व्यान मुद्रा (vyan mudra) में अग्नि, वायु तथा आकाश तत्त्वों में संतुलन बनता है और शरीर में नई शक्ति का संचार होता है। आइये जाने इस मुद्रा के बारे में।
कैसे बनाएं : अंगूठा, तर्जनी और मध्यमा उंगुलियों के अग्रभाग को मिलाकर शेष दोनों उंगुलियां सीधी रखें। इनसे अग्नि, वायु और आकाश तत्वों का विकास होता है। व्यान प्राण समूचे शरीर में समान रूप से घूमता है। इसका संबंध जल तत्व यानि स्वाधिष्ठान चक्र से है।

लाभ: उच्च एवं निम्न रक्तचाप दोनों में यह लाभकारी है। रक्तचाप को सामान्य बनाए रखने के लिए इस मुद्रा को ३० मिनट तक प्रात:काल और सायंकाल लगाएं। रक्तचाप के रोग में इसका चमत्कारी और आश्चर्यजनक परिणाम है। यह हृदय रोग में भी लाभकारी है। इससे रक्त संचार ठीक होता है।
रक्तसंचार के रोग दूर होते हैं। वात, पित्त, कफ का संतुलन होता है। व्यान मुद्रा वात, पित्त और कफ का नियंत्रण करने वाली सबसे अधिक प्रभावशाली मुद्रा है। इस मुद्रा को दोनों हाथों से करना है।










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