पत्थर विश्व के किसी कोने में नहीं मिलते हैं, यह पत्थर कहाँ से लाये गए, आज तक इसका पता नहीं चल पाया है।

हम सबको मिलकर हमारे भारत की इन अमूल्य धरोहरों का प्रचार जन-जन तक करना चाहिए, इसका इतना प्रचार हो कि पूरे संसार की दृष्टि इन पर पड़े और वह भारत की महान संस्कृति पर गर्व करें।

प्रहलाद इंद्रा सोनी, वरंगल


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