संस्कृत के पंकज शब्द का अर्थ है कमल। इस शब्द की व्युत्पत्ति का अर्थ होता है कि ‘पंके जायते इति पंकज’ – जो कीचड़ में पैदा होता है वह पंकज है, कमल है। भारतीय संस्कृति में कमल को अलिप्त माना गया है। हम देखते हैं कमल कीचड़ में पैदा होता है, परंतु फिर भी कीचड़ के दलदल में नहीं फंसता। पंकज मुद्रा का मुख्य उद्देश्य राग से विराग, मोह से मोक्ष की ओर प्रयाण करना है।
- पंकज मुद्रा बनाने के लिए अपने दोनों हाथों के अंगूठे को परस्पर मिलाएं, दोनों कनिष्ठका, दोनों छोटी अंगुलियों को परस्पर मिलाएं शेष अंगुलियों को कमल की पंखुड़ियों की तरह है किंचित झुका कर खड़ी करना ही पंकज मुद्रा है।
- इस मुद्रा को कम से कम 5 मिनट जरूर करना चाहिए। गर्मियों में यह मुद्रा बहुत ही लाभदायक है। पंकज मुद्रा के अनेक लाभ है, जैसे इससे शारीरिक सौंदर्य में वृद्धि होती है, चेहरे का ओज-तेज बढ़ता है, स्नायु तंत्र शक्तिशाली बनते हैं, रक्त संबंधी विकार दूर होते हैं, बुखार के वक्त इस मुद्रा का असर होता है, अल्सर जैसे रोग मिटते हैं, सर्दी जुकाम जैसे रोगों में भी लाभदायक है, जैसे सूर्योदय होने पर पंकज खिलता है वैसे ही अग्नि तत्व का सजातीय अग्नि तत्व से मिश्रण होने पर हृदय का सूर्य कमल विकसित होता है। जैसे रात्रि में चंद्रमा निकलता है, वैसे ही जल तत्व का जल तत्व से मिलन होने पर शुद्ध आत्मा रूपी चंद्र कमल विकसित होता है।
- इस मुद्रा में अनामिका, मध्यमा और तर्जनी यह तीनों उंगलियां अपने- अपने तत्व के साथ एक दूसरे के सामने रहती है, जिससे उनके गुणों का परस्पर आदान-प्रदान होता है। इस मुद्रा के अतिशय से दूसरों को प्राण शक्ति प्रदान करने की क्षमता भी विकसित होती है।
- आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो पंकज मुद्रा में स्थिर होकर कमलाकृति का ध्यान किया जाए तो अनासक्ति का विकास होता है, विचार पवित्र बनते हैं क्योंकि पंकज को पवित्र माना गया है। इस मुद्रा से विचार, स्वभाव सौम्य बनता है। पंकज मुद्रा से टॉन्सिल, गर्दन, हॉर्ट, लसिका ग्रंथि आदि से उत्पन्न होने वाले रोगों में भी आराम मिलता है।











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