चेहरे को चमकाती- इन्द्र मुद्रा

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हमारे शरीर में 70 प्रतिशत जल होता है। शरीर में जल तथा अन्य तत्वों का संतुलन बनाए रखने के लिए इंद्र मुद्रा अति सहायक है। इस मुद्रा का हमारे स्वास्थ्य के लिये बड़ा महत्व है। तथा इसके अभ्यास से हम कई रोगों से बच सकते हैं।

कैसे करें

कनिष्ठ उंगली के अग्रभाग को अंगूठे के अग्रभाग से मिला दिया जाए और शेष तीनों उंगलियां सीधी ही रहें तो यह इन्द्र मुद्रा कहलाती है। योग शास्त्रों में प्राय: इसे वरुण मुद्रा के नाम से जाना भी जाता है।

Shivnarayan-Mundra

कब करें

इस मुद्रा का प्रयोग दिन में 3 बार, 10-10 मिनट के लिये करें।


लाभ

  • इस मुद्रा के सामान्य प्रयोग से त्वचा कोमल, मुलायम व स्निग्ध रहती है। चेहरे पर झुर्रियां नहीं पड़ती एवम् यौवन लम्बे समय तक बना रहता है।
  • अनेक त्वचा रोग इस मुद्रा से ठीक होते हैं। जैसे कि दाद, खुजली, एग्जिमा, सोरायसिस इत्यादि।
  • ग्रीष्म ऋतु में प्रायः अतिसार, डायरिया, पतले दस्त लग जाते हैं। इस स्थिति में इस मुद्रा को करने से चमत्कारी लाभ होता है। प्रत्येक बार शौच जाने के बाद इस मुद्रा को करते रहने से जल तत्व की कमी नहीं होती, शरीर में कमजोरी नहीं आती और शक्ति बनी रहती है।
  • मूत्र रोगों में यह मुद्रा लगाएं, आराम मिलेगा।
  • मधुमेह के रोग में भी पेशाब अधिक आता है, रात को कई बार पेशाब करना पड़ता है। इस मुद्रा को करने से इसमें आराम मिलेगा।
  • तेज बुखार में प्यास बहुत लगती है, होंठ सूखने लगते हैं। ऐसे में यह मुद्रा लगाएं।
  • बुखार में अथवा किसी अन्य कारण से यदि मुँह का स्वाद बिगड़ जाता है, तो उसे ठीक करने के लिए यह मुद्रा लगाएं।
  • यदि आँखों में जलन हो, सूखापन हो तो यह मुद्रा लगाएं।
  • उच्च रक्तचाप के कारण, मधुमेह के कारण, कोलेस्ट्रोल बढ़ जाने के कारण जब रक्त गाढ़ा हो जाता है, रक्त को सामान्य बनाने के लिये, रक्त की गुणवत्ता के लिये, खराब कोलेस्ट्रोल से बचने के लिये इस मुद्रा का प्रयोग करें।
  • इस मुद्रा से रक्त संचार ठीक रहेगा, रक्त के रोग नहीं होंगे। रक्त प्रवाह की तरलता बनी रहेगी और रक्त द्वारा पूरे शरीर में आक्सीजन और प्राणों का संचार भली भांति होता रहेगा।
  • ग्रीष्म ऋतु में इस मुद्रा को लगाने से विशेष लाभ प्राप्त होता है। हम अधिक प्यास से बचे रह सकते हैं, लू नहीं लगती, शीतलता मिलती है।
  • गैस की समस्या में भी यह मुद्रा लाभदायक है।
  • शरीर में जल की कमी से मांसपेशियों में अकड़न आ जाती है। उनमें ऐंठन एवं तनाव उत्पन्न होता है। यह मुद्रा मांसपेशियों को शिथिलता प्रदान करती है।
  • फोड़े, फुंसियों, कील, मुहांसों में भी यह मुद्रा लाभकारी है। अम्ल पित्त के बढ़ जाने से होने वाले रोग शांत हो जाते हैं।
  • यह मुद्रा स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करती है।

सावधानी

यदि किसी को ठण्ड लग रही है, सर्दी, जुखाम है, नाक व आँखों से पानी आ रहा है, बलगम है, साईनस में श्लेष्मा जमा हो गया है, तो इस मुद्रा को न करें।


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