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महाभारत में पर्यावरण

महाभारत में पर्यावरण की सुरक्षा के लिए न केवल पंच महाभूतों की पवित्रता कायम रखने के निर्देश हैं बल्कि धरती के पर्यावरण की रक्षा के लिए वृक्षारोपण को भी महत्वपूर्ण बताया गया है।

रामायण में अरण्यकाण्ड की तरह महाभारत में एक पूरा वन पर्व ही रखा गया है। जो वन संस्कृति का परिचायक है। महाकाव्य में कदलीवन, काम्यकवन, द्वैतवन, खाण्डववन जैसे अनेक वनों के नाम हैं और अनेक महत्वपूर्ण प्रसंग वन अंचल में ही घटित हुए हैं। वृक्ष, गुल्म, लता, वल्ली, त्वक्सार तथा तृण के रूप में स्थावर भूत वृक्षों की छह जातियों का भी वर्णन है।

इनमे ऋषि-मुनियों के तपस्थल और आवास है। अतः ये वन शांत, सुन्दर तथा प्रकृति के धन से मालामाल और निहाल हैं। अनेक राजा भी अपने गृहस्थाश्रम के कर्तव्यों से मुक्त होकर यथासमय वानप्रस्थी होकर वन की ओर उन्मुख होना अपना धर्म समझते हैं। कथा में देवापि से लेकर धृतराष्ट्र तक के वन गमन की कथाएं इसकी प्रमाण हैं। इसी कारण महाकाव्य की रचना के सिद्धांतों के अनुरूप महर्षि वेदव्यास ने अनेक स्थानों पर वन की शोभा के नयनाभिराम चित्रण किए हैं।

ये सारे वर्णन पर्यावरण के प्रति चेतना और जागरूकता के ही प्रतिक हैं। इसलिए कि महाभारतकार एक वृक्ष तक को अपने पुत्र के सामान मानते हैं। यही कारण है कि जीवन में अनुशासन का पाठ पढ़ाने वाले महाभारत के सबसे कीमती पर्व अनुशासन पर्व में जगह-जगह वृक्ष के रोपण और पौधों की दान और उनकी वृद्धि के लिए जलाशयों के निर्माण को सर्वोत्तम दान निरूपित किया गया है।
महाभारत कहता है, फूले-फले वृक्ष इस जगत में मनुष्यों को तृप्त करतें हैं। जो वृक्ष का दान करता है, उस ये वृक्ष पुत्र की भाँति परलोक में भी तार देते हैं।

और सबसे बड़ी बात यह कि पेड़ों से भरे वन तभी संभव है जब धरती पर भरपूर जल हो। इसलिए महाभारत में जलाशयों, प्याऊ आदि के निर्माण और जलदान को सर्वोत्तम दान कहा गया है।

-विवेक कुमार चौरसिया


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