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“विद्या ददाति विनयं”- जयपुर माहेश्वरी समाज की शिक्षा यात्रा के 100 वर्षों का इतिहास

कोई व्यक्ति हो या समाज वह तरक्की तभी कर पाता है, जब वह लगातार काम करता है। कितनी ही चुनौतियाँ आएं, मंजिल मिलकर ही रहती है। इसका जीता-जागता उदाहरण है, जयपुर माहेश्वरी समाज। यह समाज अपनी जिजीविषा के लिए माना जाता है, यानी जो ठान लिया, सो ठान लिया, उसे हर हाल में पूरा करना है। करीब सौ वर्ष पहले समाज ने लोगों को शिक्षा दान की सोची। इसके लिए एक संस्था का जन्म हुआ ‘दी एजुकेशन कमेटी ऑफ माहेश्वरी समाज’।

इस संस्था ने एक गली की एक छोटी सी कोठरी में शिक्षा की जो लौ जलाई, वह आज प्रकाश पुंज बन चुकी है। जिस कोठरी में रात्रि पाठशाला के लिए चार लोग और दीपक के लिए तेल भी नहीं मिलता था, वह संस्था आज रोशनी से जगमग हो रही है। चार लोगों को पढ़ाने से शुरुआत करने वाली संस्था अब करीब 25 हजार बच्चों को पढ़ा रही है।

यह सब कैसे संभव हुआ? ‘‘विद्या ददाति विनयं’’ इस सबका दस्तावेज है। यह मात्र एक पुस्तक नहीं है, जो किसी समाज की प्रशस्ति गाथा करती हो। पुस्तक में समाज के पूर्वजों के संघर्ष का उल्लेख है कि कैसे वे अपनी दूरगामी सोच को पूरा करने के लिए निष्ठापूर्वक लगे रहे। उनकी निष्ठा का ही परिणाम है कि उनका लगाया गया शिक्षा रूपी पौधा आज वटवृक्ष बन चुका है। एक छोटी सी पाठशाला, जिसमें बच्चों को बुलाकर लाया जाता था, आज एक वृहद् शिक्षा संस्था के रूप में बदल चुकी है।

सन् 1926 में छोटी सी पाठशाला शुरू होने के समय के कुछ दुर्लभ दस्तावेजों को देखा गया, तो देखकर आश्चर्य हुआ कि उस समय स्कूल की जिम्मेदारी संभालने वालों ने स्कूल की कार्यवाही की मिनट बुक बना रखी थी। स्कूल की गतिविधियों के साथ-साथ दानदाताओं के नामों का जिक्र भी इस मिनट बुक में रहता था। यह संस्था छोटी भले ही रही हो, लेकिन इसके जो कर्ता-धर्ता थे, सब उच्च शिक्षित थे।

यही कारण था कि मात्र एक टेबल, एक कुर्सी, एक लकड़ी की पेटी, एक कलम-दवात, होल्डर के साथ शुरू की गई यह पाठशाला आज सुसज्जित बहुमंजिला भवन तक का सफर पूरा कर चुकी है। यह सफर आसान रहा हो, ऐसा भी नहीं है, बीच में कई-कई व्यवधान भी आए, लेकिन जहां लक्ष्य पर, मंजिल पर नजर हो, उसे कोई हरा नहीं सकता।

ईसीएमएस के चेयरमैन प्रदीप बाहेती ने पुस्तक को एक दुर्लभ दस्तावेज बताया। चंद्रमोहन शारदा का संपादन कसावट लेते हुए है। घटनाओं व संस्मरणों को इतनी रोचकता से वर्णित किया गया है कि पाठक की जिज्ञासा बनी रहती है। ले-आउट में नवीनता है, पुस्तक में प्रयुक्त संस्कृत के श्लोकों के माध्यम से अनुकरणीय बातें कही गई हैं।