भगवान शिव और पार्वती के दाम्पत्य की सबसे अनुकरणीय सीख यह है कि जब भी संसार संचालन के कर्म से अवकाश मिलता है, दोनों पति-पत्नी सत्संग करने लगते हैं। अधिकांशतः शिव बोलते हैं और देवी प्रवचन श्रवण करती हैं। देवी के प्रश्न इतने सुंदर होते हैं कि महादेव को सविस्तार समाधान प्रस्तुत करने में अलग ही रस आता है। महाभारत का अनुशासन पर्व इस दाम्पत्य-सत्संग की अद्भुत साहित्य निधि है।
इसके कुल छह अध्यायों में पाँच में भगवान के प्रवचन हैं और छठवें में देवी का स्त्री धर्म पर उपदेश। लेकिन न पार्वती के प्रश्नों का कोई सानी है, न ही प्रभु के उत्तरों समान कोई दूसरी मिसाल। अब मोक्ष धर्म पर एक प्रश्न देखिए! देवी ने पूछा, ‘हे देव! सम्पूर्ण धर्मों में श्रेष्ठ, सनातन, अटल और अविनाशी धर्म क्या है? और शिवजी ने अद्भुत व हम सभी गृहस्थों के लिए प्रेरक उत्तर दिया।
बोले, ‘देवी! धर्म के अनेक द्वार हैं। जो-जो जिस-जिस विषय में निश्चय को प्राप्त होता है, वह उसी को धर्म समझता है लेकिन सबसे उत्तम मोक्ष का द्वार है। ‘शृणु देवि समासेन मोक्षद्वारमनुत्तमम्!’
और इसका सार है ‘सुख-दुनख में सदा समभाव से जीना!’ जब मनुष्य मन, वाणी और क्रिया द्वारा किसी भी प्राणी के प्रति पाप नहीं करता, तब वह ब्रह्मस्वरूप हो जाता है। निष्ठुरता शून्य, अहंकार रहित, द्वंद्वातीत और मात्सर्यहीन व्यक्ति ही शोक, भय और बाधा से रहित होकर इसे पा सकता है। सच तो यह है कि –
‘तुल्यनिंदास्तुतिमौनी समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
समः शत्रौ च मित्रे च निर्वाण मधिगच्छति।।’
अर्थात जिसकी दृष्टि में निन्दा और स्तुति समान है, जो मौन रहता है, मिट्टी के ढेले, पत्थर और सुवर्ण को समान समझता है तथा जिसका शत्रु और मित्र के प्रति समभाव है, वही निर्वाण ( मोक्ष ) को प्राप्त होता है।
जो ऐसा करता है, वही सच्चा धर्म पालक है।
-विवेक चौरसिया
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