बाल साहित्य की सृजनकर्ता – उषा सोमानी

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राजस्थान के राजनगर जिला राजसमंद में 16 जुलाई 1962 को श्रीकृष्ण झंवर एवं कंचन देवी के यहाँ जन्मीं चित्तौड़गढ़ निवासी उषा सोमानी पत्नी राजेन्द्र सोमानी ने जीवन की तीसरी पारी में एक बाल कहानीकार के रूप में अपनी पहचान बनायी है। बाल साहित्य में कहानी, आलेख, आत्म कथा, कविता व पहेली विधा में सृजन कर बाल साहित्य को समृद्ध करने में अमूल्य योगदान दिया है। आइए जानें उषा सोमानी से उन्हीं की जुबानी उनकी साहित्यिक यात्रा की कहानी।

मेरी गुरू माँ विमला दीदी ने खुशखबरी के साथ बधाई दी। उन्होंने बताया कि मुझे अखिल भारतीय आत्मकथा लेखन प्रतियोगिता के लिए प्रथम पुरस्कार की विजेता होने का सौभाग्य मिला है। जीवन के 60 साल के पास पुरस्कार पाकर ऐसा लगा मानो वृद्धावस्था में तरुणाई आ गयी। लगा कल की ही तो बात थी- अतीत की यादें मानस पटल पर आकाश में चमकती बिजलियों सी चमकने लगी।

मैं अर्थशास्त्र में एम. ए. करने के बाद प्रशासनिक सेवा में जाना चाहती थी, परंतु विधि का विधान, शादी कर शहर से गाँव में आ गई। एकल परिवार से संयुक्त परिवार के साथ सामंजस्य बिठाते हुए, खट्टे-मीठे अनुभवों से गुजरते हुए, समय पंख लगाकर बीत गया। बेटा और बेटी के जन्म से मातृत्व सुख का आनंद पाया। उनके अच्छे स्कूल और शिक्षा के लिए चित्तौड़गढ़ बसने का निर्णय लिया। धीरे-धीरे बच्चों के आत्मनिर्भर होने से दिन बड़े लगने लगे और खाली समय काटने लगा। तभी मन में विचार आया और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया। ये सफर भी बहुत शानदार था। बच्चों का साथ बहुत आनंद और अनुभव दे गया।

usha somani

मैंने सामाजिक गतिविधियों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। मुझे माहेश्वरी महिला संगठन चित्तौड़गढ़ के नगर व जिला सचिव पद पर एवं राजस्थान प्रदेश की सांस्कृतिक सचिव पद पर कार्य करने का अवसर मिला। फिर अचानक एक दिन जीजाजी का फोन आया। कॉमर्स कॉलेज में गेस्ट फैकल्टी के रूप में अर्थशास्त्र पढ़ाने का प्रस्ताव मिला। प्रस्ताव सुनकर बहुत खुश हुई, परंतु इतने लंबे समय के अंतराल से अपने विषय को लेकर मन में विचारों कि उथल-पुथल मच गई। दिल के एक कोने से आवाज आई, ‘तुम कर सकती हो।’ मैंने वह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। शिक्षिका के रूप में कॉलेज का पहला दिन, जीवन का बहुत सुखद अनुभव रहा। उस दिन एहसास हुआ कि हौसले बुलंद हों तो कोई राह मुश्किल नहीं। बच्चों को कुछ चुनिंदा टॉपिक पढ़ाने थे। मुझे कोर्स पूरा होने के साथ बहुत दुःख हुआ कि ये सफर इतना छोटा था।

अगले सेशन के लिए चित्तौड़ के मैनेजमेंट कॉलेज से गेस्ट फैकल्टी के रूप में फिर से प्रस्ताव आया। मुझे तो घर बैठे ही मन की मुराद मिल गई। मैंने तुरंत हाँ कर दी और दूसरे दिन कॉलेज जॉइन कर लिया। BBA, MBA और MIB को पढ़ाना, कोई खेल नहीं था। उन्हें पढ़ाने के लिए शुरू के कुछ समय तक मुझे भी प्रतिदिन 3-4 घंटे पढ़ाई करनी पड़ी। इसी बीच बेटे की डॉक्टरी पढ़ाई पूरी हो गई और उसने चित्तौड़ ही प्रैक्टिस करने का निर्णय लिया। उसकी शादी हुई और घर में एक नन्हें फरिश्ते के आने की दस्तक हुई। नई जिम्मेदारियों के साथ 10 वर्ष के इस अलबेले अनुभव के साथ कॉलेज को फिर अलविदा कहना पड़ा।

