शिक्षाविद्, समाजसेवी एवं मोटीवेशनल रायटर के रूप में पहचान रखने वाले डॉ. एच. एल. माहेश्वरी ऐसे लोगों में से एक हैं जो अपनी कलम से खास हैं। उनकी शख्सियत में भी कुछ ऐसी बात है जो उन्हें खास बनाती है। यह सब कुछ धन-दौलत या शोहरत के कारण नहीं बल्कि बिना शोर-शराबे के मानवीय गरिमा एवं नैतिक मूल्यों के साथ शिक्षा-जगत एवं समाज कल्याण के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के कारण है।
हीरालाल मालानी जिनका प्रचलित नाम डॉ. एच. एल. माहेश्वरी है, का जन्म 16 सितम्बर 1937 में ग्राम शमशाबाद जिला विदिशा में श्री गन्नूलाल माहेश्वरी एवं श्रीमती रामकुंवर के यहाँ हुआ था। माहेश्वरी की प्रायमरी तक शिक्षा ग्राम शमशाबाद में हुई, इसके बाद विदिशा से हाईस्कूल और इन्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की।
उच्च शिक्षा के लिए भोपाल गए जहाँ से बी.कॉम और एम.कॉम की परीक्षा पास की। इसके पश्चात् विक्रम विश्वविद्यालय की प्रावीण्य सूची में प्रथम स्थान के साथ एम.ए. अर्थशास्त्र की परीक्षा उत्तीर्ण की। बाद में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की।
व्यस्तता में भी मानवता की सेवा
म.प्र. लोकसेवा आयोग से चयन के बाद डॉ. माहेश्वरी की नियुक्ति सहकारिता विस्तार अधिकारी के पद पर आगर मालवा में हुई। शासकीय सेवा में रहते हुए भी कुछ कर गुजरने की तमन्ना के कारण उन्होंने समाजसेवा की ओर अपने कदम बढ़ाए और नेहरू स्मृति बाल मंदिर, लाल बहादुर शास्त्री बाल निकेतन, महिला सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र, सार्वजनिक वाचनालय, प्रौढ़ महिलाओं के लिए संक्षिप्त पाठ्यक्रम की संस्था आदि की स्थापना कर उनका सफलतापूर्वक संचालन किया। उस समय आगर में उच्च शिक्षण की सुविधाएँ नहीं थीं।

डॉ. माहेश्वरी के प्रयास एवं जनसहयोग से जुलाई 1966 से श्री नेहरू महाविद्यालय का शुभारंभ हो गया। महाविद्यालय सुचारू रूप से चल सके इस हेतु डॉ. माहेश्वरी को शासकीय सेवा छोड़कर महाविद्यालय की सेवा में आना पड़ा। बाद में वे इसी महाविद्यालय के प्राचार्य भी बने।
डॉ. माहेश्वरी के प्रयास से यहाँ लाल बहादुर शास्त्री हौम्योपेथिक मेडीकल कॉलेज भी प्रारम्भ हुआ जो मध्यप्रदेश हौम्योपेथिक बोर्ड भोपाल द्वारा डी.एच.बी. उपाधि के लिए मान्यता प्राप्त था। विधि के शिक्षण की आवश्यकता महसूस की गई। साधन सम्पन्न वकील श्री मदनलाल घुगारिया के सहयोग से उनके पिता के नाम पर कन्हैया घुगरिया विधि महाविद्यालय की स्थापना की गई। बाद में इस महाविद्यालय की कक्षाएँ श्री नेहरू महाविद्यालय में ट्रांसफर कर दी गई।
समाजसेवा में भी सक्रिय
आगर-मालवा से ट्रांसफर होकर जून 1975 में डॉ. माहेश्वरी नरसिंहगढ़ आए। उस समय यहाँ का माहेश्वरी समाज दो हिस्सों (धड़े) में बंटा हुआ था। दोनों एक-दूसरे से ईर्ष्या रखते थे और नीचा दिखाने का सोचते रहते थे किन्तु डॉ. माहेश्वरी ने अपनी मिलनसारिता, सद्व्यवहार, सूझबूझ और प्रभाव से दोनों के बीच का मतभेद मिटाकर उन्हें एक मंच पर खड़ा कर दिया, दो धड़े हमेशा के लिए समाप्त हो गए।
उसी समय से नरसिंहगढ़ में प्रतिवर्ष महेश नवमी समारोह बड़े धूमधाम से उत्साहपूर्वक मनाया जाने लगा। सन् 1982 में डॉ. माहेश्वरी शासकीय महाविद्यालय नरसिंहगढ़ से ट्रांसफर होकर माधव महाविद्यालय, उज्जैन आए। उज्जैन में एक अलाभकारी समिति का गठन कर इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश हस्त एवं ललित कला मण्डल स्थापित किया।
डॉ. माहेश्वरी द्वारा स्थापित इस मण्डल को अच्छा महत्व मिला और इससे मध्यप्रदेश के जिलों एवं तहसीलों के अनेक केन्द्र जो सिलाई, कढ़ाई, पेन्टिंग, मेहन्दी, रंगोली आदि विषयों का प्रशिक्षण देते थे, सम्बद्ध हो गए।
कलम भी सतत् प्रेरणा स्त्रोत
डॉ. माहेश्वरी की देश के प्रतिष्ठित प्रकाशकों द्वारा 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी है। इसमें खूबसूरती से जिएँ 55 के बाद, खूबसूरती से जीवन जीने की कला, हँसते मुस्कुराते प्रसन्नता से जिएँ, सुखी जीवन के प्रभावी सूत्र, जिएँ शानदार जिन्दगी 60 के बाद, रूकिए जरा – आत्महत्या से पहले, सहजें खुशियों का अनमोल खजाना-दोस्ती, ढूँढते रह जाओगे इंसानियत, बिना मरे पाएँ स्वर्ग, पाँए दुःखों से छुटकारा, खुशियों की चाबी आपके हाथ, हँसते-हँसते जिएँ, हँसते-हँसते अलविदा, क्या आप जिन्दा हैं?, दुष्कर्म पर कैसे लगे लगाम?, कोरोना क्यों, कैसे करें सामना?, कैसे छुए आसमान, हरपल जिएं भरपूर जिन्दगी, टेंशन क्यों लेना?, सकारात्मकता – खुशियों का महामंत्र, सुख कहाँ – ढूँढ लिया ठिकाना आदि प्रमुख हैं।










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