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मैं को बनाऐं हम

‘‘मैं’’ शब्द अपने आप तक सीमित है, जिसका दायरा भी सीमित है, जबकि ‘‘हम’’ वृहद अर्थ व दायरे वाला शब्द है। अत: आगे बढ़ने के लिये हमें मैं से हम बनाना होगा। इसी विषय पर प्रकाश डाल रहे हैं, ख्यात उद्यमी व समाजसेवी त्रिभुवन काबरा (भाईजी)।

हमारे जीवन में ‘मैं’ से ‘हम’ तक की यात्रा केवल एक सोच नहीं, बल्कि यह एक जीवन दृष्टिकोण और नेतृत्व का आधार है। यह यात्रा किसी भी व्यक्ति, संस्था, या संगठन के लिए विकास और सफलता का मूलभूत स्तंभ बन सकती है। ‘हम’ की ताकत असीमित होती है, जो हमें व्यक्तिगत सीमाओं से बाहर निकालकर सामूहिकता की शक्ति से जोड़ती है।


‘मैं’ एक सीमित सोच का प्रतीक है, जहां व्यक्ति अपनी व्यक्तिगत सफलता और सीमित दृष्टिकोण पर केंद्रित रहता है। यह सोच तब तक सही है जब तक उसका उद्देश्य आत्मनिर्भरता बनाना हो। लेकिन एक समय ऐसा आता है जब ‘मैं’ की सोच हमें आगे बढ़ने से रोक देती है। इसके विपरीत, ‘हम’ की सोच सामूहिकता, सहयोग, और असीमित संभावनाओं का प्रतीक है। ‘हम’ से व्यक्ति अपनी सीमाओं को तोड़कर समाज, देश, और बड़े उद्देश्यों के लिए योगदान दे सकता है।


गुरु पूजा में जो माला 108 मनके की होती है, वह भी ‘हम’ की सोच को दर्शाती है। हर मनका एक अलग इकाई है, लेकिन जब सभी मिलते हैं, तो माला बनती है। इसी प्रकार, जब हम व्यक्तिगत सोच से आगे बढ़कर सामूहिक प्रयास करते हैं, तो उसका परिणाम असीमित और शक्तिशाली होता है।


व्यवसाय में ‘हम’ की सोच का विशेष महत्व है। संस्थान का विकास तब होता है, जब प्रत्येक कर्मचारी यह महसूस करे कि वह कंपनी का मालिक है। नेतृत्व का यह दायित्व है कि वह हर कर्मचारी को सही दिशा और प्रेरणा दे। उदाहरण के लिए, रामरत्ना समूह की यह नीति कि ‘दो पांव से आओ और चार कांधों पर जाओ,’ न केवल कर्मचारियों का आत्मविश्वास बढ़ाती है, बल्कि उन्हें अपने कार्यक्षेत्र में सर्वोत्तम प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित भी करती है। इस समूह में कई उदाहरण हैं जहां एक साधारण कर्मचारी, जैसे क्लर्क या एकाउंटेंट, मेहनत और लगन के बल पर कंपनी का डायरेक्टर बने। यह दर्शाता है कि जब संगठन अपने कर्मचारियों को ‘हम’ की सोच से जोड़ता है, तो वह न केवल व्यवसाय को ऊंचाइयों तक पहुंचाता है, बल्कि कर्मचारियों को आत्मसम्मान और गर्व भी देता है।


‘मैं’ की सोच में व्यक्ति केवल अपनी परेशानियों पर ध्यान केंद्रित करता है, जबकि ‘हम’ की सोच में वह दूसरों की तकलीफों को समझकर समाधान ढूंढता है। यह दृष्टिकोण टीमवर्क को बढ़ावा देता है। रामरत्ना समूह की एक और प्रेरणादायक विशेषता यह है कि यहां कर्मचारियों का पलायन न्यूनतम है। यहां मान और सम्मान का ऐसा वातावरण है, जो कर्मचारियों को लंबे समय तक संस्थान से जोड़कर रखता है।


‘मैं’ से ‘हम’ की यह यात्रा न केवल व्यक्तिगत, बल्कि सामूहिक विकास का मार्ग है। इसके लिए आवश्यक है:

  • सकारात्मक दृष्टिकोण: हर व्यक्ति को यह महसूस कराना कि वह संगठन का अभिन्न हिस्सा है।
  • सही नेतृत्व: नेतृत्व का यह दायित्व है कि वह केवल आदेश देने वाला न बने, बल्कि टीम के साथ मिलकर काम करे।
  • मूल्य आधारित नीति: संगठन में ऐसी नीतियां बनानी चाहिए, जो कर्मचारियों को मान-सम्मान और आत्मनिर्भरता दें।
  • लक्ष्य और दृष्टिकोण: हर व्यक्ति को यह सिखाना कि उसका योगदान समाज, देश और विश्व के लिए कितना महत्वपूर्ण है?

‘मैं’ से ‘हम’ की यात्रा तकलीफ भरी जरूर हो सकती है, लेकिन इसका परिणाम हमेशा व्यापक और दीर्घकालिक होता है। यह सोच हमें सीमाओं से बाहर निकलने, बड़े लक्ष्यों को हासिल करने, और समाज व देश के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का मौका देती है। इस दृष्टिकोण को अपनाकर, हम न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन में सफलता प्राप्त कर सकते हैं, बल्कि संगठन और समाज को भी प्रगति की नई ऊंचाइयों तक पहुंचा सकते हैं।


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