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एक नया सफर शुरू हुआ, नन्हीं आरोही के साथ। उसकी किलकारियों से घर आँगन में रौनक छा गई। समय अपनी गति से बढ़ता गया और बेटी सीए हो गई। उसका विवाह कर, उसे अपने आंगन से विदा कर दिया। आरोही स्कूल जाने लगी। उसकी बाल सुलभ जिज्ञासा भरपूर मनोरंजन करती। इसी बीच मेरे आंगन में नन्हें कुशाग्र और दृष्टी की किलकारियाँ गूंजी। दादी-नानी बनकर फूली न समाई।

जीवन में नया दौर फिर से शुरू हुआ। खाली समय काटने लगा, समय की उपादेयता मन पर प्रश्नचिन्ह लगाने लगी। इसी कशमकश में एक दिन विमला दीदी ने कहा, ‘तुम पोती-नाती को रोज कहानी सुनाती हो। तुम इन्हीं कहानियों को लिखती क्यों नहीं?’

मैंने आश्चर्य से पूछा, ‘कैसे लिखूं और लिखकर क्या करूँगी?’

दीदी मुस्कराकर बोली, ‘साहित्य का सृजन होगा, प्रकाशन होगा और मन ऊर्जान्वित होगा।’

दीदी ने मुझे वॉट्सएप ग्रुप पर चलने वाले बाल साहित्य कार्यशाला पटल से जोड़ा, जिसकी वे संयोजिका हैं। यहाँ से शुरू हुई मेरी साहित्यिक यात्रा। बच्चों का साहित्य सृजन, बच्चों का खेल नहीं है। यह मुझे तब पता चला, जब मैंने पहली कहानी कार्यशाला पटल पर पोस्ट की। अपनी रचना के लिए पटल पर प्रतिक्रिया मिली, ‘इसमें कहानी कहां है, मैं ढूंढ रहा हूं।’ ऐसी तीखी प्रतिक्रिया पाकर, मैं विचलित हो गयी।
मैंने दीदी को फोन लगाया और बोली, ‘आपका बाल साहित्य कार्यशाला पटल छोड़ रही हूँ। मुझे नहीं लिखना। मेरी कहानी सुनकर पोती-नाती को बहुत आनंद आता है। मेरे लिए वहीं पर्याप्त है।’ दीदी हंसकर बोली, ‘डरकर भाग लेने वाले कायर होते हैं। तुम्हारे में सामर्थ्य हैं और तुम कर सकती हो।’

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दीदी की बातों से मन की डगमगाती कश्ती को इरादों का माँझी मिल गया और पूरे मनोबल के साथ लेखन का कार्य करने लगी। मैंने वॉयस टाइप करना और मेल करना सीखा। मैं अथक मेहनत करती रही। मेरी लगन रंग लाई। एक ही वर्ष में मेरी रचनाएँ देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगी। यह प्रकाशन देख कर मन प्रफुल्लित हो गया। इस एक वर्ष की साहित्यिक यात्रा में मेरी लिखी बाल कविता और कहानियों के तीन संग्रह प्रकाशन में आए। पहला बाल काव्य संग्रह ‘पंख मुझे मिल जाते’। दूसरा, ‘जादुई बगीचा’ बाल कहानी संग्रह, जिसे राजस्थान साहित्य अकादमी से प्रकाशन हेतु अनुदान भी मिला। तीसरा, बाल कहानी संग्रह ‘मस्ती की पाठशाला’

जब ये पुस्तकें प्रकाशित होकर आयी तो घर में नवजात शिशु के जन्म पर होने वाले उत्सव सी खुशियां छा गई। सभी अपने हाथ में लिए, उन्हें उलट पुलट कर देख, मुस्करा रहे थे। मेरी पुत्रवधू बोली, ‘ये संग्रह आने वाली पीढ़ी के लिए आपकी तरफ से अनुपम उपहार है।’

‘पंख मुझे मिल जाते’ और ‘जादुई बगीचा’ पुस्तकों के प्रकाशन के लिए, मुझे श्रीनाथद्वारा साहित्य मंडल से भगवतीप्रसाद देवपुरा स्मृति ‘बाल साहित्य भूषण’ की मानद उपाधि से अलंकृत किया गया। चार पीढ़ियों के आनंद के साथ जिंदगी के इन पड़ावों से गुजरते हुए, जीवन की तीसरी पारी की इतनी सुंदर उपादेयता पा कर आज बहुत प्रफुल्लित हूँ। यहाँ पर एक महत्वपूर्ण बात और साझा करना चाहूंगी, इन सफलताओं तक पहुँचने के लिए, मेरे जीवन साथी ने अच्छे सलाहकार के रूप में हमेशा मेरे कमजोर होते आत्मविश्वास को हौसला दिया।


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