चलिए आज हम बात करेंगे वायु मुद्रा की। हम सभी का यह अनुभव है कि व्यक्ति भोजन के बिना कुछ दिनों तक जीवित रह सकता है, पानी के बिना भी कुछ दिन, किंतु वायु के बिना कुछ मिनट भी जिंदा रहना मुश्किल है। आयुर्वेद का मानना है कि वात, पित्त व कफ के असंतुलन पर शरीर, मन व चेतना भी असन्तुलित हो जाती है। वायु जब शरीर में सम रहती है तो शरीर स्वस्थ रहता है। वायु के विषम होने पर उसका प्रभाव मनोजगत पर भी पड़ता है। वात जन्य रोगों की शांति और मन को स्थिर करने के लिए वायु मुद्रा का प्रयोग किया जाता है।
इस मुद्रा के लिए अपने शरीर के अनुकूल बैठ जाएं फिर तर्जनी को अंगूठे के मूल पर लगाएं फिर अंगूठे से उस तर्जनी पर हल्का दबाव देते हुए बाकी अंगुलयाँ को सीधा रखने पर वायु मुद्रा बनती है। इसे आवश्यकतानुसार दिन में दो बार 5 मिनट तक किया जा सकता है। रोग ज्यादा होने पर इसको 15 मिनट तक बढ़ाया जा सकता है। आयुर्वेद के अनुसार 51 प्रकार के वायु उत्पन्न रोगों को इस मुद्रा प्रयोग से शांत किया जा सकता है।
गठिया का दर्द, लकवा, वायु कंपन, पार्किंसन, सर्वाइकल स्पांडिलाइसिस, गर्दन में वात पीड़ा, घुटनों का दर्द आदि अनेक रोगों का निवारण वायु मुद्रा से होता है। भोजन करने के पश्चात गैस की तकलीफ हो तब तुरंत वज्रसन में बैठकर वायु मुद्रा करने से तुरंत लाभ मिलता है।
इस मुद्रा से वायु के कारण जो हृदय रोग होता है वह भी ठीक होता है। ऋतु परिवर्तन के समय तो इस मुद्रा को अवश्य करना चाहिए ताकि प्रकृति परिवर्तन से वायु तत्व असंतुलित ना हो।
इस मुद्रा को अन्य उपचारों के साथ भी प्रयोग करने से मन शांत एवं स्थिर होता है। वायु मुद्रा के अभ्यास से ध्यान की अवस्था में मन की चंचलता समाप्त होकर मन एकाग्र होता है एवं सुषुम्ना नाड़ी में प्राण वायु का संचार होने लगता है जिससे चक्रों का संतुलन होने लगता है।











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